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Social Science class 10 up board


यूपी बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान ncert किताब का सम्पूर्ण हल












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यूपी बोर्ड कक्षा 10वी सामाजिक विज्ञान


  अध्याय 1 यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय


सामाजिक विज्ञान के महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्तर


Up board Class 10 Social Science Chapter 1




याद रखने योग्य मुख्य बिन्दु


1.यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय के कारण ही वहाँ राजतन्त्र व साम्राज्यवाद के विरुद्ध अनेक विद्रोह और क्रांतियों हुई और यूरोप में राष्ट्र-राज्यों की स्थापना सम्भत हो सकी।



2.राष्ट्रवाद पर आधारित यूरोपीय क्रांतिकारियों के प्रयासों के दौरान फ्रांस के दार्शनिक अर्न्स्ट रेनन ने राष्ट्र के स्वरूप और राष्ट्र की विशेषताओं को अपने 

व्याख्यान के द्वारा स्पष्ट किया था।



3.राष्ट्रवाद की सबसे पहली अभिव्यक्ति 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति में हुई। फ्रांस की इस क्रांति में मध्यम वर्ग की प्रमुख भूमिका थी। फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय भावना के विकास हेतु ऐसे अनेक कदम उठाए, जिनसे देशवासियों में एक 'सामूहिक पहचान की भावना का विकास हो सके। 



4.फ्रांस में नागरिक संहिता', जिसे नेपोलियन की संहिता' के नाम से भी जाना जाता है, का निर्माण 1804 ई. में हुआ।


5.यूरोपीय महाद्वीप में कुलीन वर्ग ही सबसे अधिक शक्तिशाली सामाजिक वर्ग था। औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप यूरोप में अनेक नवीन सामाजिक वर्गों का उदय हुआ। इनके श्रमिक वर्ग और मध्यम वर्ग की विद्रोह और क्रांतियों में विशेष भूमिका रही। 



6.  1815 ई. में ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रिया और प्रशा जैसी वे शक्तियाँ, जिन्होंने नेपोलियन को हराया था, उनके प्रतिनिधि यूरोप के लिए एक समझौता तैयार करने हेतु वियना में मिले। 1815 ई. में आयोजित वियना शांति-संधि की अध्यक्षता ड्यूक मैटरनिख ने की थी। वियना कांग्रेस में हुई वियना संधि में फ्रांस को कमजोर करके तथा रूस, प्रशा, ऑस्ट्रिया आदि को शक्तिशाली बनाकर नेपोलियन द्वारा समाप्त किए गए राजतन्त्रों को बहाल करने का प्रयास किया गया था। इसका उद्देश्य नेपोलियन द्वारा युद्धों के दौरान किए गए बदलावों का समाप्त करना था।


7.  1815 ई. के बाद के वर्षों में क्रांतिकारियों का प्रमुख उद्देश्य उन राजतन्त्रीय व्यवस्थाओं का विरोध करना था, जो वियना कांग्रेस के बाद सामने आई थीं। इस समय अनेक क्रांतिकारी भूमिगत हो गए थे और उन्होंने अनेक गुप्त संगठन बना लिए थे।



8. इटली में क्रांतिकारी ज्युसेपे मेत्सिनी द्वारा इटली के एकीकरण हेतु प्रयास किए गए। इस उद्देश्य के लिए उसने यंग इटली' और यंग-यूरोप' नामक संगठन और उसने राजतन्त्रीय शक्तियों व रूढ़िवादी शक्तियों को हरा दिया। अपने प्रयासों से अन्ततः वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुआ मैटरनिख ने उसे हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन बताया।


9.राजतन्त्रीय रूढ़िवाद के विरुद्ध उदारवादी राष्ट्रवादियों के नेतृत्व में इटली, जर्मनी, ऑटोमन साम्राज्य, आयरलैण्ड और पोलैण्ड जैसे देशों में क्रांति की दिशा में प्रयास किए गए। पहली क्रांति: जुलाई, 1830 में फ्रांस में हुई और उसमें रूढ़िवादी ताकतों को परास्त कर दिया गया। इसके बाद लुई फिलिप की अध्यक्षता में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई। इस घटना का सारे यूरोप पर प्रभाव पड़ा और वहाँ भी विद्रोह हुए। फ्रांस के सन्दर्भ में मैटरनिख ने एक बार कहा था, जब फ्रांस छींकता है तो बाकी यूरोप को सर्दी हो जाती है।"


10.इंग्लैण्ड के औद्योगीकरण की दृष्टि से आगे होने के कारण यूरोप के अन्य देशों के उद्योगों की परेशानियों बढ़ गयीं। दूसरी ओर कुलीन वर्ग के कारण यूरोप के किसानों की दयनीय दशा हो गयी। 1848 ई. में इन्हीं कारणों से पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए और उन्होंने विद्रोह कर दिया। लुई फिलिप को भागने के लिए विवश होना पड़ा और राष्ट्रीय सभा के द्वारा एक नवीन गणतन्त्र की घोषणा की गयी। 



11.1848 ई. का वर्ष 'उदारवादियों की क्रांति का वर्ष' कहलाता है।


12.इस समय फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के उदारवादी मध्यवगों द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण हेतु क्रांतिकारी प्रयास किए गए और जर्मनी में सर्व-जर्मन नेशनल एसेंबली की जीत हुई। वहाँ सेंट पॉल चर्च में 18 मई, 1848 ई. को फ्रैंकफर्ट संसद में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने अपना स्थान ग्रहण किया। उनके द्वारा एक जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया।


13.नए जर्मन राष्ट्र के लिए सेंट पॉल चर्च में आयोजित फ्रैंकफर्ट संसद की अध्यक्षता हेतु प्रशा के राजा फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को न्योता दिया गया और उन्हें ताज पहनाने की कोशिश की गयी, परन्तु उसके द्वारा यह पेशकश अस्वीकार कर दी गयी। इससे कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया और एसेंबली भंग कर दी गयी। 



14.जर्मनी में प्रशा के ऑटो वॉन बिस्मार्क द्वारा जर्मनी के एकीकरण का नेतृत्व सम्भाला गया। बिस्मार्क के नेतृत्व में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस से हुए युद्धों में प्रशा की जीत हुई और जर्मनी का एकीकरण पूरा हुआ। इसके बाद 1871 ई. में वर्साय में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया। 18 जनवरी, 1871 ई. को वर्साय के महल के बेहद ठण्डे शीशमहल (हॉल ऑफ मिरर्स) में नए स्वतन्त्र जर्मन साम्राज्य की घोषणा हुई।



15.19वीं सदी के मध्य इटली 7 राज्यों में बैठा हुआ था। 1830 ई. के दशक में ज्युरोपे मेत्सिनी और उसके द्वारा मार्गेई नामक स्थान पर गठित एक गुप्त संगठन 'यंग इटली' के सदस्यों द्वारा इटली के एकीकरण हेतु प्रयास शुरू हुआ, परन्तु 1831 ई. और 1848 ई. में इटली में क्रांतिकारी विद्रोहियों को असफलता प्राप्त हुई। इसके बाद इटली के एकीकरण हेतु विक्टर इमेनुएल द्वितीय, उसके मंत्री कातूर और ज्युरोपेगैबॉलीने प्रयास शुरू किए और अन्ततः उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता प्राप्त हुई।


20.1707 ई. में इंग्लैण्ड तथा स्कॉटलैण्ड के बीच 'ऐक्ट ऑफ यूनियन' नामक एक समझौता हुआ था, जिसके फलस्वरूप ऑफ ग्रेट ब्रिटेन का गठन हुआ। इससे इंग्लैण्ड का स्कॉटलैण्ड पर प्रभुत्व स्थापित हुआ। आयरलैण्ड को भी बलपूर्वक यूनाइटेट किंगडम में शामिल कर लिया गया और एक नष्ट ब्रितानी राज्य का निर्माण हुआ।




 21.उन्नीसवीं शताब्दी में एकता के राष्ट्रीय प्रतीक की स्मृति को बनाए रखने हेतु फ्रांस में स्वतन्त्रता और गणतन्त्र के प्रतीकों द्वारा मारीआन के रूप में जन-राष्ट्र का विचार दर्शाया गया। इसी प्रकार जर्मन राष्ट्र का प्रतीक अर्मेनिया बन गयी। उसे वीरता का प्रतीक बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने दर्शाया गया है।



 22.1871 ई. के बाद यूरोप में गम्भीर राष्ट्रवादी तनाव का क्षेत्र बाल्कन क्षेत्र और वहाँ के निवासी स्लाव बने। बाल्कन क्षेत्र का अधिकांश क्षेत्र ऑटोमन साम्राज्य के अधीन थे।


23.बाल्कन क्षेत्र में तनाव के कारण इस क्षेत्र में कई युद्ध हुए और अन्ततः यही बाल्कन क्षेत्र 1914 ई. के प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बना।





महत्त्वपूर्ण शब्दावली




निरंकुशवाद-ऐसी सरकार या शासन व्यवस्था, जिसकी सत्ता पर किसी का कोई अंकुश नहीं होता। यह केन्द्रीकृत, सैन्य बल पर आधारित और दमनकारी सरकारें होती हैं।



 कल्पनादर्श – इसे युटोपिया भी कहा जाता है। इसमें ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की जाती है, जिसका साकार होना लगभग असम्भव होता है।


जनमत संग्रह – एक प्रत्यक्ष मतदान, जिसके माध्यम से एक क्षेत्र के समस्त लोगों से किसी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए कहा जाता है। सढ़िवाद ऐसा राजनीतिक दर्शन, जो परम्पराओं, रिवाजों और स्थापित संस्थाओं पर बल देता है। यह तीव्र परिवर्तन की उपेक्षा करते हुए धीरे-धीरे परिवर्तन को प्राथमिकता देता है।


विचारधारा-एक विशेष प्रकार की सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि को दर्शाने वाला विचारों का समूह


नारीवाद - स्त्री-पुरुषों की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समानता की सोच के आधार पर महिलाओं के हितों और अधिकारों का बोध कराने वाली विचारधारा नृजातीय-एक साझा, नस्ली, जनजातीय या सांस्कृतिक उद्गम अथवा पृष्ठभूमि, जिसे कोई समुदाय अपनी पहचान मानता है।



 उदारवाद यह लैटिन भाषा के लिवर शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- 'आजाद। यूरोप में मध्यवर्गों के लिए इसका अर्थ या व्यक्ति के लिए आजादी या

कानूनी दृष्टि से समानता। 



 घोषणा-पत्र एक प्रकार का प्रपन्न, जिसमें किसी प्रकार की घोषणाएँ दी होती हैं। ये घोषणाऐं उस विषय से सम्बन्धित होती हैं, जिस पर यह आधारित होता है। 



राष्ट्रवाद वह भावना अथवा विचारधारा, जिसके माध्यम से जनता में राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक एकीकरण सम्भव हुआ।


प्रभुसत्ता-राष्ट्रीय विषयों पर निर्णय लेने की स्वतन्त्रता, जो पहले राजतन्त्रों के पास थी और राष्ट्र राज्यों के बनने के बाद वहाँ के नागरिकों के पास आ गयी। 



 संहिता ऐसी नियमावली, जिसमें नियमों की विस्तृत सूची होती है।


मताधिकार किसी भी विषय के निर्णय अथवा सरकार को चुनने की प्रक्रिया में जनता को प्राप्त मत देने का अधिकार।


महासंघ-छोटी-छोटी इकाइयों से बना एक बड़ा संघ। यह राज्यों अथवा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि किसी भी प्रकार की इकाइयों का हो सकता है। में 


राष्ट्र राज्य-एक ऐसा आधुनिक राज्य, जिसमें एक केन्द्रीय शक्ति की प्रभुसत्ता हो तथा उसके शासकों व नागरिकों में एक साझा पहचान का भाव हो।



 जर्मेनिया यह जर्मन राष्ट्र का रूपक थी। इसे वीरता के प्रतीक बलूत के वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने हुए दर्शाया गया है।


मारीआन-फ्रांस में राष्ट्रीय भावना के रूपक के रूप में दर्शाई गयी एक नारी की छवि। यह ईसाइयों का लोकप्रिय नाम था और इसे सिक्कों और डाक टिकटों पर दर्शाया गया था।




महत्त्वपूर्ण तिथियाँ


• 1688 ई. -इंग्लैंड की गौरवमयी क्रांति


● 1707 ई. -इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच 'ऐक्ट ऑफ यूनियन' द्वारा 'यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन' का गठन।


• 1789 ई.-फ्रांसीसी क्रांति का आरम्भ और लुई सोलहवें के शासन का अन्त


● 1797 ई. - नेपोलियन का इटली पर हमला, नेपोलियाई युद्धों की शुरुआत


● 1801 ई.-यूनाइटेड किंगडम और आयरलैंड का मिलाप


● 1804 ई. -नेपोलियन द्वारा 'नागरिक संहिता' बनाया जाना


● 1807 ई.-ज्युसेपे मेत्सिनी का जन्म


● 1814-1815 ई.-नेपोलियन का पतन, वियना शांति संधि


● 1821 ई. -यूनानी स्वतन्त्रता संग्राम का आरम्भ


● 1830 ई. -फ्रांस की जुलाई क्रांति



● 1891 ई.-मेत्सिनी द्वारा 'यंग इटली' नामक संगठन का गठन


● 1832 ई. -यूनान एक स्वतन्त्र राष्ट्र बना


● 1848 ई. -फ्रांस की क्रांति, आर्थिक परेशानियों से ग्रस्त कारीगरों, औद्योगिक मजदूरों और किसानों की बगावत, मध्यवर्ग द्वारा संविधान व प्रतिनिध्यात्मक सरकार के गठन की माँग, इतालवी, जर्मन, मैग्यार, पोलिश, चेक आदि की राष्ट्र-राज्यों की माँग।


● 1859-1870 ई. -इटली का एकीकरण


● 1861 ई. -इमेनुएल द्वितीय इटली का शासक बना


● 1866 ई.-ऑस्ट्रिया और प्रशा के बीच युद्ध


● 1866-1871 ई. -जर्मनी का एकीकरण


● 1870 ई. -इटली के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी होना


• 1871 ई. -जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी होना


● 1905 ई. -हैब्सबर्ग और ऑटोमन साम्राज्यों में स्लाव राष्ट्रवाद का मजबूत होना


• 1914 ई.-प्रथम विश्वयुद्ध का आरम्भ




बहुविकल्पीय प्रश्न 1 अंक


प्रश्न 1. इनमें से किस वर्ष में फ्रांस में नागरिक संहिता, जिसे नेपोलियन की संहिता के नाम से भी जाना जाता है, का उदय हुआ?


(क) 1800 ई.


(ख) 1802 ई.


(ग) 1804 ई.


(घ) 1806 ई.


उत्तर-(ग) 1804 ई.



प्रश्न 2.'यंग इटली सोसाइटी' का संस्थापक कौन था?



(क) गैरीबॉल्डी 


(ख) बिस्मार्क


 (ग) काबूर


(घ) मेजिनी


उत्तर-


(घ) मेजिनी


प्रश्न 3. फ्रांस में गणतंत्र की घोषणा किस वर्ष हुई?


(क) 1815 ई.


(ख) 1830 ई.


(ग) 1848 ई.


(घ) 1871 ई.


उत्तर- (ग) 1848 ई.




प्रश्न 4.निम्न में से किस संधि के फलस्वरूप यूनान को एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में मान्यता मिली?


(क) पेरिस की संधि


(ख) वर्साय की संधि


(ग) वियना की संधि


(घ) कुस्तुनतुनिया की संधि


उत्तर(घ) कुस्तुनतुनिया की संधि


प्रश्न 5.निम्न में से यह किसका कथन है-"जब फ्रांस छींकता है, तो बाकी यूरोप को सर्दी-जुकाम हो जाता है?”


(क) मैटरनिख 


(ख) कावूर 


(ग) बिस्मार्क 


(घ) मेत्सिनी


उत्तर-


(क) मैटरनिख


प्रश्न 6.फ्रांस की क्रांति हुई



(क) 1788 ई. 


(ख) 1789 ई.


(ग) 1790 ई.


 (घ) 1787 ई.


उत्तर-


(ख) 1789 ई.


प्रश्न 7.राष्ट्रवाद का प्रारम्भ जिस देश से हुआ, वह है



(क) जमनी


(ख) इटली


(ग) फ्रांस


(घ) इंग्लैण्ड


उत्तर- (ग) फ्रांस



प्रश्न 8.जर्मनी को किस वर्ष एक स्वतन्त्र राज्य घोषित किया गया?


(क) 1871 ई. 


(ख) 1872 ई.


 (ग) 1876 ई.


 (घ) 1880 ई.


उत्तर- (क) 1871 ई.


प्रश्न 9.जर्मनी का एकीकरण का श्रेय इनमें से किसे दिया जाता है? 


(क) ऑटो वॉन बिस्मार्क


(ख) काइजर विलियम प्रथम


(ग) हिटलर


(घ) मेत्सिनी


उत्तर-


(क) ऑटो वॉन बिस्मार्क


प्रश्न 10. नेपोलियन का सम्बन्ध किस देश से था?




(क) जर्मनी


(ख) इटली 


(ग) फ्रांस


(घ) इंग्लैंड


उत्तर-


(ग) फ्रांस


प्रश्न 11. इटली का एकीकरण किसके नेतृत्व में किया गया?


(क) ज्युसेपे गैरीबॉल्डी


(ख) ऑटो वान बिस्मार्क


(ग) नेपोलियन


(घ) विलियम प्रथम


उत्तर-


(क) ज्युसेपे गैरीबॉल्डी


प्रश्न 12.1848 की फ्रांसीसी राज्य क्रांति के फलस्वरूप


(क) निरंकुश राजतंत्र की स्थापना हुई।


(ख) सीमित राजतंत्र की स्थापना हुई।


(ग) सैन्य शासन की स्थापना हुई।


(घ) गणतंत्र की स्थापना हुई।


उत्तर


(घ) गणतंत्र की स्थापना हुई।




अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक


प्रश्न 1. किस प्रसिद्ध फ्रांसीसी चित्रकार ने चार चित्रों की श्रृंखला बनाई?



 उत्तर- फ्रेडरिक सॉरयू ने (1848 ई. में)।



प्रश्न 2. उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में राजनीतिक एवं मानसिक जगत् भारी परिवर्तन आने के क्या कारण थे? 


उत्तर- राष्ट्र राज्य का उदय।


प्रश्न 3. निरंकुशवाद से क्या तात्पर्य है?


उत्तर- एक ऐसी सरकार या शासन-व्यवस्था जिसका सत्ता पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं होता। ऐसी सरकार जनता के अनुकूल कार्य नहीं करती। ये अत्यंत केंद्रीकृत, सैन्य बल पर आधारित और दमनकारी सरकारें होती थीं।


प्रश्न 4. जर्मनी के एकीकरण में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान किसका था? जर्मन राष्ट्र का प्रथम सम्राट कौन घोषित किया गया? 


 उत्तर- जर्मनी के एकीकरण में ऑटो वॉन बिस्मार्क का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान था। प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मन राष्ट्र का प्रथम सम्राट घोषित किया गया।


प्रश्न 5. जनमत संग्रह क्या है?


उत्तर- जनमत संग्रह एक प्रत्यक्ष मतदान है जिसके जरिए एक क्षेत्र के सभी लोगों से एक प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए पूछा जाता है।


प्रश्न 6. उदारवाद क्या है?


उत्तर


उदारवाद liberalism शब्द का हिंदी रूपांतरण है। liberalism शब्द लैटिन भाषा के liber पर आधारित है, जिसका अर्थ है-स्वतंत्रता। नए मध्य वर्गों के लिए उदारवाद का मतलब था-व्यक्ति के लिए आजादी और

कानून के समक्ष सबकी बराबरी।


प्रश्न 7. नृजातीय शब्द का अर्थ बताइए। 


उत्तर- एक साझा नस्ली जनजातीय या सांस्कृतिक उद्गम अथवा पृष्ठभूमि जिसे कोई समुदाय अपनी पहचान मानता है।




प्रश्न 8.. जर्मन राष्ट्र का रूपक क्या था? वह किस बात का प्रतीक था?


उत्तर- जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र की रूपक थी। चाक्षुष अभिव्यक्तियों में जर्मेनिया बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहनती है क्योंकि जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है।


प्रश्न 9. नारीवाद क्या था?


उत्तर- स्त्री-पुरुष को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समानता की सोच के आधार पर महिलाओं के अधिकारों और हितों का बोध नारीवाद है।


प्रश्न 10. ऑटो वॉन बिस्मार्क को जर्मनी के एकीकरण का जनक क्यों कहा जाता है? दो कारण लिखिए।


उत्तर- (i) बिस्मार्क ने सुधार एवं कूटनीति के अंतर्गत जर्मनी के क्षेत्रों का प्रशाकरण अथवा प्रशा का एकीकरण करने का प्रयास किया।


(ii) बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए 'रक्त और लौह की नीति का पालन किया। इस नीति से तात्पर्य था कि सैन्य उपायों द्वारा ही जर्मनी का एकीकरण करना।



लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक


प्रश्न 1. यूरोप में 'राष्ट्र के विचार के निर्माण में संस्कृति ने किस प्रकार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। 


उत्तर- यूरोप में राष्ट्र के विचार के निर्माण में संस्कृति ने निम्नलिखित भूमिका निभाई


(i) यूरोप में कला, काव्य, कहानियों, किस्सों और संगीत ने राष्ट्रवादी भावनाओं को निर्मित करने और उन्हें व्यक्त करने में काफी सहयोग दिया। जर्मनी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।


(ii) रूमानी कलाकारों और कवियों ने एक साझा संस्कृति तथा साझा सामूहिक विरासत की अनुभूति को राष्ट्र का आधार बनाया। ग्रीक इसका एक अच्छा उदाहरण है।


(iii) राष्ट्रीय संदेश को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए स्थानीय बोलियों पर बल दिया गया और स्थानीय लोक साहित्य को एकत्र किया गया। उदाहरण-पोलैंड व जर्मनी आदि।


(iv) राष्ट्रवाद की भावना को जिंदा रखने के लिए संगीत का उपयोग किया गया। भाषा ने इसमें विशेष योगदान दिया।


प्रश्न 2."ज्युसेपे मेत्सिनी और कावूर ने इटली के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।


उत्तर- 1830 के दशक में ज्युसेपे मेत्सिनी ने एकीकृत इतालवी गणराज्य के लिए एक सुविचारित कार्यक्रम प्रस्तुत करने की कोशिश की थी। उसने अपने उद्देश्यों के प्रसार के लिए यंग इटली नामक एक गुप्त संगठन भी बनाया था। 1831 से 1848 तक क्रांतिकारी विद्रोह हुए लेकिन इसे असफलता हाथ लगी। सार्डिनिया पीडमॉण्ट के राजा विक्टर इमेनुएल द्वितीय के मंत्री प्रमुख कावूर ने इटली के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने इटली के प्रदेशों को एकीकृत करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया न तो वह एक क्रांतिकारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखने वाला। इतालवी अभिजात वर्ग के तमाम अमीर और शिक्षित सदस्यों की तरह वह इतालवी भाषा से कहीं बेहतर फ्रेंच बोलता था। फ्रांस से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट की एक चतुर कूटनीतिक संधि, जिसके पीछे कावूर का हाथ था, से वह 1859 में ऑस्ट्रिया को हराने में कामयाब रहा।


प्रश्न 3. "नेपोलियन ने निःसंदेह फ्रांस में लोकतंत्र को नष्ट किया था, परंतु प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सिद्धांतों का समावेश किया था,

ताकि पूरी व्यवस्था अधिक तर्कसंगत और कुशल बन सके।" इस कथन की पुष्टि कीजिए।



उत्तर नेपोलियन ने नि:संदेह फ्रांस में लोकतंत्र को नष्ट किया था परंतु प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सिद्धांतों का समावेश किया था ताकि पूरी व्यवस्था अधिक तर्कसंगत और कुशल बन सके। 1804 ई. की नागरिक संहिता (जिसे आमतौर पर नेपोलियन की संहिता के नाम से जाना जाता है),


के तहत निम्नलिखित परिवर्तन किए गए थे


 (1) जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए थे।


(ii) उसने कानून के समक्ष बराबरी और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया।


 (iii) डच गणतंत्र, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया। सामंती व्यवस्था को खत्म किया।


(iv) किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई।


 (v) शहरों में भी कारीगरों के श्रेणी संघों के नियंत्रणों को हटा दिया गया।


 (vi) यातायात और संचार व्यवस्थाओं को सुधारा गया।



प्रश्न 4. 1848 की उदारवादियों की क्रांति में किन विचारों को आगे बढ़ाया गया?


उत्तर 1848 में जब अनेक यूरोपीय देशों में किसान और मज़दूर विद्रोह कर रहे थे तब वहाँ पढ़े-लिखे मध्य वर्गों की एक क्रांति भी हो रही थी। इस क्रांति से राजा को गद्दी छोड़नी पड़ी थी और एक गणतंत्र की घोषणा की गई जो सभी पुरुषों के सार्विक मताधिकार पर आधारित थी। यूरोप के अन्य भागों में न जहाँ अभी तक स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में नहीं आए थे; जैसे-जर्मनी, इटली, पोलैंड। वहाँ के उदारवादी मध्यम वर्गों ने संविधानवाद की माँग को राष्ट्रीय एकीकरण की माँग से जोड़ दिया। उन्होंने बढ़ते जन-असंतोष का फायदा उठाया और एक राष्ट्र राज्य के निर्माण की मांगों को आगे बढ़ाया। यह राष्ट्र राज्य संविधान, प्रेस की स्वतंत्रता और संगठन बनाने की आजादी जैसे संसदीय सिद्धांतों पर आधारित था।



प्रश्न 5. 1848 की उदारवादी क्रांति का क्या परिणाम हुआ?


उत्तर- रूढ़िवादी शक्तियाँ 1848 में उदारवादी आंदोलनों को दबा पाने में कामयाब हुईं किंतु वे पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं कर पाईं। राजाओं को यह वे समझ में आना शुरू हो गया था कि उदारवादी राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों को रियायतें देकर ही क्रांति को समाप्त किया जा सकता था। अत: 1848 के बाद के वर्षों में मध्य और पूर्वी यूरोप की निरंकुश राजशाहियों ने उन परिवर्तनों को प्रारंभ किया जो पश्चिमी यूरोप में 1815 से पहले हो चुके थे। इस प्रकार हैब्सबर्ग अधिकार वाले क्षेत्रों और रूस से भू-दासत्व और बँधुआ समाप्त कर दी गई हैब्सबर्ग शासकों ने हंगरी के लोगों को ज्यादा स्वायत्तता प्रदान की हालाँकि इससे निरंकुश मैग्यारों के प्रभुत्व का रास्ता ही साफ हुआ।


प्रश्न 6. उदारवाद की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।



 उत्तर- उदारवाद लैटिन भाषा के शब्द 'लिबर' से बना है, जिसका अर्थ है-आजाद। नए मध्यम वर्गों के लिए उदारवाद का अर्थ था-व्यक्ति के लिए आज़ादी और कानून के समक्ष बराबरी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थी


(i) उदारवाद एक ऐसी सरकार पर ज़ोर देता था जो सहमति से बनी हो। 


(ii) उदारवाद निरंकुश शासक और पादरी वर्ग के विशेषाधिकारों की समाप्ति, संविधान तथा संसदीय प्रतिनिधि सरकार का पक्षधर था। 


(iii) 19वीं सदी के उदारवादी निजी संपत्ति के स्वामित्व की अनिवार्यता पर भी बल देते थे।


 (iv) आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद, बाज़ारों की मुक्ति और चीजों तथा पूँजी के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को खत्म करने के पक्ष में था। ये एक ऐसे एकीकृत आर्थिक क्षेत्र में निर्माण के पक्ष में थे जहाँ वस्तुओं, लोगों और पूँजी का आवागमन बाधारहित हो।



प्रश्न 7. नेपोलियन द्वारा किए गए सुधारों का वर्णन कीजिए।


 उत्तर- नेपोलियन बोनापार्ट विश्व के महानतम व्यक्तियों में से एक था। उसके असाधारण कार्यों और आश्चर्यजनक विजयों ने 1799 ई. से 1815 ई.तक सम्पूर्ण यूरोप को प्रभावित किया। उसके प्रमुख सुधार निम्नलिखित हैं 


1. शासन सम्बन्धी सुधार नेपोलियन की शासन व्यवस्था प्रतिभा, व्यापकता और कार्यक्षमता के सिद्धान्तों पर आधारित थी। देश की अराजकता को समाप्त करने के लिए उसने शासन का केन्द्रीकरण कर दिया।


2. आर्थिक सुधार- नेपोलियन ने पेरिस में बैंक ऑफ फ्रांस की स्थापना कराई। मादक द्रव्यों, नमक आदि पर कर लगाया, मजदूरों का वेतन निश्चित किया, चोरबाजारी, सट्टेबाजी, मुनाफाखोरी को समाप्त किया। 


3. धार्मिक सवार-नेपोलियन ने अपने देशवासियों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान करने का प्रयत्न किया। राज्य की ओर से सभी को अपने धर्म काआचरण करने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई थी।



 4. न्याय सम्बन्धी सुधार- नेपोलियन ने फ्रांस के लिए विधि संहिताओं का निर्माण करवाया। इसे 'नेपोलियन कोड' के नाम से भी जाना गया। नेपोलियन का यह कार्य फ्रांस को एक स्थायी देन थी।


5. शिक्षा सम्बन्धी सुधार-नेपोलियन ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने फ्रांस में राष्ट्रीय शिक्षा की नींव डाली और पेरिस में एक विश्वविद्यालय की स्थापना भी की।


6. सार्वजनिक सुधार - नेपोलियन ने सार्वजनिक हित के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने बेरोजगारी को दूर किया। आवागमन को सुगम बनाने के लिए 229 पक्की सड़कों का निर्माण कराया।



 प्रश्न 8. यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का क्या योगदान था?


उत्तर- यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को निम्नलिखित उदाहरणों से समझा जा सकता है 


प्रथम उदाहरण के रूप में हम रूमानीवाद नामक सांस्कृतिक आन्दोलन को ले सकते हैं। रूमानीवाद एक ऐसा सांस्कृतिक आन्दोलन था जो विशिष्ट प्रकार की राष्ट्रीय भावना का विकास करना चाहता था।


द्वितीय उदाहरण के रूप में हम क्षेत्रीय बोलियों को ले सकते हैं। क्षेत्रीय बोलियाँ राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती थीं, क्योंकि यही यथार्थ रूप में आधुनिक राष्ट्रवादियों के सन्देश को अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँचाती थीं जो अधिकांशतः निरक्षर थे।


तृतीय उदाहरण के रूप में हम संगीत को ले सकते हैं। कैरोल कुर्पिस्की, एक पोलिश नागरिक, ने राष्ट्रीय संघर्ष का अपने ऑपेरा में संगीत के रूप में गुणगान किया और पोलेनेस और माजुरला जैसे लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया।


प्रश्न 9. रेनन की समझ के अनुसार एक राष्ट्र की विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण दें। उसके मतानुसार राष्ट्र क्यों महत्त्वपूर्ण है? 


उत्तर- रेनन की समझ के अनुसार एक राष्ट्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं


(i) रेनन के अनुसार एक राष्ट्र तब बनता है जब वहाँ के लोगों द्वारा लंबे प्रयास और निष्ठा से इसके लिए काम किया जाता है। 


(ii) अतीत में समान गौरव का होना, वर्तमान में समान इच्छा संकल्प का होना, साथ मिलकर महान काम करना और आगे ऐसे काम और करने की इच्छा एक जनसमूह होने की यह सब ज़रूरी शर्तें हैं।


(iii) राष्ट्र एक बड़ी और व्यापक एकता है। उसका अस्तित्व रोज़ होने वाला जनमत संग्रह है...। प्रांत उसके निवासी हैं; अगर सलाह लिए जाने का किसी को अधिकार है तो वह निवासी ही है, किसी देश का विलय करने या किसी देश पर उसकी इच्छा के विरुद्ध कब्ज़ा जमाए रखने में एक राष्ट्र की वास्तव में कोई दिलचस्पी होती नहीं है। 


(iv) राष्ट्रों का अस्तित्व में होना एक अच्छी बात ही नहीं है, बल्कि यह एक ज़रूरत भी है। उनका होना स्वतंत्रता की गारंटी है और अगर दुनिया में केवल एक कानून और उसका केवल एक मालिक होगा तो स्वतंत्रता का लोप हो जाएगा।


प्रश्न 10. जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ या जर्मनी का एकीकरण कब और कैसे हुआ?


उत्तर- राष्ट्रवादी भावनाएँ मध्यमवर्गीय जर्मन लोगों में काफी व्याप्त थीं। उन्होंने 1848 में जर्मन महासंघ के विभिन्न इलाकों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयास किया था। मगर इस पहल को राजशाही और फौज की ताकत ने मिलकर दबा दिया। उनका प्रशा के बड़े भू-स्वामियों ने भी समर्थन किया। उसके बाद प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन का नेतृत्व सँभाल लिया। उसका मुख्य मंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क इस प्रक्रिया का जनक था, जिसने प्रशा की सेना और नौकरशाही की मदद ली। 7 वर्ष के दौरान ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस से तीन युद्धों में प्रशा की जीत हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। जनवरी 1871 में वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया। इस तरह 1871 में जर्मनी का एकीकरण हुआ।


प्रश्न 11. फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या कदम उठाए ?


उत्तर

 प्रारंभ से ही फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने ऐसे अनेक कदम उठाए, जिनसे फ्रांसीसी लोगों में एक सामूहिक पहचान की भावना उत्पन्न हो सकती थी। ये कदम निम्नलिखित थे


(i) पितृभूमि और नागरिक जैसे विचारों ने एक संयुक्त समुदाय के विचार पर बल दिया, जिसे एक संविधान के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त थे। 


(ii) एक नया फ्रांसीसी झंडा चुना गया, जिसने पहले के राष्ट्रध्वज की जगह ले ली।


(iii) स्टेट जनरल का चुनाव सक्रिय नागरिकों के समूह द्वारा किया जाने लगा और उसका नाम बदलकर नेशनल एसेंबली कर दिया गया।


 (iv) नई स्तुतियाँ रची गईं, शपथें ली गईं, शहीदों का गुणगान हुआ और यह सब राष्ट्र के नाम पर हुआ।


(v) एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई, जिसने अपने भू-भाग में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनाए।


 (vi) आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क समाप्त कर दिए गए और भार तथा नापने की एक समाने व्यवस्था लागू की गई।


 (vii) क्षेत्रिय बोलियों को हतोत्साहित किया गया और पेरिस में फ्रेंच जैसी बोली और लिखी जाती थी, वही राष्ट्र की साझा भाषा बन गई।


प्रश्न 12. मारीआन और जर्मेनिया कौन थे? जिस तरह उन्हें चित्रित किया गया उसका क्या महत्त्व था?



उत्तर फ्रांसीसी क्रांति के समय कलाकारों ने स्वतंत्रता, न्याय और गणतंत्र जैसे विचारों को व्यक्त करने के लिए नारी प्रतीकों का सहारा लिया। इनमें मारीआन और जर्मेनिया अत्यधिक प्रसिद्ध हैं।


मारीआन – यह लोकप्रिय ईसाई नाम है। अतः फ्रांस ने अपने स्वतंत्रता के नारी प्रतीक को यही नाम दिया। यह छवि जन राष्ट्र के विचार का प्रतीक थी। इसके चिह्न स्वतंत्रता व गणतंत्र के प्रतीक लाल टोपी, तिरंगा और कलगी थे। मारीआन की प्रतिमाएँ सार्वजनिक चौराहों और अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर लगाई गई ताकि जनता को राष्ट्रीय एकता के राष्ट्रीय प्रतीक की याद आती रहे और वह उससे अपना तादात्मय (तालमेल) स्थापित कर सके। मारीआन की छवि सिक्कों डाक टिकटों पर अंकित की गई थी।


 जर्मेनिया - यह जर्मन राष्ट्र की नारी रूपक थी। चाक्षुष अभिव्यक्तियों में वह

 बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहनती है क्योंकि जर्मनी में बलूत वीरता का प्रतीक है, उसने हाथ में जो तलवार पकड़ी हुई थी उस पर यह लिखा हुआ है "जर्मन तलवार जर्मन राइन की रक्षा करती है।" इस प्रकार जर्मेनिया, जर्मनी में स्वतंत्रता, न्याय और गणतंत्र की प्रतीक बनकर उभरी एक नारी छवि थी।


प्रश्न 13. बाल्कन प्रदेशों में राष्ट्रवादी तनाव क्यों पनपा?


उत्तर. 1871 ई. के बाद यूरोप में बाल्कन क्षेत्र (प्रदेश) गंभीर राष्ट्रवादी तनाव का क्षेत्र बन गया। इस राष्ट्रवादी तनाव के निम्नलिखित कारण थे 


(i) इस क्षेत्र की अपनी भौगोलिक व जातीय भिन्नता थी।


(ii) इस क्षेत्र में आधुनिक यूनान, रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्वेरिया, मेसिडोनिया, क्रोएशिया, बोस्निया हर्जेगोविना, स्लोवेनिया, सर्बिया, मॉन्टिनिग्रो आदि देश थे जहाँ पर स्लाव भाषा बोलने वाले लोग रहते थे। ये सभी तुर्कों से भिन्न थे।


(iii) तुर्की और इन ईसाई प्रजातियों के बीच मतभेदों के कारण यहाँ पर हालात भयंकर हो गए।


(iv) जब स्लाव राष्ट्रीय समूहों में स्वतंत्रता व राष्ट्रवाद का विकास हुआ। तो तनाव की स्थिति और भी भयंकर हो गई।


(v) इस कारण इन राज्यों में आपसी प्रतिस्पर्धा और हथियारों की होड़ लग गई। इसने स्थिति को और गंभीर बना दिया।


(vi) यूरोपीय देश (रूस, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी) भी इन क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे ताकि काला सागर से होने वाले व्यापार और व्यापारिक मार्ग पर उनका नियंत्रण हो। उपर्युक्त कारणों से इस क्षेत्र में यूरोपीय देशों और इन राज्यों में आपस में कई युद्ध हुए, जिसका अंतिम परिणाम प्रथम विश्वयुद्ध के रूप में सामने आया।




दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 6 अंक




प्रश्न 1. किन्हीं दो देशों पर ध्यान केंद्रित करते हुए बताएँ कि 19वीं सदी में राष्ट्र किस प्रकार विकसित हुए?



उत्तर- 19वीं शताब्दी में लगभग पूरे यूरोप में राष्ट्रीयता का विकास हुआ जिस कारण राष्ट्र राज्यों का उदय हुआ। इनमें बेल्जियम व पोलैंड भी ऐसे ही देश थे। 1815 ई. में नेपोलियन की हार के बाद वियना संधि द्वारा बेल्जियम और पोलैंड को मनमाने तरीके से अन्य देशों के साथ जोड़ दिया गया, जिनका आधार यूरोपीय सरकारों की यह रूढ़िवादी विचारधारा थी कि राज्य व समाज की स्थापित पारंपरिक संस्थाएँ; जैसे— राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ऊँच-नीच, संपत्ति और परिवार आदि बने रहने चाहिए। इसका बेल्जियम व पोलैंड ने विरोध किया। अपने को स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य के रूप में स्थापित किया। इनका निर्माण इस प्रकार हुआ


1. बेल्जियम - वियना कांग्रेस द्वारा बेल्जियम को हॉलैंड के साथ मिला दिया गया। परंतु दोनों देशों में ईसाई धर्म के कट्टर विरोधी मतानुयायी रहते थे। जहाँ बेल्जियम में कैथोलिक थे, वहीं हॉलैंड में प्रोटेस्टेट । हॉलैंड का शासक भी हॉलैंडवासियों को बेल्जियमवासियों से श्रेष्ठ मानता था। अत: इस श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए उसने सभी स्कूलों में प्रोटेस्टेंट धर्म की शिक्षा देने की राजाज्ञा जारी की। इसका बेल्जियमवासियों ने कड़ा विरोध किया, इसमें इंग्लैंड ने उनका साथ दिया जिस कारण हॉलैंड को बेल्जियम को 1830 में स्वतंत्र करना पड़ा। बाद में यहाँ पर इंग्लैंड जैसी संवैधानिक व्यवस्था कायम हुई।


2. पोलैंड-वियना संधि द्वारा ही पोलैंड को दो भागों में बाँटा गया और इसका बड़ा भाग रूस को इनाम के तौर पर दे दिया गया। परंतु जब वहाँ के लोगों में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ तो 1848 में पोलैंड और वारसा में क्रांति आरंभ हुई। इसे रूसी सेनाओं ने कठोरता से दबा दिया, परंतु राष्ट्रवादियों ने हार नहीं मानी और दुबारा विद्रोह किया, जिसमें उन्हें सफलता मिली।


प्रश्न 2. यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को दर्शाने के


(NCERT)


लिए तीन उदाहरण दीजिए। उत्तर- राष्ट्रवाद के विकास में नवीन परिस्थितियों, जैसे कि युद्ध, क्षेत्रीय विस्तार, शिक्षा आदि का जितना योगदान रहा है, उतना ही योगदान संस्कृति का


भी रहा है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित है


1. फ्रेडरिक सॉरयू का युटोपिया - 1848 ई. में फ्रांस के फ्रेडरिक सॉरयू ने चार चित्रों की एक श्रृंखला बनाई, जिसके द्वारा विश्वव्यापी प्रजातांत्रिक और सामाजिक गणराज्यों के स्वप्न को साकार रूप देने का प्रयास किया गया। उसने कल्पना पर आधारित आदर्श राज्य या समाज (युटोपिया) को दर्शाया। इन चित्रों में सभी स्त्री, पुरुषों और बच्चों को स्वतंत्रता की प्रतिमा की वंदना करते हुए दिखाया गया है। जिनके हाथों में मशाल व मानव के अधिकारों का घोषणा-पत्र है। इनमें उनकी पोशाकों को भी राष्ट्रीय आधार देने के लिए एक जैसी रखी गई, तिरंगे झंडे, भाषा व राष्ट्रगान द्वारा भी राष्ट्र राज्य के रूप को प्रकट करने का प्रयास किया गया।


2. कार्लकैस्पर फ्रिट्ज का स्वतंत्रता के वृक्ष का रोपण-जर्मन चित्रकार कार्लकैस्पर फ्रिट्ज ने स्वतंत्रता के वृक्ष का रोपण करते हुए एक चित्र बनाया है। इसकी पृष्ठभूमि में फ्रेंच सेनाओं को ज्वेब्रकेन शहर पर कब्जा करते हुए दिखाया गया। इसमें फ्रांसीसी सैनिकों को नीली, सफेद व लाल पोशाकों में दिखाया गया है जो वहाँ के नागरिकों का दमन कर रहे हैं, जैसे-किसी किसान की गाड़ी छीन रहे हैं, कुछ महिलाओं को तंग कर रहे हैं या किसी को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर रहे हैं। अतः शोषितों द्वारा जो स्वतंत्रता का वृक्ष रोपते हुए दर्शाया गया है उस पर एक तख्ती लगी है जिस पर जर्मन में लिखा हुआ है—“हमसे आज़ादी और समानता ले लो - यह मानवता का आदर्श रूप है।" यह एक तरह से फ्रांसीसियों पर किया गया व्यंग्य था क्योंकि वे कहते थे कि वे जहाँ जाते हैं, वहाँ राजतंत्र का अंत करके नई आदर्श व्यवस्था कायम करते हैं यानी वे मुक्तिदाता


3. यूजीन देलाक्रोआ की 'द मसैकर ऐट किऑस'- फ्रांस के रूमानीवादी चित्रकार देलाक्रोआ ने 1824 ई. में एक चित्र बनाया था। इसमें एक घटना को चित्रित किया गया है जब तुर्कों ने 20,000 यूनानियों को मार डाला था। इसे किऑस द्वीप कहा जाता है। इसमें महिलाओं व बच्चों की पीड़ा को केन्द्रबिंदु बनाया गया है जिसे चटकीले रंगों से रँगा गया है ताकि देखने वालों की भावनाएँ जागृत हों और उनके मन में यूनानियों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो। इस प्रकार कलाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद को उभारा और संस्कृति का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।


प्रश्न 3.1789 की फ्रांसीसी क्रांति का फ्रांस व यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ा?


या फ्रांस की क्रांति के दो परिणाम बताइए। 



उत्तर- 1789 में फ्रांस में जो क्रांति हुई उसके फ्रांस और यूरोप पर निम्नलिखित व्यापक प्रभाव पड़े थे फ्रांस पर प्रभाव


(i) लुई वंश के शासन का अंत हुआ और उसके स्थान पर लोकतांत्रिक शासन की स्थापना हुई।


(ii) सरकार द्वारा लोक-कल्याणकारी कार्य किए गए, जैसे-सड़कों, पुलों, नहरों, अस्पतालों, बाँधों, स्कूलों आदि का निर्माण। 


(iii) समानता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व की भावना से भरे हुए नए समाज की नींव रखी गई।


(iv) न्याय व्यवस्था का पुनर्गठन करके देश के लिए नवीन कानून संहिता लागू की गई।


(v) प्रभुसत्ता, राजतंत्र के हाथों से निकलकर जनता में निवास करने लगी।


(vi) इस्टेट जनरल के स्थान पर सक्रिय नागरिकों द्वारा चुनी गई नेशनल एसेंबली का गठन किया गया।


 (vii) फ्रेंच भाषा को राष्ट्र भाषा और फ्रेंच तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज घोषित किया गया।


(viii) आंतरिक आयात-निर्यात शुल्क हटा दिए गए। साथ ही भार व नाप की एकसमान व्यवस्था लागू की गई। 


(ix) शासक और पादरी वर्ग के विशेषाधिकारों का अंत किया गया तथा कानून के समक्ष सबको बराबर माना गया। संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया गया। 



यूरोप पर प्रभाव


 (i) यूरोप में भी राष्ट्रवाद को मजबूती मिली और राष्ट्र राज्यों का उदय होने लगा।


(ii) लोकतंत्रीय सिद्धांत को विश्व आधार मिला तथा 'सरकार जनता द्वारा और जनता के लिए होनी चाहिए' इस विचार को बल मिला।


 (iii) यूरोप में भी समाजवादी विचारधारा का प्रचार होने लगा, जिस कारण सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समानता के सिद्धांतों पर बल दिया जाने लगा।


(iv) यूरोप के अन्य राष्ट्र के लोग भी मानवीय अधिकारों की माँग करने लगे।


(v) यूरोप के निरंकुश राजतंत्रों ने अपने यहाँ क्रांतिकारियों का दमन करना आरंभ कर दिया।


प्रश्न 4. फ्रांस की क्रांति के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।


 उत्तर- 1789 ई. में फ्रांस में एक क्रांति हुई जिसके द्वारा वहाँ पर लुई वंश की गई। इस क्रांति के शासन का अंत हुआ और वहाँ पर लोकतंत्र की स्थापना के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे


1. अयोग्य शासक–फ्रांस की क्रांति के समय यहाँ पर लुई वंश का शासन था जिसका शासक लुई XVI था। वह एक अयोग्य, जिद्दी और अदूरदर्शी, कर्त्तव्यहीन शासक था। वह सुधारों का पक्षधर नहीं था बल्कि अपनी निरंकुशता को कायम रखना चाहता था। इस कारण जनता उसके विरुद्ध हो गई।


2. मध्यम वर्ग–यहाँ पर औद्योगिक क्रांति होने के कारण मध्यम वर्ग का उदय हो गया था जिसमें छोटे उद्योगपति, डॉक्टर, वकील, अध्यापक और निम्न पदों पर कार्य करने वाले अधिकारी आते थे। यह वर्ग नवीन विचारों और राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत था और लोकतंत्र का पक्षधर और निरंकुश राजशाही का विरोधी था। अतः जब जनता राजशाही के विरुद्ध हुई तो इसने उसका पूर्ण समर्थन किया।


3. आम जनता की दयनीय स्थिति-इस समय शासक, उच्च वर्ग और कुलीन वर्ग जहाँ विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा था, वहीं आम जनता की स्थिति बड़ी दयनीय थी तथा लोग रोजी-रोटी को तरस रहे थे।



4. मजदूर वर्ग की दुर्दशा- इस समय फ्रांस में जो उद्योग स्थापित हुए थे, उनमें मजदूरों के कार्य करने के लिए स्वास्थ्यवर्धक परिस्थितियाँ नहीं थीं। इनके काम के घंटे निश्चित नहीं थे, न ही प इन्हें उचित वेतन मिलता था। यदि कोई मजदूर किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता था तो उद्योगपति उसे मुआवजा नहीं देते थे। इस कारण इस वर्ग में असंतोष था। मौका आते ही यह वर्ग क्रांति का ने पक्ष लेने लगा।


5. दार्शनिकों का प्रभाव- इस समय जो दार्शनिक वर्ग उदित हुआ उसने जनता को प्रशासन की दुर्दशा, न्याय व्यवस्था की कमियों व फ्रांसीसी समाज की बुराइयों से अवगत करवाया। इन्होंने जनता में क्रांतिकारी भावनाओं का संचार किया जिस कारण जनता क्रांति करने के लिए अग्रसर हो गई।


6. स्वतंत्रता पर प्रतिबंध - इस समय फ्रांसीसी सरकार ने लोगों की स्वतंत्रता पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा रखे थे, यहाँ तक कि उनके धार्मिक विश्वासों पर भी प्रतिबंध लगे हुए थे। फ्रांस में प्रोटेस्टेंट धर्मावलंबियों पर अत्याचार होते थे। इस पर सरकार ने न्याय व स्वतंत्रता की अवहेलना करते हुए 'लेत्र द काशे' (बिना कार बताए कैद के आदेश-पत्र) जारी करके स्थिति को और भी भयानक बना दिया, जिससे जनता में असंतोष की भावना जागृत हो गई और वह क्रांति के मार्ग पर बढ़ गई।


प्रश्न 5. अपने शासन वाले क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को ज्यादा कुशल बनाने के लिए नेपोलियन ने क्या बदलाव किए?


 उत्तर- नेपोलियन के नियंत्रण में जो क्षेत्र आया वहाँ उसने अनेक सुधारों की शुरुआत की। उनके द्वारा किए गए सुधार निम्नलिखित थे


 (i) प्राचीन सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक व्यवस्था को नष्ट किया गया।


(ii) सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए निम्न व उच्च वर्ग के भेद को खत्म किया गया।


(iii) 1804 ई. की नेपोलियन संहिता ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए थे। उसने कानून के समक्ष समानता और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया।


(iv) समान कर प्रणाली लागू की गई। प्रतिष्ठा मंडल की स्थापना करके विद्वानों, कलाकारों व देशभक्तों को सम्मानित किया गया।


(v) डच गणतंत्र, स्विट्जरलैंड, इटली और जर्मनी में नेपोलियन ने प्रशासनिक विभाजनों को सरल बनाया। 


(vi) सामंती व्यवस्था को खत्म किया और किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलाई।


 (vii) शहरों में कारीगरों के श्रेणी संघों के नियंत्रणों को हटा दिया गया।यातायात और संचार व्यवस्थाओं को सुधारा गया।


 (viii) आर्थिक सुधार करने के उद्देश्य से 'बैंक ऑफ फ्रांस' की स्थापना की गई। 


(ix) उसने दंड विधान को कठोर बनाया तथा जूरी प्रथा व मुद्रित पत्रों को पुनः प्रारंभ किया।


(x) शिक्षा की उन्नति के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ फ्रांस की स्थापना की, जहाँ लैटिन, फ्रेंच भाषा, साधारण विज्ञान व गणित की मुख्य तौर पर शिक्षा दी जाती थी।


(xi) कैथोलिक धर्म को राजधर्म बनाया। इस प्रकार किसानों, कारीगरों, मजदूरों और नए उद्योगपतियों ने नई-नई मिली आजादी को चखा।


प्रश्न 6. वियना संधि क्या थी? इसके प्रमुख उद्देश्यों और व्यवस्थाओं का वर्णन कीजिए। 



या वियना कांग्रेस सम्मेलन कब और कहाँ हुआ?



उत्तर 1815 ई. में ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया जैसी यूरोपीय शक्तियों, जिन्होंने मिलकर नेपोलियन को हराया था, के प्रतिनिधि यूरोप के लिए  एक समझौता तैयार करने के लिए वियना में मिले। इस सम्मेलन की मेजबानी ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मैटरनिख ने की। इसमें प्रतिनिधियों ने 1815 ई. की वियना संधि तैयार की, जिसका उद्देश्य उन सारे बदलावों को खत्म करना था जो नेपोलियन युद्धों के दौरान हुए थे। इस संधि की मुख्य व्यवस्थाएँ निम्नलिखित थी




(i) फ्रांसीसी क्रांति के दौरान हटाए गए बूब वंश को सत्ता में बहाल किया गया और फ्रांस ने उन इलाकों को खो दिया जिन पर कब्जा उसने नेपोलियन के अधीन किया था।


 (ii) फ्रांस की सीमाओं पर कई राज्य कायम कर दिए गए ताकि भविष्य में फ्रांस विस्तार न कर सके।


 (iii) फ्रांस के उत्तर में नीदरलैंड्स का राज्य स्थापित किया गया, जिसमें बेल्जियम शामिल था और दक्षिण में पीडमॉण्ट में जेनेवा जोड़ दिया गया। 


(iv) प्रशा को उसकी पश्चिमी सीमाओं पर महत्त्वपूर्ण नए इलाके दिए गए जबकि ऑस्ट्रिया को उत्तरी इटली का नियंत्रण सौंपा गया।


 (v) नेपोलियन ने 39 राज्यों का जो जर्मन महासंघ स्थापित किया था, उसे बरकरार रखा गया।


(vi) पूर्व में रूस को पोलैंड का एक हिस्सा दिया गया जबकि प्रशा को मैक्सनी का एक हिस्सा प्रदान किया गया। 



(vii) इन सबका मुख्य उद्देश्य उन राजतंत्रों की बहाली था जिन्हें नेपोलियन ने बर्खास्त कर दिया था। साथ ही यूरोप में एक नयी रूढ़िवादी व्यवस्था कायम करने का लक्ष्य भी था।



प्रश्न 7. इटली के एकीकरण पर प्रकाश डालिए।


या इटली के एकीकरण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।


 या इटली के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तीन नेताओं के नाम लिखिए। 


 उत्तर- 19वीं शताब्दी में इटली के एकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जो निम्न प्रकार थी


(i) इस समय इटली अनेक वंशानुगत राज्यों व बहुराष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य में बिखरा हुआ था।


(ii) इतालवी भाषा संपूर्ण इटली में नहीं बोली जाती थी। अनेक स्थानों पर इसके अनेक रूप प्रचलित थे।


 (iii) 1830 के दशक में ज्युसेपे मेत्सिनी ने इटली को एकीकृत करने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किया और उसने यंग इटली नामक गुप्त संगठन स्थापित किया।


(iv) 1831 और 1848 में जो क्रांतिकारी विद्रोह असफल हुए उनके कारण इतालवी राज्यों में एक बिखराव आ गया जिन्हें संगठित करने के लिए सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के शासक विक्टर इमेनुएल द्वितीय आगे आया।


(v) सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के प्रधानमंत्री कावूर ने इटली के राज्यों को संगठित करने के लिए प्रारंभ हुए आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया और फ्रांस व सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के बीच एक कूटनीतिक संधि की। 


(vi) 1859 ई. में सार्डिनिया-पीडमॉण्ट ने ऑस्ट्रिया को पराजित किया। इस युद्ध में ज्युसेपे गैरीबॉल्डी के नेतृत्व में अनेक सैनिकों ने भी भाग लिया।


(vii) 1860 ई. में दक्षिणी इटली व दो सिसलियों के राज्यों में सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के सैनिकों ने प्रवेश किया। यहाँ पर स्थानीय किसानों की मदद से वे स्पेन को पराजित कर सके।



(vii) 1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया और 1870 में यह एकीकरण पूर्ण हुआ


 प्रश्न 8. यूरोप में राष्ट्रवाद के उत्थान के लिए कौन-से कारण उत्तरदायी थे? विस्तारपूर्वक लिखिए।


उत्तर- 18वीं शताब्दी के मध्य तक राष्ट्र राज्यों का उदय नहीं हुआ था। विभिन्न देश अलग-अलग भागों में, भाषाओं में, कैंटनों में बंटे हुए थे। किंतु 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक राष्ट्रवादी भावनाएँ फैलने लगी और राष्ट्र राज्यों का निर्माण हुआ। यूरोप में राष्ट्रवादी भावनाएँ फैलने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे


1. मध्यम वर्ग का उदय– 18वीं सदी तक यूरोप के विभिन्न देशों में दो प्रमुख वर्ग थे-कुलीन तथा दास या कृषक वर्ग। औद्योगीकरण के कारण नए सामाजिक समूह अस्तित्व में आए। श्रमिक वर्ग तथा मध्यम वर्ग जो उद्योगपतियों, व्यापारियों और सेवा क्षेत्र के लोगों से बने थे। इस वर्ग ने कुलीन विशेषाधिकारों की समाप्ति तथा शिक्षित और उदारवादी मध्यम वर्गों के बीच राष्ट्रीय एकता के विचारों को बढ़ाया।


2. उदारवादी विचारधारा का प्रारंभ-19वीं शताब्दी में यूरोप में एक नई विचारधारा (उदारवाद) पनपने लगी। नए मध्य वर्गों के लिए इसका अर्थ था-व्यक्ति के लिए आजादी और कानून के समक्ष सबकी बराबरी उदारवाद एक ऐसी सरकार पर जोर देता था जो आपसी सहमति से बनी हो। आर्थिक क्षेत्र में उदारवाद, बाजारों की मुक्ति और चीजों तथा पूँजी के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को समाप्त करने के पक्ष में था। नया व्यापारी वर्ग एक ऐसी आर्थिक नीति का पक्षधर था जहाँ वस्तुओं, लोगों, पूँजी का आवागमन बाधारहित हो। इस विचारधारा ने राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा दिया।


3. यूनान का स्वतंत्रता संग्राम-यूनान के स्वतंत्रता संग्राम ने पूरे यूरोप में राष्ट्रीय भावनाओं का संचार किया। यूनानियों का आजादी के लिए संघर्ष 1821 में प्रारंभ हुआ। 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी। इस स्वतंत्रता संग्राम ने यूरोप के अन्य देशों को भी एकीकरण करने के लिए प्रेरित किया।


4. संस्कृति की भूमिका- राष्ट्रवाद के विकास में युद्धों व क्रांतियों के साथ-साथ संस्कृति की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। कला, काव्य, कहानियों और संगीत ने राष्ट्रवादी भावनाओं को विकसित करने तथा व्यक्त करने में सहयोग दिया। राष्ट्र की सच्ची आत्मा लोकगीतों, जन-काव्य और लोक नृत्यों से प्रकट होती थी। स्थानीय बोलियों पर बल और लोक साहित्य को एकत्र करने का उद्देश्य राष्ट्रीय भावना को फैलाना था, ; जैसे—पोलैंड अब स्वतंत्र भू-क्षेत्र नहीं था किंतु संगीत और भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय संघर्ष का संगीत से गुणगान किया गया तथा विभिन्न लोकनृत्यों को राष्ट्रीय प्रतीकों में बदल दिया गया।


5. भाषा-भाषा ने राष्ट्रीय भावनाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। रूसी कब्जे के बाद पोलैंड में रूसी भाषा को लाद दिया गया। इसके सदस्यों ने राष्ट्रवादी विरोध के लिए भाषा को हथियार बनाया। चर्च के आयोजनों में पोलिश भाषा का प्रयोग हुआ। परिणामस्वरूप पादरियों और बिशपों को जेल में डाल दिया गया। पोलिश भाषा रूसी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखी जाने लगी।


6. जन विद्रोह-1830 के दशक में यूरोप में जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। यूरोप के उन इलाकों में जहाँ कुलीन वर्ग अभी भी सत्ता में था और कृषक कर्ज के बोझ तले दबे थे। शहरों और गाँवों में कई कारणों से गरीबी थी। बेरोजगारी तथा खाद्यान्न की कमी के कारण लोगों ने विद्रोह करने शुरू कर दिये। इन विद्रोहों के कारण रूढ़िवादी सरकारें कमजोर पड़ने लगीं तथा राष्ट्रवादी भावनाएँ विकसित होने लगीं।



प्रश्न 10. ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का इतिहास शेष यूरोप की तुलना में किस प्रकार भिन्न था


उत्तर- ब्रिटेन में राष्ट्रवाद का विकास एक लंबी संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा हुआ। इसमें किसी प्रकार की रक्तरंजित क्रांति नहीं हुई। अतः इस प्रक्रिया को आमतौर पर हम 'रक्तहीन क्रांति' के नाम से भी जानते हैं। यह प्रक्रिया निम्नलिखित

प्रकार है


(i) 18वीं शताब्दी से पूर्व ब्रितानी एक राष्ट्र नहीं था जबकि ब्रितानी द्वीप समूह में अंग्रेज, वेल्श, स्कॉट या आयरिश पहचान वाले नृजातीय समूह रहते थे जिनकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक व राजनैतिक परंपराएं थीं।


(ii) इनमें आंग्ल राष्ट्र ने अपनी धन-दौलत, अहमियत और सत्ता के बल पर अन्य द्वीप समूह के राष्ट्रों पर अपना प्रभाव स्थापित करना प्रारंभ किया। 


(iii) 1688 ई. में एक लंबे संघर्ष के माध्यम से राजतंत्र की समस्त शक्ति आंग्ल संसद के अधीन आ गई और एक राष्ट्र का निर्माण किया गया जिसका केन्द्र इंग्लैंड था।


(iv) इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच ऐक्ट ऑफ यूनियन 1707 ई. में हुआ जिसके द्वारा यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन का गठन किया गया। इसी के माध्यम से स्कॉटलैंड पर इंग्लैंड का प्रभुत्व स्थापित हो गया। 


(v) स्कॉटलैंड में ब्रितानी पहचान का विकास करने के लिए यहाँ की संस्कृति व राजनैतिक संस्थाओं को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया

गया; जैसे—स्कॉटिश हाइलैंड्स के वासियों को उनकी गेलिक भाषा बोलने और राष्ट्रीय पोशाक पहनने से रोका गया। इस कारण मजबूर होकर लोगों को अपना देश छोड़कर अन्य जगहों पर जाना पड़ा। 


(vi) आयरलैंड में भी ऐसा किया गया और यहाँ पर अंग्रेजों ने धार्मिक मतभेद को हथियार बनाया। आयरलैंड में कैथोलिक व प्रोटेस्टेंट दो धार्मिक गुट थे। अंग्रेजों ने प्रोटेस्टेंटों की मदद करके कैथोलिक को दबाया।


(vii) 1798 ई. में वोल्फ़ टोन और उसकी यूनाइटेड आयरिशमेन नेतृत्व में जो विद्रोह हुआ उसे दबा दिया गया और आयरलैंड को यूनाइटेड किंगडम का भाग बना लिया गया।


(viii) ब्रितानी राष्ट्र का निर्माण करके इसके राष्ट्रीय प्रतीकों— यूनियन बैंक (ब्रिटेन का झंडा) और गॉड सेव आवर नोबल किंग (राष्ट्रीय गान) - को संपूर्ण यूनाइटेड किंगडम में प्रचारित व प्रसारित किया गया।


प्रश्न 12.निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए (क) ज्युसेपे मेत्सिनी, (ख) काउंट कैमिलो दे कातूर, (ग) यूनानी स्वतंत्रता युद्ध, (घ) फ्रैंकफर्ट संसद, (ङ) राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका। 



उत्तर- (क) ज्युसेपे मेत्सिनी-मेत्सिनी इटली का एक क्रांतिकारी था।


इसका जन्म 1807 में जेनोआ में हुआ था और वह कार्बोनारी के गुप्त संगठन का सदस्य बन गया। 24 वर्ष की अवस्था में लिगुरिया में क्रांति करने के लिए उसे देश से बहिष्कृत कर दिया गया। तत्पश्चात् इसने दो और भूमिगत संगठनों की स्थापना की- पहला था मार्सेई में यंग इटली और दूसरा बर्न में यंग यूरोप, जिसके सदस्य पोलैंड, फ्रांस, इटली और जर्मन राज्यों में समान विचार रखने वाले युवा थे। मेत्सिनी का विश्वास था कि ईश्वर की मर्जी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई थी। अतः इटली का एकीकरण ही इटली की मुक्ति का आधार हो सकता था। उसने राजतंत्र का घोर विरोध किया और उसके मॉडल पर जर्मनी, पोलैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड में भी गुप्त संगठन बने। इसी कारण मैटरनिख ने उसके विषय में कहा कि वह 'हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन' है।


 (ख) काउंट कैमिलो दे काबूर-कावूर इटली में मंत्री प्रमुख था, जिसने इटली के प्रदेशों को एकीकृत करने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया। वैचारिक तौर पर न तो वह क्रांतिकारी था और न ही जनतंत्र में विश्वास रखने वाला। इतालवी अभिजात वर्ग के तमाम अमीर और शिक्षित सदस्यों की तरह वह इतालवी भाषा से कहीं बेहतर फ्रेंच बोलता था। अत: इटली के सम्राट विक्टर इमेनुएल ने उसे 1852 को सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का प्रधानमंत्री बनाया। उसने यहाँ पर आर्थिक, शैक्षिक कृषि के विकास के लिए कार्य किए तथा सेना में सुधार किया। उसने फ्रांस व सार्डिनिया पीडमॉण्ट के बीच एक कूटनीतिक संघि की। अपनी इन कूटनीतिक चालों के कारण उसने इटली की समस्याओं की तरफ यूरोपीय देशों का ध्यान आकर्षित किया। 6 जून, 1861 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। फिर भी वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहा जिनके कारण 18 फरवरी, 1861 ई. में इटली की संसद ने इमेनुएल द्वितीय को 'इटली का सम्राट' घोषित किया तथा इटली का एकीकरण संभव हुआ। सार्डिनिया-पीडमॉण्ट 1859 में ऑस्ट्रियाई बलों को हरा पाने में कामयाब हुआ।


 (ग) यूनानी स्वतंत्रता युद्ध-यूनानी स्वतंत्रता युद्ध ने पूरे यूरोप के शिक्षित अभिजात वर्ग में राष्ट्रीय भावनाओं का संचार किया। 15वीं सदी से यूनान ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। यूरोप में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रगति से यूनानियों का आजादी के लिए संघर्ष 1821 में आरंभ हो गया। यूनान में राष्ट्रवादियों को निर्वासन में रह रहे यूनानियों के साथ पश्चिमी यूरोप के अनेक लोगों का भी समर्थन मिला जो प्राचीन यूनानी संस्कृति के प्रति सहानुभूति रखते थे। कवियों और कलाकारों ने यूनान को 'यूरोपीय सभ्यता का पालना' बताकर प्रशंसा की और एक मुस्लिम साम्राज्य के विरुद्ध यूनान के संघर्ष के लिए जनमत जुटाया। अंग्रेज कवि लॉर्ड बायरन ने धन एकत्रित किया और बाद में युद्ध लड़ने भी गए, जहाँ 1824 में बुखार से उनकी मृत्यु हो गई। अंततः 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दी।


(घ) फ्रैंकफर्ट संसद-जर्मन इलाकों में बड़ी संख्या में राजनीतिक संगठनों ने फ्रैंकफर्ट शहर में मिलकर एक सर्व-जर्मन नेशनल एसेंबली के पक्ष में मतदान का फैसला किया। 18 मई, 1848 को, 831 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने एक सजे-धजे जुलूस में जाकर फ्रैंकफर्ट संसद में अपना स्थान ग्रहण किया। यह संसद सेंट पॉल चर्च में आयोजित हुई। उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया। इस राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी गई जिसे संसद के अधीन रहना था। जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीख विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने की पेशकश की तो उसने उसे अस्वीकार कर उन राजाओं का साथ दिया जो निर्वाचित सभा के विरोधी थे। इस प्रकार जहाँ कुलीन वर्ग और सेना का विरोध बढ़ गया, वहीं संसद का सामाजिक आधार कमजोर हो गया। संसद में मध्यम वर्गों का प्रभाव अधिक था, जिन्होंने मजदूरों और कारीगरों की माँगों का विरोध किया, जिससे वे उनका समर्थन खो बैठे। अंत में प्रशा के राजा के इंकार के कारण फ्रैंकफर्ट संसद के सभी निर्णय स्वतः समाप्त हो गए जिससे उदारवादियों व राष्ट्रवादियों में निराशा हुई। प्रशा के सैनिकों ने क्रांतिकारियों को कुचल दिया जिससे यह संसद भंग हो गई।


(ङ) राष्ट्रवादी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका- राष्ट्रवादी संघर्षों के वर्षों में बड़ी संख्या में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। महिलाओं ने अपने राजनीतिक संगठन स्थापित किए, अखबार शुरू किए और राजनीतिक बैठकों और प्रदर्शनों में भाग लिया। इसके बावजूद उन्हें एसेंबली के चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित रखा गया था। जब सेंट पॉल चर्च में फ्रैंकफर्ट संसद की सभा आयोजित की गई थी तब महिलाओं को केवल प्रेक्षकों की हैसियत से दर्शक दीर्घा में खड़े होने दिया गया।






यूपी बोर्ड कक्षा 10वी सामाजिक विज्ञान अध्याय 2 भारत में राष्ट्रवाद का सम्पूर्ण हल



Up board class 10 social science full notes in hindi



         अध्याय 2 भारत में राष्ट्रवाद


      



      




                  भारत में राष्ट्रवाद




याद रखने योग्य मुख्य बिन्दु


1•भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय में उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन की विशेष भूमिका थी। 


2● प्रथम विश्वयुद्ध के कारण विश्व के अन्य देशों के समान भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति में भी अनेक परिवर्तन हुए। देश में प्रायः सभी

वस्तुओं की कीमतें दोगुनी हो गई ,जिसके परिणामस्वरूप लोगों की कठिनाइयाँ बढ़ गयीं। ग्रामीण क्षेत्रों में अंग्रेज सरकार ने युवकों की जबरन भर्ती शुरू कर दी. जिससे वहाँ चारों तरफ रोष व्याप्त हो गया। उधर 1918-1919 और 1920-1921 की अवधियों में देश के अनेक भागों में फसल खराब हो गयीं। इसी समय देश के अधिकांश भागों में पलू की महामारी भी फैल गयी। एक अनुमान के अनुसार इस दुर्भिक्ष और अकाल के कारण देश में 120-130 लाख लोग मारे गए।


3• 1915 ई. में महात्मा गांधी दक्षिणी अफ्रीका से भारत वापस लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक नए प्रकार के जन-आन्दोलन का मार्ग अपनाकर वहाँ की नस्लभेदी सरकार से लोहा लिया। अपने इसी नए प्रकार के विरोध करने के मार्ग अथवा तरीके को उन्होंने बाद में 'सत्याग्रह' का नाम दिया। भारत आने पर उन्होंने अपने इसी सत्याग्रह के तरीके से अंग्रेजों के विरुद्ध किए जाने वाले आन्दोलनों का संचालन किया।


4• भारत आने के बाद गांधीजी ने देश के अनेक स्थानों पर सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन किया। 1916 ई. में उन्होंने बिहार प्रान्त के चम्पारण क्षेत्र का दौरा किया और अंग्रेजों की दमनकारी बागान व्यवस्था के विरुद्ध किसानों को संघर्ष करने हेतु प्रेरित किया। 1917 ई. में उन्होंने गुजरात के खेड़ा नामक जिले के किसानों की सहायता के लिए सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। इसके उपरान्त 1918 ई. में अहमदाबाद में सूती कपड़ा कारखाने के मजदूरों के समर्थन में सत्याग्रह आन्दोलन के लिए भी गए। 



5.1919 ई. में ब्रिटिश सरकार के द्वारा रॉलट ऐक्ट के नाम से एक कानून पारित किया। इस ऐक्ट के आधार पर अंग्रेजी प्रशासन को आन्दोलनकारियों की

राजनीतिक गतिविधियों का दमन करने और राजनीतिक कैदियों को उन पर बिना मुकदमा चलाए ही दो साल तक कैद में रखने का अधिकार प्राप्त हो गया।

भारतीयों ने इसे काला कानून के नाम से सम्बोधित किया। 



6.13 अप्रैल, 1919 ई. जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ। इस दिन अमृतसर में शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे सत्याग्रहियों पर जनरल डायर ने गोलियाँ चलवा डीं। आस-पास के गाँवों के बहुत से लोग इस दिन इसी बाग में वैसाखी का मेला देखने के लिए भी आए हुए थे। जनरल डायर ने इस मैदान से बाहर निकलने के सभी रास्तों को बन्द करवा दिया और इसके बाद अपने सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया। इस हत्याकांड में सैकड़ों लोगों ने वहीं दम तोड़ दिया।


7. 1920 ई. में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में एक समझौता हुआ और असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम की स्वीकृति पर मोहर लगा दी गयी। जनवरी, 1921 ई. में यह असहयोग खिलाफत आन्दोलन आरम्भ कर दिया गया।


8.1922 ई. में गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों पर पुलिस ने हिंसक कार्यवाही करनी शुरू कर दी। इससे आन्दोलनकारी हिंसक हो। उठे और उनका पुलिस से टकराव हुआ। इसके बाद उग्र भीड़ ने वहाँ के पुलिस थाने को आग लगा दी, जिसमें कुछ अंग्रेज सिपाहियों की मृत्यु हो गयी। जब गांधीजी ने इस घटना के बारे में सुना तो उन्होंने असहयोग आन्दोलन को वापस लेने का निर्णय किया। 


9● 1928 ई. में साइमन कमीशन भारत आया। भारतीय आन्दोलनकारियों ने साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारों और प्रदर्शन से उसका विरोध किया।

साइमन कमीशन के विरुद्ध होने वाले इस आन्दोलन में कांग्रेस के साथ मुस्लिम लीग ने भी भाग लिया। 



10● 1928 ई. में गुजरात के बारडोली तालुका में अंग्रेजों द्वारा भूमि राजस्व बढ़ाने के विरुद्ध एक आन्दोलन किया गया। इस आन्दोलन को 'बारडोली सत्याग्रह' के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन का नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल के द्वारा किया गया और उनके प्रयासों से अन्ततः यह आन्दोलन सफल रहा। 


11● 1929 ई. में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की माँग को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया। इस अधिवेशन में यह निर्णय किया गया कि 26 जनवरी, 1930 ई. को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। साथ ही इसी दिन लोग पूर्ण स्वराज के संघर्ष हेतु शपथ लेंगे।


12• 1930 ई. में महात्मा गांधी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने अपनी 11 माँगों का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी लिखा कि यदि 11 मार्च तक उनकी माँगें नहीं मानी गयीं तो कांग्रेस के द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर दिया जाएगा। इरविन झुकने को तैयार नहीं हुए। परिणामतः महात्मा गांधी ने अपने 78 विश्वसनीय वॉलंटियरों के साथ दांडी यात्रा शुरू कर दी और इसी के साथ सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया। 



13.दांडी यात्रा: गांधीजी के साबरमती आश्रम से 240 किलोमीटर दूर गुजरात के दांडी नामक कस्बे में जाकर समाप्त होनी थी। अपनी इस यात्रा में गांधीजी और उनकी टोली ने 24 दिन तक प्रत्येक दिन 10 किलोमीटर की दूरी तय करके अपनी इस यात्रा को पूरा किया।


14● 1931 ई. में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस ले लिया तथा दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लन्दन गए। इससे पूर्व कांग्रेस पहले गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार कर चुकी थी। लंदन में उनके साथ हुई वार्ता बीच में ही टूट गयी और गांधीजी को निराश ही भारत वापस लौटना पड़ा।



15• 1932 ई. में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः शुरू कर दिया। लगभग सालभर तक यह आन्दोलन चला, परन्तु इसके उपरान्त इसकी गति धीमी होती गयी। 1934 ई. में याद आन्दोलन समाप्त हो गया।


16● क्रिप्स मिशन की असफलता और द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभावस्वरूप भारत में व्यापक रूप से असंतोष उत्पन्न हुआ। 1942 ई. में महात्मा गांधी के द्वारा 'भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू कर दिया गया। इस आन्दोलन में अंग्रेजों को पूरी तरह भारत को छोड़कर जाने और भारत को पूर्ण रूप से मुक्त करके उन्हें आजादी देने की माँग की गयी थी।


महत्त्वपूर्ण शब्दावली


1• बहिष्कार किसी भी व्यक्ति के साथ जुड़ने अथवा उसके साथ किसी भी प्रकार का सम्पर्क रखने से मना कर देना या किसी प्रकार की गतिविधियों में अपनी

हिस्सेदारी व वस्तुओं के प्रयोग व खरीदारी से इनकार करना प्रायः यह विरोध प्रदर्शित करने का एक रूप होता था। गिरमिटिया मजदूर-औपनिवेशिक शासन के समय अनेक लोगों को काम करने के लिए फिजी, गुयाना, वेस्टइंडीज आदि स्थानों पर ले जाया गया था। इन्हीं लोगों को बाद में गिरमिटिया कहा जाने लगा। उन्हें इन स्थानों पर एक अनुबंध के तहत ले जाया जाता था। बाद में इस अनुबंध को ही मजदूर 'गिरमिट कहने

लगे। इसी कारण आगे चलकर इन मजदूरों को गिरमिटिया कहा जाने लगा।


2• सत्याग्रह सत्याग्रह' का अर्थ है- सत्य के लिए आग्रह करना। सत्याग्रह करने वाला केवल अहिंसक मार्ग के द्वारा ही अपनी माँग के लिए आग्रह करता है। 


3● रौलट ऐक्ट-अंग्रेज सरकार के द्वारा बनाया गया एक कानून: जिसके आधार पर अंग्रेज सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को सख्ती के साथ बन्द करने और राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखने का अधिकार था। भारतीयों के द्वारा इस कानून को काला कानून के नाम से सम्बोधित किया गया।


4• साइमन कमीशन सर जॉन साइमन के नेतृत्व में गठित एक आयोगः जो भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्य-शैली का अध्ययन करने के लिए आया था।

हरिजन महात्मा गांधी के द्वारा अछूतों को 'हरिजन' अर्थात् 'ईश्वर की संतान कहा गया था। 


5• स्वदेशी अपने देश में बनी वस्तुओं का प्रयोग करना; जिससे स्वदेशी उद्योगों के हितों को प्रोत्साहन प्राप्त हो सके।


सविनय अवज्ञा–विनम्रतापूर्वक सरकार की आज्ञा की अवेहलना करना, जिससे ब्रिटिश सरकार अपना शासन संचालित न कर पाए। इस आन्दोलन को गांधीजी के द्वारा आरम्भ किया गया था। असहयोग किसी को किसी भी प्रकार का सहयोग न देना। असहयोग आन्दोलन: भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया। इस आन्दोलन में उन्होंने भारतवासियों से सरकार के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग न करने का आह्वान किया था।


महत्त्वपूर्ण तिथियाँ


1.1914-1918 ई. प्रथम विश्वयुद्ध


2• 1918-1919 ई. - बाबा रामचन्द्र द्वारा उत्तर प्रदेश के किसानों को संगठित किया गया।


3● 1916 ई. -लखनऊ समझौता।


4 • 1917-1918 ई. चम्पारण सत्याग्रह


5• अप्रैल, 1919 ई. -रॉलट ऐक्ट के खिलाफ गांधीवादी हड़ताल, जलियाँवाला बाग हत्याकांड।


6 • जनवरी, 1921 ई. -असहयोग आन्दोलन और खिलाफत आन्दोलन का आरम्भ।


फरवरी, 1922 ई-चौरी-चौरा काण्ड, गांधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को वापस लेना।


7• मई, 1924 ई.- अल्लूरी सीताराम की गिरफ्तारी, हथियारबन्द्र आदिवासी संघर्ष समाप्त।


 8• दिसम्बर 1929 ई. -लाहौर अधिवेशन, कांग्रेस के द्वारा पूर्ण स्वराज की माँग को स्वीकार कर लेना।


9. 1930 ई. -भीमराव अम्बेडकर द्वारा दलित वर्ग एसोसिएशन की स्थापना।


10• मार्च, 1930 ई. गांधीजी द्वारा दांही में नमक कानून का उल्लंघन व सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत।


11● मार्च, 1931 ई. गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लिया जाना। 


12● 1931 ई.-गांधी-इर्विन समझौता।


13• दिसम्बर 1931 ई.दूसरा गोलमेज सम्मेलन ।


14● 1932 ई. सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः आरम्भ, पूना समझौता।


15 ● 1934 ई. - सविनय अवज्ञा आन्दोलन की समाप्ति।


16● 1940 ई. मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग


17● 1942 ई.-क्रिप्स मिशन: भारत छोड़ो आन्दोलन।।


18● 1946 ई. - भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम पारित 


19● 1947 ई.-भारत को आजादी प्राप्त हुई।


20• 26 जनवरी, 1950 ई. भारत में संविधान लागू हुआ।




बहुविकल्पीय प्रश्न 1 अंक




प्रश्न 1.महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से वापस कब लौटे?


 (क) 1914 


(ख) 1915


 (ग) 1918 


(घ) 1919


उत्तर-


(ख) 1915




प्रश्न 2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में महात्मा गांधी ने नमक को अत्यधिक महत्त्व क्यों दिया?




(क) नमक का प्रयोग अमीर-गरीब सभी करते थे


(ख) यह भोजन का अभिन्न हिस्सा था


(ग) नमक तैयार करने पर सरकार का एकाधिकार था


(घ) उपर्युक्त में से सभी




उत्तर-


(क) नमक का प्रयोग अमीर-गरीब सभी करते थे



प्रश्न 3 अप्रैल, 1919 किस घटना से सम्बन्धित है?



(क) सत्याग्रह आन्दोलन की शुरुआत


 (ख) साइमन कमीशन का भारत आगमन


(ग) असहयोग आन्दोलन की शुरुआत 


(घ) जलियाँवाला बाग हत्याकांड


उत्तर-


(घ) जलियाँवाला बाग हत्याकांड महात्मा गांधी ने 




प्रश्न 4.असहयोग आन्दोलन कब आरम्भ किया?


(क) 1919 ई. को


(ख) 1920 ई. को


(ग) 1922 ई. को


(घ) 1923 ई. को


उत्तर-


(ख) 1920 ई.





प्रश्न 5.पूना पैक्ट किन दो नेताओं के बीच हुआ?



(क) गांधीजी और डॉ. अम्बेडकर


(ख) गांधीजी और नेहरू


(ग) गांधीजी और सरदार पटेल


(घ) नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस



उत्तर


 (क) गांधीजी और डॉ. अम्बेडकर


प्रश्न 6.सविनय अवज्ञा आन्दोलन कब चलाया गया?



(क) 1920


 (ख) 1927


 (ग) 1930


(घ) 1935


उत्तर- (ग) 1930


प्रश्न 7.भारत के लिए डोमेनियन स्टेट्स का ऐलान किसके द्वारा किया गया?



(क) लॉर्ड लिटन द्वारा (ग) लॉर्ड कर्जन द्वारा


(ख) लॉर्ड इरविन द्वारा (घ) लॉर्ड रिपन द्वारा


उत्तर-


(ख) लॉर्ड इरविन द्वारा


प्रश्नः 8. सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत किस महत्त्वपूर्ण घटना के साथ की गयी?


(क) रॉलेट ऐक्ट की घोषणा


(ख) नमक-कानून तोड़कर


(ग) साइमन कमीशन के आगमन


 (घ) जलियाँवाला बाग हत्याकांड


उत्तर-


(ख) नमक-कानून तोड़कर 



प्रश्न 9'करो या मरो' का नारा किसका था?




(क) सुभाष चन्द्र बोस


(ख) चन्द्रशेखर आजाद


(ग) भगत सिंह


(घ) महात्मा गांधी


उत्तर-


(घ) महात्मा गांधी




प्रश्न 10.'वन्दे मातरम्' गीत किसके द्वारा लिखा गया था?


(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वार


 (ख) रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा


(ग) अबनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा


(घ) महात्मा गांधी द्वारा


उत्तर


(क) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा 



प्रश्न 11. असहयोग आन्दोलन का मुख्य कारण क्या था?




(क) रॉलेट ऐक्ट


(ख) प्रथम विश्वयुद्ध


(ग) खिलाफत आन्दोलन


(घ) प्रथम विश्वयुद्ध


उत्तर-


(ग) खिलाफत आन्दोलन


प्रश्न 12. भारत आने पर गांधी जी ने अपना सबसे पहला सत्याग्रह आन्दोलन कौन-सा किया?




(क) बारडोली सत्याग्रह आन्दोलन


(ख) खेड़ा सत्याग्रह आन्दोलन


(ग) चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन


(घ) अहमदाबाद आन्दोलन


उत्तर- (ग) चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन





अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक




प्रश्न 1. रॉलेट ऐक्ट क्या था?


उत्तर- रॉलेट ऐक्ट 1919 ई. में पारित एक ऐसा कानून था जिसमें भारतीयों पर किसी तरह के मुकदमे को चलाए बिना शंका के आधार पर गिरफ्तार कर दो साल तक जेल में बंद किया जा सकता था।


प्रश्न 2. भारत आने के बाद गांधी जी द्वारा चलाया गया पहला आंदोलन कौन-सा था?


उत्तर दक्षिणी अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधी जी ने 1916 ई. में बिहार के चम्पारण से अपने पहले सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की, यहाँ के किसान नील की खेती के विरोध में आंदोलन चला रहे थे।


प्रश्न 3, गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को ही क्यों चुना?


 या गांधी जी ने अपनी पुस्तक 'हिन्द स्वराज' में असहयोग आंदोलन के पक्ष में क्या तर्क दिया?



उत्तर महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिन्द स्वराज' में कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले ले तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।


प्रश्न 4. असहयोग आन्दोलन कब और क्यों वापस लिया गया? 


उत्तर. असहयोग आन्दोलन 1922 ई० में चौरी-चौरा की घटना के कारण वापस लिया गया।


प्रश्न 5.खिलाफत आंदोलन किसने शुरू किया था? 


उत्तर- मोहम्मद अली तथा शौकत अली ने।


प्रश्न6. साइमन कमीशन का गठन क्यों किया गया था, इसका विरोध क्यों हुआ? 


उत्तर- सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया गया। राष्ट्रवादी आंदोलन के जवाब में गठित किए गए इस आयोग को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्य-शैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में सुझाव देने थे। इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सारे अंग्रेज थे। इसलिए साइमन कमीशन का भारत में विरोध हुआ।


प्रश्न 7..जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ उस समय किन समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था?


 उत्तर.जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ उस समय कुछ मुस्लिम उत्तर समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था। कांग्रेस से कटे हुए मुसलमानों का बड़ा वर्ग किसी संयुक्त संघर्ष के लिए तैयार नहीं था। बहुत सारे मुस्लिम नेता और बुद्धिजीवी भारत में अल्पसंख्यकों के रूप में मुसलमानों की हैसियत को लेकर चिंता जता रहे थे। उनको भय था कि हिंदू बहुसंख्यक के वर्चस्व की स्थिति में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान खो जाएगी।


प्रश्न 8. लोगों को एकजुट करने में झंडे का क्या योगदान था ?


 उत्तर.राष्ट्रवादी नेता लोगों को एकजुट करने के लिए बंगाल में स्वदेशी उत्तर आंदोलन के दौरान एक तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदुओं व मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्द्धचंद्र दर्शाया गया था। 1921 तक गांधी जी ने भी तिरंगा सफेद, हरा और लाल, जिसके मध्य में चरखा था, तैयार कर लिया था। जुलूसों में यह झंडा थामे शासन के प्रति अवज्ञा का

संकेत था। 




 प्रश्न 9. स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को किस प्रकार चित्रित किया?


उतर इस पेंटिंग में भारत माता की एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह शांत, गंभीर, देवी और आध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है। इस से मातृछवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा।


प्रश्न 10. गांधी-इरविन समझौता कब हुआ? इसकी कोई एक शर्त बताइए। 


उत्तर 5 मार्च, 1931 को गांधी जी और इरविन के बीच समझौता हुआ था। इस समझौते में सरकार ने वचन दिया कि हिंसा के आरोप में गिरफ्तार लोगों को छोड़कर सभी राजनीतिक बंदी रिहा कर दिए जाएंगे।


प्रश्न 11. असहयोग आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से विदेशी वस्तुओं पर क्या प्रभाव पड़ा?


उत्तर- असहयोग आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी। 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया था। उसकी कीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गई। बहुत सारे स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी चीजों का व्यापार करने या विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इंकार कर दिया।


प्रश्न 12. 'केसरी' समाचार पत्र का प्रकाशन किसके द्वारा किया गया? 


उत्तर- बाल गंगाधर तिलक द्वारा।


प्रश्न 13. 1859 के 'इनलैंड इमिग्रेशन ऐक्ट की कोई एक विशेषता लिखिए।


 उत्तर- बागान में काम करने वाले मजदूरों को बिना इजाजत बागान से बाहर जाने की छूट नहीं होती थी।


प्रश्न 14. पूर्ण स्वराज का उद्घोष कब किया गया?


उत्तर- 31 दिसम्बर, 1929 को लाहौर अधिवेशन में।



लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक



प्रश्न1. भारत में लोगों द्वारा 'रॉलेट ऐक्ट' का किस प्रकार विरोध किया गया? उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।


या रॉलेट ऐक्ट क्या था? उसका विरोध कैसे किया गया? क्या परिणाम हुआ?



उत्तर- रॉलेट ऐक्ट- रॉलेट ऐक्ट 1919 ई. में पारित एक ऐसा कानून था जिसमें भारतीयों पर किसी तरह के मुकदमे को चलाए बिना शंका के आधार पर गिरफ्तार कर दो साल तक जेल में बंद किया जा सकता था।


 परिणाम-अंग्रेजों ने राष्ट्रवादियों पर दमन शुरू करने के साथ मार्शल लॉ लागू कर दिया। 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ।


विरोध-भारत में लोगों द्वारा 'रॉलेट ऐक्ट' का विरोध निम्न प्रकार से किया गया था 


(i) विभिन्न शहरों में रैली-जुलूसों का आयोजन किया गया।


(ii) रेलवे वर्कशॉप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए। 


(iii) कई शहरों में दुकानदारों ने दुकान बंद करके अपना विरोध जताया।


प्रश्न 2. साइमन कमीशन की रिपोर्ट से कांग्रेस क्यों असन्तुष्ट थी? कांग्रेस ने किस नई नीति की घोषणा की?


उत्तर- साइमन कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य के शामिल नहीं के कारण कांग्रेस इसकी रिपोर्ट से असन्तुष्ट थी। कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' की नई नीति की घोषणा की। दिसम्बर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन मे ‘पूर्ण स्वराज' की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया तथा तय किया गया कि 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा और उस दिन लोग पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे।




प्रश्न 3. पूना पैक्ट पर किसके हस्ताक्षर हुए? उसकी दो शर्तें लिखिए।



उत्तर- पूना पैक्ट पर गांधी जी और डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के हस्ताक्षर हुए। सितम्बर 1932 में हुए पूना पैक्ट की दो शर्तें निम्नलिखित हैं


(i) अम्बेडकर द्वारा दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की माँग को वापस लेना।


(ii) दलित वर्गों को प्रांतीय एवं केन्द्रीय विधायी परिषदों में आरक्षण दिया जाना।


प्रश्न 4. अल्लूरी सीताराम राजू कौन थे? विद्रोहियों को गांधी जी के विचारों से प्रेरित करने में उनकी भूमिका को स्पष्ट कीजिए।


उत्तर- अल्लूरी सीताराम राजू आंध्र प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र के रहने वाले थे तथा उन्होंने गुडेंम विद्रोहियों को नेतृत्व प्रदान किया था। वे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे। वे खगोलीय घटनाओं का सटीक अनुमान लगा सकते थे, बीमार लोगों का इलाज करते थे।


राजू महात्मा गांधी की महानता के गुण गाते थे। उनका कहना था कि वह असहयोग * आंदोलन से प्रेरित हैं। उन्होंने लोगों को खादी पहनने तथा शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया। साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं बल्कि केवल बल प्रयोग के जरिए ही आजाद हो सकता है।


प्रश्न 5. नमक यात्रा उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक थी। स्पष्ट कीजिए।


उत्तर- 31 जनवरी, 1930 को गांधी जी ने वायसराय इरविन को एक खत लिखा। इस खत में उन्होंने ग्यारह माँगों का उल्लेख किया था। इनमें से कुछ सामान्य माँगें थीं, जबकि कुछ माँगें उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक विभिन्न तबकों से जुड़ी हुई थीं। गांधी जी इन माँगों के माध्यम से समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ना चाहते थे ताकि सभी उनके अभियान में शामिल हो सकें। इनमें से सर्वाधिक प्रमुख माँग नमक कर को समाप्त करने के बारे में थी। सफलतापूर्वक नमक यात्रा निकालकर गांधी जी ने औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार को अपने सत्याग्रह के तरीके से उत्तर दिया। नमक यात्रा वास्तव में उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का एक सबसे बड़ा प्रतीक थी।


प्रश्न 6. उन परिस्थितियों की व्याख्या कीजिए जिनमें गांधीजी ने 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लिया।


उत्तर- गांधी जी ने समझौता के तहत 1931 ई. में सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लिया था, इसके निम्नलिखित कारण थे


(i) सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राजी हो गयी थी। 


(ii) सरकार ने दमनकारी नीति चला रखी थी जिसके तहत शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले किए गए, महिलाओं और बच्चों को मारा पीटा गया और लगभग एक लाख लोग गिरफ्तार किए गए।


(iii) औद्योगिक मजदूरों ने अंग्रेजी शासन का प्रतीक पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों और रेलवे स्टेशनों पर हमले शुरू कर दिए थे।




प्रश्न 7. सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति लोगों और उपनिवेशक सरकार ने किस प्रकार प्रतिक्रिया व्यक्त की? स्पष्ट कीजिए।


उत्तर- देश के विभिन्न भागों में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए। आंदोलन फैला तो विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाने लगा। शराब की दुकानों की पिकेटिंग होने लगी। किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इंकार कर दिया। गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफे देने लगे। बहुत सारे स्थानों पर जंगलों में रहने वाले वन कानूनों का उल्लंघन करने लगे।


औपनिवेशिकं सरकार कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार करने लगी। जब महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया तो शोलापुर के औद्योगिक मजदूरों ने अंग्रेजी शासन का प्रतीक पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों और रेलवे स्टेशनों पर हमले शुरू कर दिए। सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए औरतों, बच्चों और शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों को मारा-पीटा और लगभग एक लाख लोगों को गिरफ्तार किया।


प्रश्न 8 रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ़ चले आंदोलन का दमन किस प्रकार किया गया?


उत्तर- गांधी जी रॉलेट ऐक्ट जैसे अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ़ अहिंसक नागरिक अवज्ञा चाहते थे। इसे 6 अप्रैल, 1919 को एक हड़ताल से शुरू होना था। विभिन्न शहरों में रैली-जुलूसों का आयोजन किया गया। रेलवे वर्कशॉप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए। दुकानें बंद हो गईं। इस व्यापक जन उभार से चिंतित तथा रेलवे व टेलीग्राफ़ जैसी संचार सुविधाओं के भंग हो जाने की आशंका से भयभीत अंग्रेज़ों ने राष्ट्रवादियों का दमन शुरू कर दिया। अमृतसर में बहुत सारे स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। गांधी जी के दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चला दी। इसके बाद लोग बैंकों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले करने लगे। मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने पंजाब में कमान सँभाल ली।


प्रश्न 9


खिलाफत आंदोलन क्यों शुरू हुआ?


उत्तर- पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी। इस आशय की अफ़वाह फैली हुई थी कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (खलीफ़ा) ऑटोमन सम्राट पर एक बहुत सख्त शांति संधि थोपी जाएगी। खलीफ़ा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए 1919 में बंबई में एक खिलाफ़त समिति का गठन किया गया था। मोहम्मद अली और शौकत अली बंधुओं के साथ-साथ कई युवा मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जन कार्यवाही की संभावना तलाशने के लिए महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू कर दी थी। सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी ने भी दूसरे नेताओं को राजी कर लिया कि खिलाफत आंदोलन के समर्थन और स्वराज के लिए एक असहयोग आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए।


प्रश्न 10. गांधी-इरविन समझौते के प्रावधानों का वर्णन कीजिए। 


उत्तर- सविनय अवज्ञा आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में 5 मार्च, 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ। इरविन उस समय भारत के वायसराय थे। इस समझौते के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे


(i) सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया जाएगा।


(ii) सरकार अध्यादेशों व मुकदमों को वापस ले लेगी। 


(iii) हिंसात्मक अपराधियों को छोड़कर अन्य समस्त राजनीतिक बन्दियों को मुक्त कर दिया जाएगा।


 (iv) शराब, अफीम व विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना देने वालों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।


(v) समुद्र तट से एक निश्चित दूरी पर नमक बनाने की छूट होगी।


(vi) जमानतें व जुर्माने वसूल नहीं किए जाएँगे।


 (vii) जिन व्यक्तियों ने सरकारी नौकरी छोड़ दी है, उन्हें वापस लेने में उदार नीति अपनाई जाएगी। 


(viii) कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी। 


(ix) विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग नहीं किया जाएगा।


(x) कांग्रेस पुलिस अत्याचारों के विरुद्ध निष्पक्ष जाँच की माँग को त्याग देगी।



प्रश्न 11. राष्ट्रवाद के विकास का विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा?


उत्तर- राष्ट्रवाद के विकास के विश्व पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े


(i) विश्व में राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ।


(ii) समस्त जनसमुदाय यह विचारने लगा कि वे कौन हैं, उनकी पहचान किस बात से परिभाषित होती है। अतः वे अपने आप को किसी देश के नागरिक के रूप में परिभाषित करने लगे जिससे उनमें राष्ट्र के प्रति लगाव उत्पन्न होने लगा।


(iii) इस परिभाषा के लिए नए प्रतीकों, नए चिह्नों, नए गीतों व विचारों के नए संपर्क स्थापित किए तथा समुदायों की सीमाओं को दोबारा परिभाषित किया।


(iv) इस परिभाषा के निर्माण के लिए समस्त जनसमुदायों ने अपने-अपने ढंग से संघर्ष किया, जो कई स्थानों पर काफी लम्बा भी चला।



प्रश्न 12. सक्रिय राजनीति में भाग लेने से पूर्व गांधी जी ने किन-किन स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन किए? इनके प्रारंभ करने के क्या कारण थे?


उत्तर सक्रिय राजनीति में भाग लेने से पहले गांधी जी ने अपने गुरु गोपालकृष्ण गोखले के कहने पर 'भारत भ्रमण' किया। इस दौरान उन्होंने कई स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन चलाए, जिनमें प्रमुख हैं


1. चम्पारण सत्याग्रह - 1916 ई. में उन्होंने बिहार के चम्पारण क्षेत्र का दौरा किया और वहाँ के किसानों को दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ सत्याग्रह करने के लिए प्रेरित किया।


2. गुजरात सत्याग्रह - 1917 ई. में गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह किया क्योंकि फसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण किसान लगान नहीं चुका पा रहे थे जबकि सरकार उनसे जबरन लगान वसूल कर रही थी।


3. अहमदाबाद सत्याग्रह - 1918 ई. में अहमदाबाद के सूती कपड़ा कारखानों में कार्य करने वाले मज़दूरों के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन किया।


उपर्युक्त आंदोलन में उन्हें सफलता भी मिली जिस कारण आम आदमी में उनकी अलग पहचान स्थापित हुई।


प्रश्न 13. जलियाँवाला बाग काण्ड पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।


उत्तर


रॉलेट ऐक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर जिले की जनता अत्यन्त आक्रोशित थी। इस शहर में सैनिक शासन लागू करके नियन्त्रण जनरल डायर को दिया गया था। 12 अप्रैल, 1919 को नगर में सार्वजनिक सभा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिसकी पूरी जानकारी जनता को नहीं कराई गई।


13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार था। इसी दिन सरकार की नीति का विरोध करने के लिए जलियाँवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया।


सभा शान्तिपूर्वक चल रही थी। तभी जनरल डायर ने 200 देशी और 50 गोरे सिपाहियों को साथ लेकर बाग के एकमात्र दरवाजे को रोक लिया और निहत्थी जनता पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। 10 मिनट तक निहत्थी भीड़ पर गोलियों की बौछार होती रही। इस हत्याकाण्ड में हजारों व्यक्ति मारे गए और असंख्य घायल हुए। इस घटना से भारतीयों में भयंकर असन्तोष की लहर दौड़ गई।




प्रश्न 13. जलियाँवाला बाग काण्ड पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।


उत्तर- रॉलेट ऐक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर जिले की जनता अत्यन्त आक्रोशित थी। इस शहर में सैनिक शासन लागू करके नियन्त्रण जनरल डायर को दिया गया था। 12 अप्रैल, 1919 को नगर में सार्वजनिक सभा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिसकी पूरी जानकारी जनता को नहीं कराई गई।


13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार था। इसी दिन सरकार की नीति का विरोध करने के लिए जलियाँवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया।


सभा शान्तिपूर्वक चल रही थी। तभी जनरल डायर ने 200 देशी और 50 गोरे सिपाहियों को साथ लेकर बाग के एकमात्र दरवाजे को रोक लिया और निहत्थी जनता पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। 10 मिनट तक निहत्थी भीड़ पर गोलियों की बौछार होती रही। इस हत्याकाण्ड में हजारों व्यक्ति मारे गए और असंख्य घायल हुए। इस घटना से भारतीयों में भयंकर असन्तोष की लहर दौड़ गई।


प्रश्न 14. प्रथम विश्वयुद्ध के भारतीय समाज व अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा? 



उत्तर- प्रथम विश्वयुद्ध के भारतीय समाज व अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े


(i) इस विश्वयुद्ध ने एक नयी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी।


 (ii) इसके कारण रक्षा व्यय में भारी इजाफ़ा हुआ।


(iii) इस खर्चे की भरपाई करने के लिए युद्ध के नाम पर कर्जे लिए गए। और करों में वृद्धि की गई। 


(iv) सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और आयकर शुरू किया गया। युद्ध के दौरान कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं।


(v) 1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो चुकी थीं, जिसके कारण आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई थीं।


(vi) गाँवों में सिपाहियों को जबरन भर्ती किया गया जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में व्यापक गुस्सा था।


(vii) 1918-19 और 1920-21 में देश के बहुत सारे हिस्सों की फसलें खराब हो गई, जिसके कारण खाद्य-पदार्थों का भारी अभाव पैदा हो गया। 


(viii) उसी समय फ्लू की महामारी फैल गई।


(ix) 1921 की जनगणना के मुताबिक दुर्भिक्ष और महामारी के कारण 120-130 लाख लोग मारे गए।




प्रश्न 15. सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?


उत्तर सत्याग्रह के विचार का मूल आधार सत्य की शक्ति पर आग्रह तथा सत्य की खोज करना है। गांधी जी इसके प्रबल समर्थक थे तथा उन्होंने इसकी व्याख्या इस प्रकार की


(i) अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं।


(ii) प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे भी अपने संघर्ष में सफल हो सकता है।


(iii) इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए। उत्पीड़क शत्रु को ही नहीं बल्कि सभी लोगों को हिंसा के जरिए सत्य को स्वीकार करने पर विवश करने की बजाय सच्चाई को देखने और उसे सहज भाव से स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।


(iv) इस संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है। गांधी जी का अटूट विश्वास था कि अहिंसा का धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।




दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 6 अंक




प्रश्न 1.भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में सविनय अवज्ञा आंदोलन के महत्त्व का वर्णन कीजिए।


उत्तर


1929 ई. के अपने लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को अपना आदर्श घोषित किया, परंतु यह आदर्श तब तक पूरा नहीं हो सकता था जब तक ब्रिटिश सरकार का जोर-शोर से विरोध न किया जाए। इस तरह महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 ई. में कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन का श्रीगणेश महात्मा गांधी की दांडी यात्रा और नमक कानूनों को तोड़कर शुरू किया गया। कई उतार-चढ़ाव के साथ यह आंदोलन 1934 ई. तक चलता रहा। इस आंदोलन को 1934 में वापस ले लिया गया। फिर भी इसने राष्ट्रीय आंदोलन पर अपने गहरे प्रभाव छोड़े


(i) सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान लोगों का ब्रिटिश शासन विश्वास जाता रहा और वे ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध लड़ने के लिए। एकजुट होने लगे।


(ii) सविनय अवज्ञा आंदोलन के चलाए जाने के साथ भारत में क्रांतिकारी आंदोलन फिर से जागृत हो गए। इसी काल में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि क्रांतिकारी देशभक्तों ने दिल्ली में एसेंबली में दो बम फेंके।


(iii) इस आंदोलन के दौरान भारतीयों को ब्रिटिश सरकार की कठोर यातनाओं को सहना पड़ा परंतु अपने संघर्ष से जो अनुभव उन्हें मिला वह अमूल्य था। इस अनुभव ने आगे आने वाले स्वतंत्रता संघर्ष में उनका बड़ा मार्गदर्शन किया और एक सफल संघर्ष के दाँव-पेंच समझा दिए।


प्रश्न 2. गांधी जी की नमक यात्रा का वर्णन कीजिए।


या नमक सत्याग्रह क्यों प्रारम्भ किया गया था? उसका संक्षिप्त विवरण दीजिए। 


उत्तर 31 जनवरी, 1930 को गांधी जी ने वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया था। इन माँगों के जरिए वे समाज के सभी वर्गों को जोड़ना चाहते थे। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण माँग नमक कर को खत्म करने के बारे में थी। नमक का अमीर-गरीब सभी इस्तेमाल करते थे। यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था। इसलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी इजारेदारी को महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार का सबसे दमनात्मक पहलू बताया था।


महात्मा गांधी का यह पत्र एक चेतावनी की तरह था। उन्होंने लिखा था कि यदि 11 मार्च तक इन माँगों को नहीं माना गया तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर देगी। इरविन झुकने को तैयार नहीं थे। महात्मा गांधी ने अपने 78 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी। यह यात्रा साबरमती में गांधी जी के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी नामक गुजराती तटीय कस्बे में जाकर खत्म होनी थी। गांधी जी की टोली ने 24 दिन तक हर रोज लगभग 10 मील का सफ़र तय किया। गांधी जी जहाँ भी रुकते हज़ारों लोग उन्हें सुनने आते। इन सभाओं में गांधी जी ने स्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और आह्वान किया कि लोग शांतिपूर्वक अंग्रेजों की अवज्ञा करें। 6 अप्रैल को वे दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह कानून का उल्लंघन था।


हज़ारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखाने के सामने प्रदर्शन किए। आंदोलन फैला तो विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाने लगा। शराब की दुकानों की पिकेटिंग होने लगी। किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया। गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफ़े देने लगे।


इन घटनाओं से चिंतित औपनिवेशिक सरकार कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार करने लगी। सरकार ने दमन चक्र चलाया तो गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया।



प्रश्न 3. सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल विभिन्न सामाजिक समूह कौन-से थे? उन्होंने आंदोलन में क्यों हिस्सा लिया?


उत्तर सविनय अवज्ञा आंदोलन में निम्नलिखित सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया


संपन्न किसान— गाँवों में व्यवसायी वर्ग की तरह संपन्न किसानों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का पूर्णरूपेण समर्थन किया। उन्होंने अपने समुदायों को एकजुट किया और कई बार अनिच्छुक सदस्यों को बहिष्कार के लिए मजबूर किया। उनके लिए स्वराज की लड़ाई भारी लगान के खिलाफ़ लड़ाई थी, लेकिन जब 1931 में लगानों के घंटे बिना आंदोलन वापस ले लिया गया तो उन्हें बड़ी निराशा हुई। गरीब किसान केवल लगान में ही कमी नहीं चाहते थे, वे चाहते थे कि उन्हें ज़मीदारों को जो भाड़ा चुकाना था उसे माफ़ कर दिया जाए। इसके लिए उन्होंने कई रेडिकल आंदोलनों में हिस्सा लिया, जिनका नेतृत्व अक्सर समाजवादियों और कम्युनिस्टों के हाथों में होता था।


व्यवसायी वर्ग-व्यवसायी वर्ग ने अपने कारोबार को फैलाने के लिए ऐसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में रुकावट आती थी। वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे। इसके लिए इन्होंने पहले सविनय अवज्ञा आंदोलन का समर्थन किया।


मजदूर वर्ग जैसे जैसे उद्योगपति कांग्रेस के निकट आने लगे मजदूर कांप्रेस से दूर होते गए। फिर भी कुछ मज़दूरों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे कुछ गांधीवादी विचारों को कम वेतन व खराब कार्य स्थितियों के खिलाफ अपनी लड़ाई से जोड़ लिया था। 1930 में रेलवे कामगारों की और 1932 में गोदी कामगारों की हड़ताल हुई। 1930 में छोटानागपुर के टीन खानों के हजारों मजदूरों ने गांधी टोपी पहनकर रैलियों और बहिष्कार अभियानों में हिस्सा लिया।


महिलाएं- सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। गांधी जी के नमक सत्याग्रह के दौरान हजारों महिलाएँ उनको बात सुनने के लिए घर से बाहर आ जाती थी। उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों की होली जलाई। बहुत सारी महिलाएं जेल भी गई। गांधी जी के आह्वान के बाद महिलाओं ने बड़ी संख्या में इस आंदोलन में भाग लिया।



प्रश्न 4. भारत में राष्ट्रवाद की भावना पनपने में किन-किन कारकों का योगदान था ?


या भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के तीन कारणों को लिखिए।


 उत्तर


राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग ये महसूस करने लगते  हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैं। तब वे एक-दूसरे को एकता के सूत्र में बाँधने वाली कोई साझा बात ढूँढ लेते हैं। सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों से पैदा हुई थी। इतिहास व साहित्य, लोक-कथाएँ व गीत, चित्र व प्रतीक सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया था। भारत में राष्ट्रवाद की भावना पनपने में योगदान देने वाले कुछ प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं


(i) 20वीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान भी भारत माता की छवि का रूप लेने लगी। यह तस्वीर पहली बार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने बनाई थी। 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में 'वंदे-मातरम्' गीत लिखा था। बाद में इसे उन्होंने अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल कर लिया। यह गीत बंगाल में स्वदेशी आंदोलन में खूब गाया गया। स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को चित्रित किया। इस पेंटिंग में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है। इस मातृछवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा।


(ii) राष्ट्रवाद का विचार भारतीय लोक कथाओं को पुनर्जीवित करने के आंदोलन से भी मज़बूत हुआ। 19वीं सदी के अंत में राष्ट्रवादियों ने भाटों व चारणों द्वारा गाई-सुनाई जाने वाली लोक कथाओं को दर्ज करना शुरू कर दिया। उनका मानना था कि यही कहानियाँ हमारी परंपरागत संस्कृति की तस्वीर पेश करती हैं जो बाहरी ताकतों के • प्रभाव से भ्रष्ट और दूषित हो चुकी हैं। अपनी राष्ट्रीय पहचान को ढूंढ़ने और अपने अतीत में गौरव का भाव पैदा करने के लिए लोक परंपरा को बचाकर रखना जरूरी था।


(iii) राष्ट्रवादी नेता लोगों में राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए चिह्नों और प्रतीकों के बारे में जागरूक होते गए। 1921 तक गांधी जी ने भी स्वराज का झंडा तैयार कर लिया था। यह तिरंगा था (सफेद, हरा और लाल)। इसके मध्य में गांधीवाद प्रतीक चरखे को जगह दी गई जो आत्मसहायता का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था।


(iv) इतिहास की पुर्नव्याख्या राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक और साधन था। अंग्रेज़ों की नज़र में भारतीय पिछड़े हुए और आदिम लोग थे जो अपना शासन खुद नहीं सँभाल सकते। इसके जवाब में भारत के लोग अपनी महान उपलब्धियों की खोज में अतीत की ओर देखने लगे। उन्होंने इस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखना शुरू किया जब कला और वास्तुशिल्प, विज्ञान और गणित, धर्म और संस्कृति, कानून और दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे। इस ने राष्ट्रवादी इतिहास में पाठकों को अतीत में भारत की महानता व उपलब्धियों पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से ची मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाने का आह्वान किया जाता था। इस प्रकार राष्ट्रवाद की भावना फैलाने में विभिन्न तत्त्वों ने योगदान दिया।



प्रश्न 5. गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन क्यों प्रारम्भ किया? उनके द्वारा यह आन्दोलन वापस लेने के प्रमुख कारण क्या थे?


 या असहयोग आन्दोलन क्यों प्रारम्भ किया गया? आन्दोलनकारियों केचार कार्य लिखिए।


उत्तर

 कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 ई. में असहयोग आन्दोलन शुरू करने का निर्णय लिया। यह एक क्रान्तिकारी कदम था। कांग्रेस ने पहली बार सक्रिय कार्यवाही अपनाने का निश्चय किया। इस क्रान्तिकारी परिवर्तन के अनेक कारण थे। अब तक महात्मा गांधी ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में विश्वास करते थे और उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था, किन्तु जलियाँवाला बाग नरसंहार, पंजाब में मार्शल लॉ और हण्टर कमेटी की जाँच ने उनका अंग्रेजों के न्याय से विश्वास उठा दिया। उन्होंने अनुभव किया कि अब पुराने तरीके छोड़ने होंगे। कांग्रेस से उदारवादियों के अलग हो जाने के बाद कांग्रेस पर पूरी तरह से गरमपन्थियों का नियन्त्रण हो गया। उधर तुर्की और मित्रराष्ट्रों में सेवर्स की सन्धि की कठोर शर्तों से मुसलमान भी रुष्ट थे। देश में अंग्रेजों के प्रति बड़ा असन्तोष था। महात्मा गांधी ने मुसलमानों के खिलाफत आन्दोलन में उनका साथ दिया तथा असहयोग आन्दोलन छेड़ने का विचार किया।


सितम्बर, 1920 ई. में कलकत्ता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव रखा। सी.आर. दास, बी.सी. पाल, ऐनी बेसेण्ट, जिन्ना और मालवीय जी ने इसका विरोध किया, लेकिन दिसम्बर, 1920 ई. में कांग्रेस के नियमित अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया तथा विरोधियों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया।


इस आन्दोलन के मुख्य बिन्दु थे-खिताबों तथा मानव पदों का त्याग, स्थानीय निकायों में नामजदगी वाले पदों से इस्तीफा, सरकारी दरबारों या सरकारी अफसरों के सम्मान में आयोजित उत्सवों में भाग न लेना, बच्चों को स्कूलों से हटा लेना, अदालतों का बहिष्कार, फौज में भरती का बहिष्कार आदि। असहयोगियों के लिए अहिंसा तथा सत्य का पालन करना आवश्यक था। गांधी जी को विश्वास था कि इस आन्दोलन से एक वर्ष में 'स्वराज' की प्राप्ति हो जाएगी। इस आन्दोलन का भारतीय जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई। बहुत से छात्रों ने स्कूल तथा कॉलेजों का बहिष्कार किया। महात्मा गांधी ने 'केसर-ए-हिन्द' का खिताब छोड़ दिया। 13 नवम्बर, 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन के समय बम्बई (मुम्बई) में हड़ताल रखी गई। दिसम्बर, 1921 में प्रिंस के कोलकाता आगमन पर भी हड़ताल रखी गई। ब्रिटिश सरकार ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए व्यापक दमन चक्र चलाया। महात्मा गांधी के अलावा सभी कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। चौरी-चौरा की एक अप्रिय घटना के कारण महात्मा गांधी ने यह आन्दोलन 1922 ई. में वापस ले लिया।


प्रश्न 6. महात्मा गांधी जी के सत्याग्रह पर एक निबन्ध लिखिए। 


 या भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी जी के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।



उत्तर- महात्मा गांधी अप्रैल 1893 में दक्षिण अफ्रीका गये थे तथा जनवरी 1915 में वे भारत लौटे। उन्होंने एक नए तरह के जनांदोलन के रास्ते पर चलते हुए वहाँ की नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था। इस पद्धति को वे सत्याग्रह कहते थे।


भारत आने के बाद गांधी जी ने कई स्थानों पर सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। 1917 में उन्होंने बिहार के चम्पारण इलाके का दौरा किया और दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। 1917 में ही उन्होंने गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। फसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे। वे चाहते थे कि लगान वसूली में ढील दी जाए। 1918 में गांधी जी सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के बीच सत्याग्रह आन्दोलन चलाने अहमदाबाद जा पहुँचे।


इस कामयाबी से उत्साहित गांधी जी ने 1919 में प्रस्तावित रॉलेट ऐक्ट के - खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन चलाने का फैसला लिया। भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इस कानून को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने बहुत जल्दबाजी में पारित कर दिया था। इस कानून के जरिए । सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को दो 1 साल तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रखने को अधिकार मिल गया था। महात्मा गांधी ऐसे अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ अहिंसक ढंग से नागरिक अवज्ञा चाहते थे।


■रॉलेट सत्याग्रह में सफलता मिलने के बाद उन्होंने असहयोग आन्दोलन शुरु किया। यह आन्दोलन 1 अगस्त, 1920 को शुरु हुआ था और इसके तहत । ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग जताने के लिए लोगों से अपील की थी। इस आन्दोलन में स्कूल, कॉलेज, न्यायालय न जाएँ और न ही कर चुकाएँ, ये सारी चीजें लोगों को करने के लिए कहा गया था। तत्पश्चात् इस आन्दोलन का स्वरूप सविनय अवज्ञा आन्दोलन में परिवर्तित हो गया।



इसके बाद गांधी जी ने नमक सत्याग्रह (जिसे दांडी सत्याग्रह या दांडी आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है।) शुरु किया। ब्रिटिश हुकूमत ने नमक पर एकाधिकार कर दिया था जिसके बाद 12 मार्च, 1930 को गांधी जी ने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी गाँव तक 24 दिनों का पैदल मार्च निकाला था। गांधी जी ने फिर ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत छोड़ो आन्दोलन शुरु किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का 8 अगस्त, 1942 को बंबई में सत्र हुआ था जिसमें गांधी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया था। इस आन्दोलन के बाद गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन उसके बाद भी युवा कार्यकर्ता हड़ताल और तोड़फोड़ करते रहे और आन्दोलन को जारी रखा। अंततः 15 अगस्त, 1947 को भारत एक अलग देश बना। इस प्रकार सविनय अवज्ञा आन्दोलन, दांडी सत्याग्रह और भारत छोड़ो आन्दोलन ऐसे प्रमुख उदाहरण थे जिनमें गांधी जी ने आत्मबल को सत्याग्रह के हथियार के रूप में प्रयोग किया।




यूपी बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना


Class 10 social science chapter 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना का सम्पूर्ण हल



up board class 10 social science notes in hindi








खण्ड 2 :जीविका, अर्थव्यवस्था एवं समाज


3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना







याद रखने योग्य मुख्य बिन्दु



1."वैश्वीकरण या भूमंडलीकृत विश्व की प्रक्रिया का अपना एक दीर्घकालिक इतिहास रहा है। प्राचीनकाल से ही एक-दूसरे देश के बीच यात्रा व्यापार,सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा था। यहाँ तक कि विभिन्न बीमारियों का प्रसार भी एक स्थान के लोगों अथवा उनके जानवरों आदि के कारण हुआ। 



2.सिल्क मार्ग को ही सिल्क रूट कहा जाता है। इस मार्ग से चीन में बना सिल्क या रेशम दूसरे देशों में पहुँचता था। इस मार्ग ने व्यापार तथा धर्म व संस्कृति के प्रसार के माध्यम से विश्व को जोड़ने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।


3. कोलम्बस के अमेरिका पहुँचने के साथ ही आलू, सोया आदि खाद्य पदार्थों का यूरोप और एशिया पहुँचना शुरू हो गया। यूरोप और आयरलैंड के जन-जीवन पर आलू का सबसे अधिक प्रभाव हुआ। यहाँ तक कि जब किसी बीमारी के कारण वहाँ आलू की फसल खराब हो गयी तो आयरलैंड के लाखों लोग मौत के मुँह में समा गए।



4. पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं के विजय अभियान के समय उनके साथ बीमारियों का वैश्विक प्रसार भी हुआ। उनके पास किसी भी प्रकार के परम्परागत हथियार तो नहीं थे। उनके साथ चेचक के कीटाणु भी अमेरिका पहुॅचे और इस बीमारी के प्रकोप से वहाँ लाखों लोग मर गए। इससे उनकी जीत का रास्ता और भी अधिक आसान हो गया। इसीलिए यह कहा जाता है कि उनके साथ हुआ बीमारियों का वैश्विक प्रसार: अमेरिकी क्षेत्रों के उपनिवेशीकरण में सहायक हुआ। 



5• अठारहवी शताब्दी तक चीन और भारत संसार के सर्वाधिक धनी देश माने जाते थे। इसके बाद यूरोप विश्व व्यापार का केन्द्र बन गया।


6.अर्थशास्त्रीयो ने अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में तीन तरह की एक-दूसरे से सम्बद्ध गतियों या प्रवाहों का उल्लेख किया है। इनका लोगों के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इनमें पहला प्रवाह व्यापार का होता है, दूसरा प्रवाह श्रम का होता है और तीसरा प्रवाह पूंजी का होता है।


7• 19 वीं शताब्दी के अन्त में ब्रिटेन के स्वरूप को परिवर्तित करने में अनेक परिवर्तन सहायक हुए। साथ ही ब्रिटेन की सरकार ने भी ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति को सशक्त बनाने हेतु कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए।


कॉर्न-लॉ कहा जाता था।


8.ब्रिटेन की सरकार ने बड़े भूस्वामियों के दबाव में आकर मक्का के आयात पर पाबन्दी लगा दी। जिन कानूनों के आधार पर यह पाबन्दी लगायी गयी, उन्हें 

कॉर्न-लॉ कहा जाता था।




9.1890 ई. तक वैश्विक कृषि व्यवस्था का उदय हो चुका था और इसके फलस्वरूप संसार के देशों में अनेक उल्लेखनीय परिवर्तन हुए। भोजन हेतु के साथ ही कपास, रबड़ व अन्य उत्पादनों में विश्व व्यापार की वृद्धि हुई।





10. भारत के पंजाब में जमीन को उपजाऊ बनाकर गेहूँ व कपास की खेती हेतु कैनाल कॉलोनी' (नहर बस्ती) बसायी गयी। इस कैनाल कॉलोनी में उन मजदूरों को था जिन्हें खेतों, नहर निर्माण आदि के काम में लगाया जाता था।



11. यूरोप के शक्तिशाली देश अफ्रीका के विशाल क्षेत्र और वहाँ के खनिज पदार्थों को देखकर वहाँ आकर्षित हुए। उन्होंने एक-एक करके आफ्रीका के क्षेत्रों पर करना करना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि 1885 ई. में बर्लिन की बैठक में यूरोपीय देशों ने अफ्रीका के मानचित्र पर लकीरें खींचकर उसका आपस में बँटवारा कर लिया। इस प्रकार यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका को गुलाम बना लिया।


12.अफ्रीका में 1890 के दशक में रिडरपेस्ट नामक बीमारी तेजी से फैल गई। मवेशियों में प्लेग की तरह फैलने वाली यह बीमारी 1892 में अफ्रीका के अटलांटिक तट तक जा पहुँची। इस बीमारी ने अपने रास्ते में आने वाले 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया।



13. भारत के लाखों मजदूरों को भी एक अनुबंध के तहत अपना देश छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। अनुबंधित (गिरमिटिया) श्रमिकों का बाहर के देशों में ले जाने के लिए उनकी भर्ती एजेंटों के द्वारा की जाती थी। ये एजेंट लोगों को अनेक प्रकार के झूठ बोलकर उन्हें बहकाते थे। अनुबंध व्यवस्था को नयी दास प्रथा भी कहा जाता था।अनुबंध समाप्त हो जाने के उपरान्त भी अधिकांश श्रमिक उन्हीं देशों में बस गए। भारत में इस नयी दास प्रथा का विरोध हुआ और अन्ततः उसकी समाप्ति हो गयी।


14. 1914 ई. से 1919 ई. के बीच विश्व के शक्तिशाली देशों की आपसी औपनिवेशिक प्रतिस्पर्द्धा और उनके साम्राज्यवादी इरादों के कारण प्रथम विश्वयुद्ध हुआ। यह मानव सभ्यता के इतिहास का भीषण युद्ध कहा जाता है। इसमें सभी प्रकार के मारक हथियारों आदि का प्रयोग किया गया। इसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण विश्व की भारी तबाही हुई। लाखों लोग इसके कारण प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूप में मारे गए और असंख्य लोग घायल हुए। इस युद्ध के न केवल यूरोप पर, समस्त विश्व की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव हुए।


15.1929 ई. में सम्पूर्ण विश्व को महामंदी के संकट का सामना करना पड़ा। इस महामंदी के प्रमुख कारण थे-कृषि क्षेत्रों में अति उत्पादकता की समस्या और अमेरिका से लिए कर्जे को न चुका पाना। इस महामंदी ने समस्त यूरोप और अमेरिका को बुरी तरह प्रभावित किया। यहाँ तक कि भारत पर भी इसके प्रभाव हुए। 



16● 1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ और 1945 ई. तक यह युद्ध लगातार चलता रहा। इस युद्ध के भी अत्यन्त विनाशकारी प्रभाव हुए। युद्धोत्तर काल में पुनर्निर्माण के कार्य करना एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया। इस युद्ध के बाद विश्व में दो बड़ी शक्तियों 

अमेरिका और सोवियत संघ का उदय हुआ और सम्पूर्ण विश्व इन दोनों शक्तियों के खेमों में बट गया।




17● 1944 ई. में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वहस नामक स्थान पर ब्रेटन वुड्स समझौता' हुआ। इसके साथ ही इस समझौते के आधार पर विश्व की वही शक्तियों की आर्थिक शक्तियों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने हेतु विश्व बैंक और आई. एम. एफ. की स्थापना की गयी। इन दोनों को 'ब्रेटन वुड्स

की जुड़वाँ संताने भी कहा जाता है। इन दोनों संस्थानों

ने 1947 ने औपचारिक रूप से काम करना शुरू किया। 


18.द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त विकासशील देशों ने अपनी आर्थिक उन्नति हेतु नयी अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली की माँग की और इसी के परिणामस्वरूप जी-77 देश के नाम से विकासशील देशों का एक संगठन बना।




महत्त्वपूर्ण शब्दावली




1.वीटो-इसे निषेधाधिकार भी कहा जाता है। इसके माध्यम से एक ही सदस्य की असहमति द्वारा किसी भी प्रस्ताव को खारिज किया जा सकता है।


 2.आयात शुल्क यह किसी दूसरे देश से आने वाली वस्तुओं पर वसूल किया जाने वाला एक कर होता है। यह कर या शुल्क उस स्थान पर लिया जाता है जहाँ से

वह वस्तु देश में आती है अर्थात् किसी सड़क सीमा बन्दरगाह अथवा हवाई अड्डे पर



 3.विनिमय दर - इस व्यवस्था के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की सुविधा हेतु विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है। यह दो प्रकार की होती है स्थिर विनिमय दर और परिवर्तनशील विनिमय दर कहा जाता है।


4.स्थिर विनिमय दर-जब विनिमय दर स्थिर होती है और उसमें आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने हेतु सरकारों को हस्तक्षेप करना होता है तो इस प्रकार की विनिमय दर को स्थिर विनिमय दर' कहा जाता है। 



5. लचीली विनिमय दर-इस प्रकार की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाजार में विभिन्न मुद्राओं की माँग या आपूर्ति के आधार पर सिद्धान्ततः सरकारों के हस्तक्षेप के बिना ही घटती या बढ़ती रहती है।


6.वैश्वीकरण विश्व को आर्थिक रूप से एकीकृत करने की प्रक्रिया।


7.कौड़ियों-प्राचीन काल में पैसे या मुद्रा के रूप में प्रयुक्त की आने वाली वस्तुएँ 


8.कुटीर उद्योग-ग्रामीण क्षेत्रों में घरों में चलाए जाने वाले उद्योग।


9. पूजी का प्रवाह- इस प्रकार के प्रवाह में पूँजीपति अपनी पूँजी को दूर स्थित क्षेत्रों में अल्प या दीर्घ अवधि के लिए निवेश कर देते हैं।


10• सिल्क मार्ग-जमीन या समुद्र से होकर गुजरने वाले ये मार्ग न केवल एशिया के विशाल क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ते थे, बल्कि एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोइते थे। इस मार्ग से ही चीन से पश्चिमी देशों को विशेष रूप से रेशम (सिल्क) का निर्यात किया जाता था। इसी कारण इस मार्ग को सिल्क मार्ग कहा जाता था। 


11● प्राथमिक उत्पाद जो उत्पाद सीधे प्रकृति की सहायता से प्राप्त किए जाते हैं, उन्हें प्राथमिक उत्पाद' कहा जाता है, जैसे- कृषि उत्पादों में गेहूँ और कपास

और खनिज उत्पादों में कोयला आदि। 


12• उपनिवेशवाद-अपने राजनीतिक, आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए एक शक्तिशाली देश के द्वारा किसी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था और उसके शासन पर कब्जा करके उसका शोषण करना: उपनिदेशवाद' कहा जाता है। 



13● कॉर्न लॉ-ब्रिटेन में बड़े भू-स्वामियों के दबाव में आकर वहाँ की सरकार ने मक्का के आयात पर पाबन्दी लगा दी। जिन कानूनों के आधार पर यह पाबन्दी लगायी गयी थी. उन्हें ही 'कॉर्न-लॉ' कहा जाता था।


14• होसे-त्रिनिदाद में आप्रवासी लोगों के द्वारा मुहर्रम के सालाना जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले का रूप दिया गया था। इस मेले को ही 'होसे कहा जाता है।



15 • गिरमिटिया मजदूर-औपनिवेशिक शासन के समय अनेक लोगों को काम करने के लिए फिजी, गुयाना, वेस्टइंडीज आदि स्थानों पर ले जाया गया था। इन मजदूरों को ही बाद में गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा। मजदूरों को एक अनुबंध के तहत ले जाया जाता था। बाद में इस अनुबंध को गिरमिट' कहा जाने लगाते


16● व्यापार अधिशेष वह व्यापारिक स्थिति, जिसमें आपसी व्यापार से किसी देश को लाभ हो, उसे व्यापार अधिशेष' कहा जाता है।


17 • हायर परवेज-वस्तुओं को खरीदने की वह व्यवस्था, जिसमें खरीदार उस वस्तु की कीमत किश्तों (साप्ताहिक या मासिक) में चुकाता है, 'हायर परचेज के नाम से जानी जाती है।






            महत्त्वपूर्ण तिथियाँ


1● 15वीं शताब्दी कोलम्बस द्वारा अमेरिका की खोज।


2● 19वीं शताब्दी- श्रमिकों की अनुबंध व्यवस्था का आरम्भ।


3.1820 ई-चीन के साथ अफीम का व्यापार शुरू होना।


4• 1660 ई. इस दशक में संसार के बन्दरगाहों पर बड़े एम्पोरियम खोले गए।


5● 1885 ई. यूरोपीय के शक्तिशाली देशों की वर्लिन में बैठक।


6•1890 ई.- अफ्रीका में रिडरपेस्ट नामक बीमारी का प्रसार ।


7 ● 19वीं सदी का अन्त-उपनिवेशवाद का विस्तार ।


8● 1914-1919 ई. प्रथम विश्वयुद्ध ।



9.1920 ई. अमेरिका में बृहत् उत्पादन पद्धति के आधार पर उत्पादन का शुरू होना।


10.1929 ई.- विश्व में आर्थिक महामंदी का संकट।


11.1944 ई.-ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर विश्व के बड़े देशों का मौद्रिक एवं आर्थिक सम्मेलन। साथ ही मुद्राकोष-आई.एम.एफ. और विश्व बैंक का गठन।


12● 1939 ई. और 1945 ई.-द्वितीय विश्वयुद्ध । 1947 ई. विश्व बैंक और आई.एम.एफ. का औपचारिक रूप से कार्य आरम्भ करना।


13 ● 1949 ई.-चीन की क्रांति।


14.1970 ई. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एशिया के देशों में विस्तार ।





बहुविकल्पीय प्रश्न 1 अंक


प्रश्न 1. अठारहवीं शताब्दी तक संसार के कौन-से देश सबसे धनी देश माने जाते थे?


(क) जापान और भारत


(ख) फ्रांस और अमेरिका


(घ) चीन और इटली


(ग) चीन और भारत


उत्तर-


(ग) चीन और भारत


प्रश्न 2. महामंदी का प्रारम्भ किस वर्ष हुआ?



(क) 1919 ई.


 (ख) 1924 ई.


 (ग) 1929 ई.


 (घ) 1934 ई.


उत्तर- (ग) 1929 ई.


प्रश्न 3. ब्रिटेन की सरकार ने बड़े भूस्वामियों के दबाव में आकर मक्का के आयात पर पाबन्दी लगा दी। जिस कानून के आधार पर यह पाबन्दी लगायी गयी, उसे क्या कहा जाता है?


(क) ब्लैक-लॉ


 (ख) कॉर्न-लॉ 


(ग) क्रोप-लॉ 


(घ) प्रोडक्शन-लॉ


उत्तर (ख) कॉर्न-लॉ



प्रश्न 4. जमीन को उपजाऊ बनाकर गेहूँ व कपास की खेती हेतु 'कैनाल कॉलोनी कहाँ बसायी गयी?


(क) गुजरात में


(ख) उत्तर प्रदेश में


(ग) पंजाब में


(घ) ओडिशा में




उत्तर


(ग) पंजाब में


प्रश्न 5.यूरोपीय देशों ने मानचित्र पर लकीरें खींचकर किस महाद्वीप का आपस में बँटवारा कर लिया?


(क) एशिया


(ख) अफ्रीका


(ग) अमेरिका


(घ) ऑस्ट्रेलिया


उत्तर-


(ख) अफ्रीका


प्रश्न 6. संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है?


(क) वाशिंगटन


(ख) जिनेवा


(ग) न्यूयॉर्क


(घ) ऑस्ट्रिया


उत्तर


(ग) न्यूयॉर्क



प्रश्न 7.अफ्रीका में किस बीमारी के प्रसार से अधिकांश जानवरों की मृत्यु हो गयी?


(क) प्लेग


(ख) रिंडरपेस्ट


(ग) मलेरिया


(घ) एनीमल फीवर


उत्तर


(ख) रिंडरपेस्ट


प्रश्न 8. अनुबंध व्यवस्था' को और किस नाम से जाना जाता है?


(क) आपसी समझौता


(ख) गुलाम-प्रथा


(ग) सशर्त प्रथा


(घ) नयी दास-प्रथा


उत्तर-


(घ) नयी दास-प्रथा


प्रश्न 9.1914 ई. से 1919 ई. के बीच विश्व के शक्तिशाली देशों की आपसी औपनिवेशिक प्रतिस्पर्द्धा और उनके साम्राज्यवादी इरादों के कारण कौन-सा युद्ध हुआ?


(क) प्रथम विश्वयुद्ध


(ख) द्वितीय विश्वयुद्ध


(ग) रूस-जापान युद्ध


(घ) अणुबम युद्ध


उत्तर-


(क) प्रथम विश्वयुद्ध


प्रश्न 10. युद्धोत्तर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उन्नत बनाने में किस कार-निर्माता की 'बृहत् उत्पादन पद्धति' का योगदान रहा?


(क) हेनरी फोर्ड का


(ख) टाटा का


(ग) मार्कोनी का


(घ) बिड़ला का



उत्तर


(क) हेनरी फोर्ड का




अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक




प्रश्न 1. नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली से क्या तात्पर्य है?


उत्तर- इसका तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था से था, जिसमें विकासशील देश अपने संसाधनों पर सही मायनों में नियंत्रण कर सके, जिसमें उन्हें विकास के लिए अधिक सहायता मिले, कच्चे माल के सही दाम मिलें और अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाजारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिल सके।


प्रश्न 2. स्थिर विनिमय दर प्रणाली से क्या तात्पर्य है?


उत्तर- जब विनिमय दर स्थिर होती है और उनमें आने वाले उतार-चढ़ावों को नियंत्रित करने के लिए सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है तो ऐसी विनिमय दर को स्थिर विनिमय दर कहा जाता है।


प्रश्न 3.आयात शुल्क से क्या तात्पर्य है?


उत्तर- किसी दूसरे देश से आने वाली चीजों पर वसूल किया जाने वाला शुल्क। यह कर या शुल्क उस जगह लिया जाता है जिस जगह से वह चीज देश में प्रवेश करती है यानी सीमा पर, बंदरगाह पर या हवाई अड्डे पर।


प्रश्न 4. भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण से क्या तात्पर्य है? 


उत्तर – एक देश की अर्थव्यवस्था को दूसरे देश की अर्थव्यवस्था से तथा संपूर्ण विश्व के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था का एक-दूसरे से विभिन्न क्षेत्रों के माध्यम से जुड़ा होना ही भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण कहलाता है।


प्रश्न 5. रेशम मार्ग क्यों महत्त्वपूर्ण था?


उत्तर- रेशम मार्ग एक ऐसा मार्ग था जो एशिया के विशाल भागों को परस्पर जोड़ने के साथ ही यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका से जा मिलता था। यह मार्ग ईसा पूर्व में ही अस्तित्व में आ चुका था और लगभग 15वीं शताब्दी तक अस्तित्व में था, इस मार्ग से अधिकांशतः रेशम का व्यापार होता था इसलिए इसे रेशम मार्ग कहा जाता था।



प्रश्न 6. व्यापार अधिशेष की परिभाषा दीजिए। भारत के साथ ब्रिटेन को व्यापार अधिशेष कैसे प्राप्त होता था?


उत्तर- व्यापार अधिशेष के अन्तर्गत निर्यात की कीमत आयात से अधिक होती है। ब्रिटेन में भारत से खनिज सम्पदा और खाद्यान्न भेजा जाता था और उसके बदले में ब्रिटेन के उद्योगों में तैयार माल भारत में आयात होता था उसकी बाजार कीमत भेजे गए माल से कहीं ज्यादा होती थी। 


प्रश्न 7. 19वीं सदी के आखिरी दशकों में यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा उपनिवेश कायम करने के क्या प्रभाव पड़े?


 उत्तर- उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों में यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा उपनिवेश कायम करने पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े


(i) एशिया और अफ्रीका महाद्वीप में कष्टदायक आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिकीय परिवर्तन आए।


 (ii) साम्राज्यवादी देशों ने अफ्रीका देशों को आपस में एक मेज पर बैठकर बाँट लिया था।


प्रश्न 8. अफ्रीका में आने के लिए यूरोपियों के लिए प्रमुख आकर्षण के कारण क्या थे?


उत्तर- यूरोपीय देश खनिज संसाधनों के लिए अफ्रीका की ओर आकर्षित हुए तथा अफ्रीका के विशाल भू-क्षेत्रों और बाजार पर यूरोपीय देशों की नजर थी।


प्रश्न 9.उन्नीसवीं शताब्दी में हजारों लोग यूरोप से अमेरिका क्यों जाने लगे थे?


उत्तर- यूरोप में गरीबी की भरमार, भूखमरी, बीमारियाँ, धार्मिक टकराव व धार्मिक असंतुष्टों को कठोर दण्ड देने के कारण, अमेरिका में संसाधनों की बहुलता के कारण तथा अमेरिका में खेती योग्य भूमि ज्यादा थी और जनसंख्या कम थी।


प्रश्न 10. जब हम कहते हैं कि सोलहवीं सदी में दुनिया 'सिकुड़ने' लगी थी तो इसका क्या मतलब है?


उत्तर- यहाँ दुनिया के 'सिकुड़ने' का मतलब है- विश्व के विभिन्न महाद्वीपों के व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक सम्बन्धों में वृद्धि होना।







लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक




प्रश्न 1. 1929 की महामंदी का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा? 


उत्तर- 1929 की महामंदी का प्रभाव भारत पर भी पड़ा। महामंदी ने भारतीय व्यापार को फौरन प्रभावित किया। 1928 से 1934 के बीच देश के आयात-निर्यात घटकर लगभग आधे रह गए थे। 1928 से 1934 के बीच भारत में गेहूँ की कीमत 50 प्रतिशत गिर गई। शहरी निवासियों के मुकाबले किसानों और काश्तकारों को ज्यादा नुकसान हुआ। यद्यपि कृषि उत्पादों की कीमत तेजी से नीचे गिरी लेकिन सरकार ने लगान वसूली में छूट देने से इन्कार कर दिया। सबसे बुरी मार उन काश्तकारों पर पड़ी जो विश्व बाजार के लिए - उपज पैदा करते थे। टाट का निर्यात बंद होने से कच्चे पटसन की कीमतों में 60 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आ गई। मंदी के इन्हीं सालों में भारत कीमती धातुओं खासतौर से सोने का निर्यात करने लगा। 1931 में मंदी अपने चरम पर थी और ग्रामीण भारत असंतोष व उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। यह मंदी शहरी भारत के लिए अधिक दुखदायी नहीं रही। कीमतें गिरते जाने के बावजूद शहरों में रहने वाले ऐसे लोगों की हालत ठीक रही जिनकी आय निश्चित थी।



प्रश्न 2: हमारे खाद्य पदार्थ विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का किस प्रकार उदाहरण पेश करते हैं? 


उत्तर हमारे खाद्य पदार्थ दूर देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कई उदाहरण पेश करते हैं। जब भी व्यापारी और मुसाफिर किसी नए देश में जाते थे, जाने-अनजाने वहाँ नयी फसलों के बीज बो आते थे। माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम में पहुँचे या संभव है कि पास्ता अरब यात्रियों के द्वारा पाँचवीं सदी में सिसली पहुँचा। इसी तरह के आहार भारत और जापान में भी पाए जाते हैं। आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद और ऐसे ही बहुत सारे खाद्य पदार्थ लगभग पाँच सौ साल पहले हमारे पूर्वजों के पास नहीं थे। ये खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में तब पहुँचे जब कोलंबस ने अमेरिका को खोजा। इन अनुमानों के आधार पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि आधुनिक काल से पहले भी दूर देशों के बीच सांस्कृतिक लेन-देन चल रहा होगा।


प्रश्न 3. अमेरिका की खोज से दुनिया में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।


उत्तर- 16वीं सदी में जब यूरोपीय जहाजियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता ढूंढ़ लिया और जब वे अमेरिका तक जा पहुँचे तो दुनिया छोटी-सी दिखाई देने लगी। कई सदियों से हिंद महासागर के पानी में फलता-फूलता व्यापार तरह-तरह के सामान, लोग, ज्ञान और परंपराएँ एक जगह से दूसरी जगह आ जा रही थीं। भारतीय उपमहाद्वीप इसमें अहम भूमिका रखता था। यूरोपियों के आगमन से यह आवाजाही बढ़ने लगी। अब तक अमेरिका का दुनिया से कोई संपर्क नहीं था लेकिन 16वीं सदी से उसकी विशाल भूमि और बेहिसाब फसलें व खनिज पदार्थ हर दिशा में जीवन का रंग-रूप बदलने लगी। 17वीं सदी के आते-आते पूरे यूरोप में दक्षिण अमेरिका की धन-संपदा के बारे में तरह-तरह के किस्से बनने लगे थे। 16वीं सदी के मध्य तक आते-आते पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की विजय का सिलसिला शुरू हो गया था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था। इस प्रकार दुनिया में बहुत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होने शुरू हो गए थे।


प्रश्न 4. 19वीं सदी के अंत में विश्व में किस प्रकार उपनिवेशवाद फैला?


उत्तर- 19वीं सदी के आखिरी दशकों में व्यापार बढ़ा और बाजार तेजी से फैलने लगे। यह केवल फैलते व्यापार और संपन्नता का ही दौर नहीं था। व्यापार में बढ़ोतरी और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ निकटता का एक परिणाम यह हुआ कि दुनिया के बहुत सारे भागों में स्वतंत्रता और आजीविका के साधन छिनने लगे। 19वीं सदी के आखिरी दशकों में यूरोपियों की विजयों से बहुत सारे कष्टदायक आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिकीय परिवर्तन आए और औपनिवेशिक समाजों को विश्व अर्थव्यवस्था में समाहित कर लिया गया। 1885 में यूरोप के ताकतवर देशों की बर्लिन में एक बैठक हुई, जिसमें अफ्रीका के नक्शे पर लकीरें खींचकर उनको आपस में बाँट लिया गया। 19वीं सदी के अंत में ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने शासन वाले विदेशी क्षेत्रफल में भारी वृद्धि कर ली थी। बेल्जियम और जर्मनी नयी औपनिवेशिक ताकतों के रूप में सामने आए। 1890 के दशक के आखिरी वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका भी औपनिवेशिक ताकत बन गया।



प्रश्न 5. भारत के सूती वस्त्र उद्योग पर उपनिवेशवाद का क्या प्रभाव पड़ा?


उत्तर


भारत में पैदा होने वाली महीन कपास का यूरोपीय देशों को निर्यात किया जाता था। औद्योगीकरण के बाद ब्रिटेन में भी कपास का उत्पादन बढ़ने लगा था। इस कारण वहाँ के उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कपास तथा सूती वस्त्रों के आयात पर रोक लगाए। फलस्वरूप ब्रिटेन में आयतित कपड़ों पर सीमा शुल्क थोप दिए गए। वहाँ महीन भारतीय कपड़े का आयात कम होने लगा। 19वीं सदी की शुरुआत में ही ब्रिटिश कपड़ा उत्पादक दूसरे देशों में भी अपने कपड़ों के लिए नए-नए बाजार ढूँढ़ने लगे थे। सीमा ■ शुल्क की व्यवस्था के कारण ब्रिटिश बाजारों से बेदखल हो जाने के बाद भारतीय कपड़ों को दूसरे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। सन् 1800 के आसपास निर्यात में सूती कपड़े का प्रतिशत 30 था जो 1815 में घटकर 15 प्रतिशत रह गया। 1870 तक यह अनुपात केवल = 3 प्रतिशत रह गया।


प्रश्न 6.प्रथम विश्वयुद्ध के ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।


उत्तर


प्रथम विश्व युद्ध से पहले ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। युद्ध के बाद सबसे लंबा संकट उसे ही झेलना पड़ा। युद्ध के बाद भारतीय बाजार में पहले वाली (वर्चस्व वाली) स्थिति प्राप्त करना ब्रिटेन के लिए बहुत मुश्किल हो गया था। युद्ध के खर्चे की भरपाई करने के लिए ब्रिटेन ने अमेरिका से जमकर कर्जे लिए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि युद्ध खत्म होने तक ब्रिटेन भारी विदेशी कर्जों में दब चुका था। युद्ध के कारण आर्थिक उछाल का जो माहौल था अब वह खत्म हो चुका था, जिससे उत्पादन गिरने लगा और बेरोजगारी बढ़ गई। सरकार ने भारी भरकम युद्ध संबंधी व्यय में भी कटौती शुरू कर दी ताकि शांतिकालीन करों के सहारे ही उनकी भरपाई की जा सके। इन सारे प्रयासों से रोजगार भारी तादाद में खत्म हो गए। 1921 में हर पाँच में से एक ब्रिटिश मजदूर के पास काम नहीं था।


प्रश्न 7.अफ्रीका में रिंडरपेस्ट आने के प्रभावों का उल्लेख कीजिए। 


उत्तर .जमीन और मवेशी अफ्रीकी लोगों की आय के मुख्य स्रोत थे। जब यूरोपियनों ने अफ्रीकी लोगों को श्रमिक बनाना चाहा तो उन्होंने इनकार कर दिया। रिंडरपेस्ट पशुओं का एक रोग है जो अफ्रीकी पशुओं में फैल गया था। इसके फैलने से अफ्रीका के 90 प्रतिशत मवेशी मौत का शिकार हुए। पशुओं के मारे जाने से अफ्रीकियों के रोजी-रोटी के साधन नष्ट हो गए। अपनी सत्ता को और सुदृढ़ करने तथा अफ्रीकियों को श्रम बाजार में ढकेलने के लिए वहाँ के बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे हुए पशु अपने कब्जे में ले लिए। इस प्रकार बचे हुए पशु संसाधनों पर कब्जे से यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ्रीका को जीतने व गुलाम बना लेने का सुनहरा अवसर हाथ लग गया था।


प्रश्न 8. सिल्क मार्ग ने किस प्रकार विश्व को जोड़ने का प्रयास किया?


 उत्तर- सिल्क मार्ग वह मार्ग था जिसके द्वारा चीनी रेशम का व्यापार होता था। यह मार्ग जमीन और समुद्र दोनों में थे। इन मार्गों ने विश्व को जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो निम्नलिखित थी


 (i) ये मार्ग एशिया के विशाल क्षेत्रों को जोड़ने के साथ-साथ एशिया,यूरोप और उत्तरी अमेरिका महाद्वीपों को भी आपस में जोड़ते थे।


 (ii) इन मार्गों द्वारा रेशम के साथ-साथ चीनी पॉटरी का भी निर्यात होता था। साथ ही भारत व दक्षिण पूर्व एशिया से कपड़े, मसाले और चीन व विश्व के अन्य भागों में जाते थे।


(iii) इन सामानों की कीमत यूरोप द्वारा सोने व चाँदी के रूप में चुकाई जाती थी।


(iv) इन मार्गों द्वारा व्यापार के साथ-साथ सांस्कृतिक व धार्मिक आदान-प्रदान भी होता था। 


(v) बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, मुस्लिम धर्म इसी मार्ग द्वारा ही संभवतः विश्व के अन्य भागों में फैले।


प्रथा 9 वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डालिए।


उत्तर 1890 में वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था का उदय हो गया था। इसके कारण श्रम विस्थापन रुझानों, पूँजी प्रवाह, पारिस्थितिकी और तकनीक में कई बदलाव आए, जो इस प्रकार थे


(i) इसमें खाद्य पदार्थ गाँव या कस्बों की बजाए विश्व के अन्य स्थानों से पहुंचने लगे।


(ii) इस व्यवस्था में जमीन के मालिक स्वयं कृषि कार्य नहीं करते थे। वे यह कार्य औद्योगिक मजदूरों से करवाने लगे।


 (iii) खाद्य पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए रेलनेटवर्क, पानी के जहाजों का प्रयोग किया जाने लगा।


 (iv) दक्षिणी यूरोप, एशिया, अफ्रीका तथा कैरीबियन द्वीप समूह के मजदूरों को ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन तथा अमेरिका ले जाकर कम वेतन पर कार्य करवाया गया।


प्रश्न 10. 19वीं शताब्दी की अनुबंध व्यवस्था (नयी दास प्रथा) ने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। कैसे? 



उत्तर

19वीं शताब्दी की अनुबंध व्यवस्था (नयी दास प्रथा) द्वारा एशिया, अफ्रीका व चीन आदि देशों और महाद्वीपों से आए लोगों ने अपने नए स्थानों पर एक नई संस्कृति को जन्म दिया। इसका स्वरूप निम्नलिखित था


(i) त्रिनिदाद में मुहर्रम के सालाना जुलूस को एक विशाल उत्सवी मेले का रूप दे दिया गया, जिसे 'होसे हुसैन' के नाम से जाना गया। इसमें सभी धर्मों व नस्लों के मजदूर हिस्सा लेते थे।


(ii) भारतीय आप्रवासियों व कैरीबियन द्वीप समूह के लोगों ने मिलकर एक नए धर्म 'रास्ताफरियानवाद' को जन्म दिया। बाद में जैमेका के रैगे गायक बॉव मालें ने इसे विश्व ख्याति दिलाई। 


(iii) त्रिनिदाद, गुयाना में मशहूर चटनी म्यूजिक भी भारतीय आप्रवासियों की देन है जो उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रतीक है। इस प्रकार 'नई दास प्रथा' ने नई सांस्कृतिक वातावरण को जन्म दिया जो अनुबंधित श्रमिकों की नई जगहों पर नई पहचान बनी।


प्रश्न 11. सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान-प्रदान के दो उदाहरण दीजिए। 


एक उदाहरण एशिया से और एक उदाहरण अमेरिकी महाद्वीपों के बारे में चुनिए ।



उत्तर एशिया (चीन)- 15वीं शताब्दी तक बहुत सारे 'सिल्क मार्ग' क अस्तित्व में आ चुके थे। इसी रास्ते से चीनी पॉटरी जाती थी और इसी रास्ते से अ भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े व मसाले दुनिया के दूसरे भागों में पहुँचते थे। वापसी में सोने-चाँदी जैसी कीमती धातुएँ यूरोप से एशिया पहुँचती थी। अमेरिका-सोलहवीं सदी में जब यूरोपीय जहाजियों ने एशिया तक का समुद्री जि रास्ता खोज लिया और वे अमेरिका तक जा पहुँचे तो अमेरिका की विशाल भूमि वि और बेहिसाब फसलें और खनिज पदार्थ हर दिशा में जीवन का रंग-रूप बदलने उ लगे। आज के पेरू और मैक्सिको में मौजूद खानों से निकलने वाली कीमती जु धातुओं, खासतौर से चाँदी ने भी यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्चिम कि एशिया के साथ होने वाले उसके व्यापार को गति प्रदान की।




प्रश्न 12. ब्रेटन वुड्स समझौते का क्या अर्थ है ?


उत्तर युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह था कि औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोज़गार बनाए रखा जाए। इस फ्रेमवर्क पर जुलाई 1944 में अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी। इसी को ब्रेटन वुड्स समझौते के नाम से जाना जाता है।


सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की गई। युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए पैसे का इंतजाम करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक का गठन किया गया। इसी वजह से विश्व बैंक और आई.एम.एफ. को ब्रेटन वुड्स संस्थान या ब्रिटेन वुड्स ट्विन भी कहा जाता है। इसी आधार अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अक्सर ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है। 


प्रश्न 13. महामंदी के कारणों की व्याख्या कीजिए। 


उत्तर 1929 में आर्थिक महामंदी की शुरुआत हुई। इस मंदी के प्रमुख न कारण निम्नलिखित थे


(i) औद्योगिक क्रांति के कारण अमेरिका तथा ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर उत्पादन कार्य होने लगा था। 1930 तक तैयार माल का इतना बड़ा भण्डार एकत्र हो गया कि उनका कोई खरीददार न रहा।


(ii) कृषि क्षेत्र में अति उत्पादन के कारण कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगी। किसानों ने अपनी घटती आय को बढ़ाने के लिए अधिक उत्पादन करना शुरू कर दिया किंतु इससे कीमतें और गिरने लगी। खरीददारों के अभाव में कृषि उपज पड़ी पड़ी सड़ने लगी। 


(iii) संकट से पूर्व बहुत-से देश अमेरिका से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था चलाते थे। 1928 के कुछ समय पहले विदेशों में अमेरिका का कर्ज एक अरब डॉलर था। साल भर के भीतर यह कर्ज घटकर केवल चौथाई रह गया था। जो देश अमेरिकी कर्ज पर सबसे ज्यादा निर्भर थे उनके सामने गहरा संकट खड़ा हो गया।


(iv) यूरोप में कई बड़े बैंक धराशायी हो गये। कई देशों की मुद्रा की कीमत बुरी तरह गिर गई। अमेरिकी सरकार इस महामंदी से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आयातित पदार्थों पर दो गुना सीमा शुल्क वसूल करने लगी।


(v) अमेरिका के शेयर बाजार में शेयरों की कीमत में गिरावट आ गई। इसकी वजह से वहाँ लाखों व्यापारियों का दीवाला निकल गया। 


प्रश्न 14. जी-77 देशों से आप क्या समझते हैं? जी-77 को किस आधार पर ब्रेटन वुड्स । की जुड़वाँ संतानों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है? व्याख्या कीजिए।




उत्तर- वे विकासशील देश जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए थे किंतु 50 से 60 के दशक में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तेज प्रगति से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने एक नई अंतर्राष्ट्रीय  आर्थिक प्रणाली के लिए आवाज उठाई और अपना एक संगठन बनाया जिसे समूह-77 या जी-77 के नाम से जाना जाता है। ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का जन्म हुआ था


जिन्हें ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानें कहा जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक पर केवल कुछ शक्तिशाली विकसित देशों का ही प्रभुत्व था इसलिए


उनसे विकासशील देशों को कोई लाभ नहीं हुआ। इसलिए ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानों विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रतिक्रिया स्वरूप विकासशील देशों ने जी-77 नामक संगठन बनाकर नई आर्थिक प्रणाली की माँग की ताकि उनके आर्थिक उद्देश्य पूरे हो सकें। उनके प्रमुख आर्थिक उद्देश्यथे-अपने संसाधनों पर उनका पूरा नियंत्रण हो, कच्चे माल के सही दाम मिले और अपने तैयार मालों को विकसित देशों के बाजारों से बेचने के लिए बेहतर पहुँच मिले।





दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 6 अंक


प्रश्न 1.बताइए पूर्व-आधुनिक विश्व में बीमारियों के वैश्विक प्रसार ने अमेरिकी भू-भागों के उपनिवेशीकरण में किस प्रकार मदद की ?


उत्तरं


(i) 16वीं सदी के मध्य तक पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं की। विजय का सिलसिला शुरू हो गया था। उन्होंने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था।


(ii) यूरोपीय सेनाएँ केवल अपनी सैनिक ताकत के दम पर नहीं जीतती थीं। स्पेनिश विजेताओं के पास तो कोई परंपरागत किस्म का सैनिक हथियार नहीं था। यह हथियार तो चेचक जैसे थे जो स्पेनिश सैनिकों और अफ़सरों के साथ वहाँ जा पहुंचे थे।


 (iii) लाखों साल से दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिका के लोगों के शरीर में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों से बचने की रोग-प्रतिरोधी क्षमता नहीं थी।


(iv) इस नए स्थान पर चेचक बहुत मारक साबित हुई। एक बार संक्रमण शुरू होने के बाद तो यह बीमारी पूरे महाद्वीप में फैल गई।


 (v) जहाँ यूरोपीय लोग नहीं पहुँचे थे, वहाँ के लोग भी इसकी चपेट में आने लगे। इसने सभी समुदायों को खत्म कर डाला। इस तरह घुसपैठियों की जीत का रास्ता आसान होता चला गया।


(vi) बंदूकों को तो खरीदकर या छीनकर हमलावरों के खिलाफ़ भी इस्तेमाल किया जा सकता था, परन्तु चेचक जैसी बीमारियों के मामले में तो ऐसा नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमलावरों के पास उससे बचाव का तरीका भी था और उनके शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता भी विकसित हो चुकी थी। इस तरह से बिना किसी चुनौती के बड़े साम्राज्यों को जीतकर अमेरिका में उपनिवेशों की स्थापना हुई।


प्रश्न 2.खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दीजिए।



उत्तर 1890 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था सामने आ चुकी थी। इससे तकनीक में भी बदलाव आ चुके थे। खाद्य उपलब्धता पर भी तकनीक का प्रभाव पड़ने लगा जो इस प्रकार था


1. रेलवे का विकास -अब भोजन किसी आस-पास के गाँव या कस्बे से नहीं बल्कि हज़ारों मील दूर से आने लगा था। खाद्य पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए रेलवे का इस्तेमाल किया जाता था। पानी के जहाजों से इसे दूसरे देशों में पहुँचाया जाता था।


2. नहरों का विकास-खाद्य उपलब्धता पर तकनीक के प्रभाव का बहुत अच्छा उदाहरण हम पंजाब में देखते हैं। यहाँ ब्रिटिश भारतीय सरकार ने अर्द्ध-रेगिस्तानी परती जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछा दिया ताकि निर्यात के लिए गेहूं की खेती की जा सके। इससे पंजाब में गेहूं का उत्पादन कई गुना बढ़ गया और गेहूँ को बाहर बेचा जाने लगा।


3. रेफ्रिजरेशन तकनीक का विकास - 1870 के दशक तक अमेरिका से यूरोप को मांस का निर्यात नहीं किया जाता था। उस समय जिंदा जानवर ही भेजे जाते थे, जिन्हें यूरोप ले जाकर काटा जाता था। लेकिन जिंदा जानवर बहुत ज्यादा जगह घेरते थे। काफी संख्या में ये लंबे सफर में मर जाते थे। अधिकांश का वजन गिर जाता था या वे खाने लायक नहीं रहते थे। इसलिए मांस खाना एक महँगा सौदा था। नई तकनीक के आने पर यह स्थिति बदल गई। पानी के जहाज़ों में रेफ्रिजरेशन की तकनीक स्थापित कर दी गई, जिससे जल्दी खराब होने वाली चीजों को भी लंबी यात्राओं पर ले जाया जा सकता था। अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड सब जगह से जानवरों की बजाए उनका मांस ही यूरोप भेजा जाने लगा। इससे न केवल समुद्री यात्रा में आने वाला खर्चा कम हो गया। बल्कि यूरोप में मांस के दाम भी गिर गए। अब अधिकांश लोगों के भोजन में मांसाहार शामिल हो गया।


प्रश्न 18वीं शताब्दी के अंत में हुए उन परिवर्तनों का वर्णन कीजिए जिन्होंने ब्रिटेन के स्वरूप को बदल दिया। 


उत्तर


18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटेन में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए जिन्होंने इसके स्वरूप को बदल दिया। ये परिवर्तन निम्नलिखित थे


(i) 18वीं सदी के आखिरी दशकों में ब्रिटेन की आबादी तेजी से बढ़ने लगी थी। इससे देश में भोजन की माँग बढ़ी।


 (ii) जैसे-जैसे शहर फैले और उद्योग बढ़ने लगे, कृषि उत्पादों की माँग भी बढ़ने लगी।


(iii) कृषि उत्पाद महंगे होने लगे। 


(iv) बड़े भू-स्वामियों के दबाव में आकर सरकार ने मक्का के आयात पर 'कॉर्न-लॉ' द्वारा पाबंदी लगा दी।


(v) खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी बाशिंदों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह कॉर्न लॉ को समाप्त कर दें।


(vi) कॉर्न-लॉ के खत्म होने के बाद कम कीमत पर खाद्य पदार्थों का आयात किया जाने लगा। आयातित खाद्य पदार्थों की लागत ब्रिटेन में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थों से भी कम थी। फलस्वरूप ब्रिटिश किसानों की हालत बिगड़ने लगी क्योंकि वे आयातित माल की कीमत का मुकाबला नहीं कर सकते थे।


(vii) विशाल भू-भागों पर खेती बंद हो गई थी। हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए। 


(viii) खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट आई तो ब्रिटेन में उपभोग का स्तर बढ़ गया।


(ix) 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटेन की औद्योगिक प्रगति काफी तेज़ रही जिससे लोगों की आय में वृद्धि हुई।


(x) खाद्य पदार्थों का और ज्यादा मात्रा में आयात होने लगा।


 (xi) दुनिया के हर हिस्से में ब्रिटेन का पेट भरने के लिए ज़मीनों को साफ करके खेती की जाने लगी। इन कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे का विकास किया।


(xii) ज्यादा मात्रा में माल ढुलाई के लिए नई गोदियाँ बनाई और पुरानी गोदियों को फैलाया गया। 


(xiii) नयी ज़मीनों पर खेती करने के लिए यह ज़रूरी था कि दूसरे इलाकों के लोग वहाँ आकर बस गए। 


(xiv) इन सारे कामों के लिए पूँजी और श्रम की ज़रूरत थी। इसके लिए लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से पूँजी आने लगी।


(xv) 1890 तक तकनीकी परिवर्तन हो चुके थे। भोजन किसी आस-पास के गाँव या कस्बे से नहीं बल्कि हज़ारों मील दूर से आने लगा था।


(xvi) अपने खेतों पर खुद काम करने वाले किसान ही खाद्य पदार्थ पैदा नहीं कर रहे थे। अब यह काम ऐसे औद्योगिक मज़दूर करने लगे थे जो संभवतः हाल ही में वहाँ आए थे। 


(xvii) खाद्य पदार्थों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए रेलवे का इस्तेमाल किया जाता था। पानी के जहाज़ों से इसे दूसरे देशों में पहुँचाया जाता था। इन जहाजों पर दक्षिण यूरोप, एशिया और अफ्रीका के मज़दूरों से बहुत कम वेतन पर काम करवाया जाता था।


प्रश्न 4. यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने किस प्रकार अफ्रीका को गुलाम बनाया


उत्तर


यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने अफ्रीका को गुलाम इस प्रकार बनाया


(i) प्राचीन काल से ही अफ्रीका में जमीन की कोई कमी नहीं रही जबकि वहाँ की आबादी बहुत कम थी। सदियों तक अफ्रीकियों की ज़िंदगी व कामकाज ज़मीन और पालतू पशुओं के सहारे ही चलता रहा है।


(ii) वहाँ पैसे या वेतन पर काम करने का चलन नहीं था। 19वीं सदी के आखिर में अफ्रीका में ऐसे उपभोक्ता बहुत कम थे, जिन्हें वेतन के पैसे से खरीदा जा सकता था।


(iii) 19वीं सदी के अंत में यूरोपीय ताकतें अफ्रीका के विशाल भू-क्षेत्र और खनिज भंडारों को देखकर इस महाद्वीप की ओर आकर्षित हुई थीं।



(iv) यूरोपीय लोग अफ्रीका में बागानी खेती करने और खादानों का दोहन करना चाहते थे ताकि उन्हें वापस यूरोप भेजा जा सके। 


(v) लेकिन वहाँ के लोग वेतन पर काम नहीं करना चाहते थे। अतः मजदूरों की भर्ती के लिए मालिकों ने कई तरीके अपनाए। 


(vi) उन पर भारी-भरकम कर लाद दिए गए जिनका भुगतान केवल तभी किया जा सकता था जब करदाता खादानों या बागानों में काम करता हो। खानकर्मियों को बाड़ों में बंद कर दिया गया।


(vii) उनके खुलेआम घूमने-फिरने पर पाबंदी लगा दी गई। 


(viii) तभी वहाँ रिडरपेस्ट नामक विनाशकारी पशु रोग फैल गया। यह बीमारी ब्रिटिश आधिपत्य वाले एशियाई देशों से आये जानवरों के जरिए फैली थी।


(ix) अफ्रीका के पूर्वी हिस्से से शुरू होकर बीमारी पूरे महाद्वीप में जंगल की आग की तरह फैल गई।


(x) इस बीमारी ने अफ्रीका के 90 प्रतिशत मवेशियों को मौत की नींद सुला दिया। 


(xi) पशुओं के खत्म हो जाने से अफ्रीकियों के रोजी-रोटी के साधन ही खत्म हो गए।


(xii) अपनी सत्ता को और मज़बूत करने तथा अफ्रीकियों को श्रम बाज़ार में ढकेलने के लिए वहाँ के बागान मालिकों, खान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने बचे-खुचे पशु भी अपने कब्जे में ले लिए। 


(xiii) इससे यूरोपीय उपनिवेशकारों को पूरे अफ्रीका को जीतने व उसे गुलाम बना लेने का बेहतरीन मौका हाथ लग गया।


प्रश्न 5. 19वीं सदी की अनुबंध व्यवस्था, जिसे नयी दास प्रथा भी कहा जाता था, का अर्थ बताइए। भारत के संदर्भ में इसका उल्लेख कीजिए।


या उन्नीसवीं शताब्दी में भारत से विदेश को श्रमिकों को क्यों ले जाया गया? ये श्रमिक अधिकतर किस प्रदेश के थे? उन्हें किस शर्त पर स्वदेश लौटने की छूट दी जाती थी?




उत्तर 19वीं सदी की अनुबंध व्यवस्था को काफी लोगों ने 'नयी दास प्रथा' का नाम दिया है। 19वीं सदी में भारत और चीन के लाखों मज़दूरों को बागानों, खादानों और सड़क व रेलवे निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए दूर-दूर के देशों में ले जाया जाता था।


भारत के संदर्भ में-भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को खास तरह के अनुबंध या एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाता था। इन अनुबंधों में यह शर्त होती थी कि यदि मजदूर अपने मालिक के बागानों में पाँच साल काम कर लेंगे तो वे स्वदेश लौट सकते हैं।


भारत के ज्यादातर अनुबंधित श्रमिक मौजूदा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे इलाकों से जाते थे। 19वीं सदी के मध्य में इन इलाकों में भारी बदलाव आने लगे थे। कुटीर उद्योग खत्म हो रहे थे, ज़मीनों का किराया बढ़ रहा था। खानों और बागानों के लिए ज़मीनों को साफ किया जा रहा था। इन परिवर्तनों से गरीबों के जीवन पर गहरा असर पड़ा। वे बँटाई पर ज़मीन तो ले लेते थे लेकिन उसका भाड़ा नहीं चुका पाते थे। काम की तलाश में उन्हें इ अपने घर-बार छोड़ने पड़े। भारतीय अनुबंधित श्रमिकों को मुख्य रूप से कैरीबियाई द्वीप समूह, मॉरीशस व फ़िजी से लाया जाता था। तमिल अप्रवासी भ सीलोन और मलाया जाकर काम करते थे। अधिकांश अनुबंधित श्रमिकों को असम के चाय बागानों में काम करवाने के लिए ले जाया जाता था।


मजदूरों की भर्ती का काम मालिकों के एजेंट किया करते थे। एजेंटों को कमीशन मिलता था। अधिकतर अप्रवासी अपने गाँव में होने वाले उत्पीड़न और गरीबी से बचने के लिए भी इन अनुबंधों को मान लेते थे। एजेंट भी भावी अप्रवासियों को फुसलाने के लिए झूठी जानकारियाँ देते थे। अधिकतर श्रमिकों को यह भी नहीं बताया जाता था कि उन्हें लंबी समुद्री यात्रा पर जाना







यूपी बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 4 संसाधन एवं विकास


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इकाई 2 : समकालीन भारत-2 (भूगोल)


अध्याय 1 संसाधन एवं विकास









याद रखने योग्य मुख्य बिन्दु


1• हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है


जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक संसाधन है।


2• संसाधनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है


(क) उत्पत्ति के आधार पर – जैव और अजैव


(ख) समाप्यता के आधार पर नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य


 (ग) स्वामित्व के आधार पर व्यक्तिगत सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय


(घ) विकास के स्तर के आधार पर संभावी विकसित भंडार और संचित कोष 



3• एजेंडा 21 एक घोषणा है जिसे 1992 में ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन के तत्वावधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा

स्वीकृत किया गया था। इसका उद्देश्य भूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास हासिल करना है।


4● भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्वों में भौतिक कारक: जैसे- भू-आकृति जलवायु और मृदा के प्रकार तथा मानवीय कारक: जैसे – जनसंख्या घनद


5.प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परंपरा इत्यादि सम्मिलित हैं। - हमारे देश में राष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा निर्धारित वनों के अंतर्गत 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र होना चाहिए जिसकी तुलना में वन के अंतर्गत क्षेत्र काफी कम है।


6• मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले तत्वों, उनके रंग, गहराई, गठन, आयु व रासायनिक और भौतिक गुणों के आधार पर मृदा को जलोद काली मिट्टी लेटराइट मिट्टी, मत्स्थलीय मुढा ताल और पीली मिट्टी के रूप में विभाजित किया जाता है।






महत्त्वपूर्ण शब्दावली


1●संसाधन प्रकृति से प्राप्त विभिन्न वस्तुएँ जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जाती है और जिनको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है। संसाधन कहलाती हैं।




2.जैव संसाधन-वे संसाधन जो जैवमंडल से प्राप्त होते हैं और जिनमें जीवन व्याप्त है जैसे मनुष्य, वनस्पति जगत, प्राणि जगत, मत्स्य जीवन,आदि जैव संसाधन कहलाते हैं।





3.अजैव संसाधन संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बनते हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं जैसे-चट्टाने, धातुएँ आदि।


4• नवीकरणीय संसाधन – जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत किया जा सकता है या पुनः उपयोगी बनाया जा स है. उन्हें नवीकरणीय संसाधन कहते हैं, जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन व वन्य जीवन 




5.अनवीकरणीय संसाधन जो एक बार प्रयोग करने पर समाप्त हो जाते हैं. अनवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं। इन संसाधनों का विकास एवं लंबे भू-वैज्ञानिक अन्तराल में होता है। खनिज और जीवाश्म ईंधन इस प्रकार के संसाधनों के उदाहरण है। इनके बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।



6 • राष्ट्रीय संसाधन-तणनीकी तौर पर देश में पाए जाने वाले सभी संसाधन राष्ट्रीय है। देश की सरकार व्यक्तिगत संसाधनों को भी आम जनता के हित में अधिगृहीत कर सकती है। खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन, वन्य जीवन, समस्त भू क्षेत्र, महासागरीय क्षेत्र व इसमें पाए आने वाले संसाधन राष्ट्र की संपता है।


7• सुमाली साधन – ये वे संसाधन हैं जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते हैं, किंतु इनका उपयोग नहीं किया गया है, जैसे- राजस्थान और गुजरात में पवन और तौर ऊर्जा के संभावी संसाधन विद्यमान है।


8●विकसित संसाधन-संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है, विकसित कहलाते हैं। 



9.भंडार– पर्यावरण में उपलब्ध ये पदार्थ जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में उसकी पहुँच से बाहर है.

भंडार कहलाते हैं। 



10● संसाधन संरक्षण संसाधनों का न्यायसंगत और योजनाबद्ध प्रयोग जिससे संसाधन व्यर्थ न आएँ, संसाधन संरक्षण कहलाता है।




बहुविकल्पीय प्रश्न 1 अंक


प्रश्न 1.भूमि एक संसाधन है।



(क) प्राकृतिक


(ख) मानव-निर्मित


(ग) सौर ऊर्जा से निर्मित


(घ) इनमें से कोई नहीं


उत्तर

(क) प्राकृतिक




प्रश्न 2.निम्नलिखित में से एक मिट्टी का प्रकार नहीं है -


(क) काली


(ख) पीली


(ग) लेटराइट


(घ) सीमेन्ट


उत्तर

(घ) सीमेन्ट




प्रश्न 3. रियो-डी-जेनेरो में पृथ्वी शिखर सम्मेलन का आयोजन किस वर्ष हुआ था?


 (क) वर्ष 1972 


(ख) वर्ष 1992 


(ग) वर्ष 1979 


(घ) वर्ष 1998



उत्तर-


(ख) वर्ष 1992


प्रश्न 4.निम्न में से कौन अजैवीय संसाधन है?


(क) चट्टानें 


(ख) पशु


(ग) पौधे


(घ) मछलियाँ


उत्तर


(क) चट्टानें


प्रश्न 5 .निम्नलिखित में से किस राज्य में काली मिट्टी पाई जाती है?



(क) झारखण्ड


 (ख) गुजरात


(ग) राजस्थान


(घ) बिहार 


उत्तर


(ख) गुजरात


प्रश्न 6 पर्वतों पर मृदा अपरदन का साधन है


(क) पवन


(ग) जल


(घ) पशुचारण


उत्तर-


(ख) हिमनद


प्रश्न 7.लाल-पीली मिट्टी पाई जाती है


(क) दक्कन के पठार में


(ख) मालवा प्रदेश में


(ग) ब्रह्मपुत्र घाटी में


(घ) थार रेगिस्तान में


उत्तर

(क) दक्कन के पठार में


प्रश्न 8.पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण क्या है?



(क) गहन खेती


(ग) अधिक सिंचाई


(ख) वनोन्मूलन


(घ) अति पशुचारण


उत्तर-


(ग) अधिक सिंचाई



प्रश्न 9.निम्नलिखित में से कौन-सा नवीकरण योग्य संसाधन नहीं है?



(क) पवन ऊर्जा


 (ख) जल


(ग) जीवाश्म ईंधन


(घ) वन


उत्तर-


(ग) जीवाश्म ईंधन



प्रश्न 10.कपास की खेती के लिए कौन-सी मृदा उपयुक्त है? 


(क) काली मृदा


(ख) लाल मृदा


(ग) जलोढ़ मृदा


(घ) लेटराइट मृदा



उत्तर

(क) काली मृदा




अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक


प्रश्न 1.भारत में सबसे अधिक कौन-सी मिट्टी पाई जाती है, इसका निर्माण किस प्रकार हुआ है?


उत्तर- भारत में सबसे अधिक जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, इसका निर्माण नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से हुआ है। यह बहुत अधिक उपजाऊ तथा गहन कृषि योग्य होती है।


प्रश्न 2.दक्षिण भारत के पठारी भागों के दक्षिणी और पूर्वी भागों में आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में कौन-सी मिट्टी पाई जाती है? इस मिट्टी की दो विशेषताएँ बताइए।


उत्तर- दक्षिण भारत के पठारी भागों के दक्षिणी और पूर्वी भागों में लाल एवं पीली मिट्टी पाई जाती है। इस मिट्टी में लोहा, ऐलुमिनियम और चूना पर्याप्त मात्रा में होता है। फॉस्फोरस और वनस्पति का अंश कम होता है।


प्रश्न 3.किन आधारों पर भारत की मृदाओं को बाँटा जा सकता है?


उत्तर- मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले तत्त्वों; उनके रंग, गहराई, गठन, आयु व रासायनिक और भौगोलिक गुणों के आधार पर भारत की मृदाओं को अनेक प्रकारों में बाँटा जा सकता है।




प्रश्न 4. भारत में कौन-कौन सी मृदाएँ पाई जाती हैं? 


उत्तर भारत में जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल व पीली मृदा, लेटराइट मृदा, मरुस्थली मृदा और वन मृदा पाई जाती हैं।


प्रश्न 5.चादर अपरदन किसे कहते हैं?


उत्तर कई बार जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे की ओर बहता है, ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र की ऊपरी मृदा घुलकर जल के साथ बह जाती है। उसे चादर अपरदन कहा जाता है।


प्रश्न 6.पवन अपरदन किसे कहते हैं?


उत्तर- पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया को पवन अपरदन कहा जाता है।



प्रश्न 7. वन मृदा की दो विशेषताएँ बताइए। 


उत्तर- वन मृदा की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं


(i) नदी घाटियों में ये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती हैं परंतु ऊपरी •ढालों पर इनका गठन मोटे कणों का होता है।


(ii) हिमालय के हिम क्षेत्रों में ये अधिसिलिक तथा ह्यूमस रहित होती हैं।


 प्रश्न 8. मरुस्थलीय मृदा की विशेषताएँ बताइए।


उत्तर- मरुस्थलीय मृदा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं


(i) मरुस्थलीय मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है।


(ii) ये मृदाएँ आमतौर पर रेतीली और लवणीय होती हैं।


(iii) मृदाओं में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है। 



प्रश्न 9. तीन राज्यों के नाम बताइए जहाँ काली मृदा पाई जाती है। इस पर मुख्य रूप से कौन-सी फसल उगाई जाती है?


उत्तर- काली मृदा का रंग काला होता है। इसे रेगर मृदा भी कहते है। यह लावाजनक शैलों से बनती है। यह मृदा महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार में पाई जाती है। काली मृदा कपास की खेती के लिए उचित समझी जाती है। इसे काली कपास मृदा के नाम से भी जाना जाता है।


प्रश्न 10. जैव और अजैव संसाधन क्या होते हैं? कुछ उदाहरण दीजिए।


उत्तर- जैव संसाधन-वे संसाधन जिनकी प्राप्ति जीवमंडल से होती है और जिनमें जीवन व्याप्त होता है; जैव संसाधन कहलाते हैं; जैसे—मनुष्य, वनस्पति जगत, प्राणी जगत्, पशुधन तथा मत्स्य जीवन आदि। अजैव संसाधन-वे सारे संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं; जैसे-चट्टानें और धातुएँ।




लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक




प्रश्न1. नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधनों में अंतर स्पष्ट कीजिए।


उत्तर नवीकरणीय संसाधन-वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत या पुनः उत्पन्न किया जा सकता है, उन्हें नवीकरण, योग्य अथवा पुनः पूर्ति योग्य संसाधन कहा जाता है। उदाहरणार्थ- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन व वन्य जीवन। इन संसाधनों को सतत अथवा प्रवाह संसाधनों में विभाजित किया गया है।


अनवीकरणीय संसाधन-इन संसाधनों का विकास एक लंबे भू-वैज्ञानिक अंतराल में होता है। खनिज और जीवाश्म ईंधन इस प्रकार के संसाधनों के उदाहरण हैं। इनके बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। इनमें से कुछ संसाधन जैसे धातुएँ पुनः चक्रीय हैं और पेट्रोल, डीजल जैसे कुछ संसाधन अचक्रीय हैं। वे एक बार के प्रयोग के साथ ही समाप्त हो जाते हैं।


प्रश्न 2. संभावी संसाधन तथा विकसित संसाधन में अंतर बताइए।


 उत्तर- संभावी संसाधन-वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते हैं। परन्तु इनका उपयोग नहीं किया गया है। उदाहरण के तौर पर भारत के पश्चिमी भाग, विशेषकर राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की अपार संभावनाएँ हैं। परंतु इनका सही ढंग से विकास नहीं हुआ है।


विकसित संसाधन-वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है, विकसित संसाधन कहलाते हैं। संसाधनों का विकास प्रौद्योगिकी और उनकी संभाव्यता के स्तर पर निर्भर करता है।


प्रश्न 3. लाल मृदा और लेटराइट मृदा में अंतर स्पष्ट कीजिए।


उत्तर लाल मृदा- इस मृदा में लोहे की मात्रा अधिक होने के कारण इसका रंग लाल होता है। यह मृदा तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और झारखंड में पाई जाती है। इसका विकास पठारों पर पाये जाने वाले शैलों से जलवाष्प परिवर्तनों के प्रभाव से होता है। यह मृदा उर्वर होती है और कृषि योग्य होती है।


लेटराइट मृदा – यह मृदा पहाड़ी या ऊँची समतल भूमि में पाई जाती है। इसकी ऊपर की तह प्रायः सख्त होती है। यह मृदा गर्म और अधिक वर्षा वाली जलवायु में पाई जाती है और इसका निर्माण निक्षालन क्रिया से होता है। इसमें बॉक्साइट और ऐलुमिनियम ऑक्साइड अधिक होता है। लेटराइट मृदा पर अधिक मात्रा में खाद और रासायनिक उर्वरक डालकर खेती की जा सकती है।


प्रश्न 4. मृदा अपरदन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।


या मृदा अपरदन क्या है?


उत्तर- भूमि की ऊपरी परत के हट जाने की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं। मृदा अपरदन का सबसे पहला कारण तेज बहने वाला जल तथा तेज बहने वाली पवनें हैं। ये दोनों मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत को अपने साथ बहाकर ले जाते हैं और भूमि को कृषि के लिए अनुपयोगी बना देते हैं। कुछ मानवीय कारक भी मृदा अपरदन को बढ़ावा देते हैं। वे अपने भवन निर्माण कार्यों से प्रेरित होकर रोड़ी, बजरी, संगमरमर, बदरपुर आदि प्राप्त करने की इच्छा से छोटी-बड़ी पहाड़ियों को गहरे खड्डों में परिवर्तित कर देते हैं। मृदा अपरदन के कारण मृदा के उपजाऊपन पर बड़ा विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।



प्रश्न 5. संसाधन नियोजन क्या है? संसाधन नियोजन की प्रक्रिया के सोपानों (चरणों) का उल्लेख कीजिए।


उत्तर संसाधन नियोजन का अर्थ-संसाधन नियोजन वह कला अथवा तकनीक है, जिसके द्वारा हम अपने संसाधनों का प्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से करते हैं। संसाधन नियोजन की प्रक्रिया-संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है।


जिसमें निम्नलिखित चरण हैं


(i) देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान और उसकी तालिका तैयार करना। इसके लिए क्षेत्रीय सर्वेक्षण के साथ मानचित्र बनाना तथा संसाधनों की गुणवत्ता एवं मात्रात्मक प्रवृत्तियों का अनुमान लगाना तथा मापन करना है।


 (ii) संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी,कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।


(iii) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।



प्रश्न 6. संसाधनों के दुरुपयोग से कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?


 उत्तर- संसाधनों के दुरुपयोग से उत्पन्न मुख्य समस्याएँ निम्नवत् हैं 


(i) इससे संसाधनों का ह्रास हुआ है।


(ii) ये समाज के कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए हैं, जिससे समाज दो हिस्सों— संसाधन संपन्न व संसाधनहीन अर्थात् अमीर व गरीब में बँट गया है।


(iii) संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट उत्पन्न मी हो गया है; जैसे— भूमंडलीय तापन, ओजोन परत अवक्षय, पर्यावरण की प्रदूषण और भूमि-निम्नीकरण आदि ।



प्रश्न.7 अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण के लिए क्या-क्या प्रयास किए गए हैं? 



उत्तर- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'संसाधन संरक्षण' के लिए निम्न प्रयास किए गए हैं


(i) 1968 ई. में 'क्लब ऑफ रोम' ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधन संरक्षण की वकालत की।


(ii) 1974 में शुमेसर ने अपनी पुस्तक 'स्माल इज ब्यूटीफुल में इस विषय पर गांधी जी के दर्शन की पुनरावृत्ति की।


(iii) 1987 में ब्रुन्डटलैंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया। इसने 'सतत् पोषणीय विकास' की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की। यह रिपोर्ट बाद में 'हमारा साझा भविष्य' शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई।


(iv) इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण योगदान रियो डी जेनेरो, ब्राजील में 1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन द्वारा किया गया।


प्रश्न 8. पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर किस प्रकार की मृदा पाई जाती है? इस प्रकार की मृदा की तीन मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? 


उत्तर पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर जलोढ़ मृदा पाई जाती है। इस जलोढ़ मृदा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—


(i) यह मृदा हिमालय के तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों - सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है।


(ii) जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं। जैसे-जैसे हम नदी के मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर जाते हैं, मृदा के कणों का आकार बढ़ता चला जाता है।


(iii) जलोढ़ मृदा बहुत उपजाऊ होती है। अधिकतर जलोढ़ मृदाएँ पोटाश, फॉस्फोरस और चूनायुक्त होती हैं जो इनको गन्ने, चावल, गेहूँ और अन्य अनाजों और दलहन फसलों की खेती के लिए उपयुक्त बनाती हैं। अधिक उपजाऊपन के कारण जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि की जाती है।



प्रश्न 8. भूमि के हास (निम्नीकरण) का क्या अर्थ है? भूमि हास के उत्तरदायी कारण क्या हैं?


या कोई दो मानवीय क्रियाएँ लिखिए जो भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी हैं। 


उत्तर- मिट्टी के कटाव अथवा भू-क्षरण का अर्थ


मिट्टी के कटाव का अर्थ है— भूमि की उर्वरा शक्ति का नष्ट होना। दूसरे शब्दों में, मिट्टी की ऊपरी परत के कोमल तथा उपजाऊ कणों को प्राकृतिक कारकों (जल, नदी, वर्षा तथा वायु) या प्रक्रमों द्वारा एक स्थान से हटाया जाना ही भूमि का ह्रास (कटाव) कहलाता है। यह कटाव अत्यधिक उपजाऊ भूमि को शीघ्र ही बंजर बना देता है। भारत में लगभग एक-चौथाई कृषि-भूमि, भूमि कटाव से प्रभावित है। असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि राज्य भूमि-कटाव की समस्या से अत्यधिक प्रभावित हैं।