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भारतीय संस्कृति लेखक डॉ राजेन्द्र प्रसाद//कक्षा 10 हिन्दी गद्य के अध्याय 4 भारतीय संस्कृति के सभी गद्यांशों के सभी प्रश्नों के उत्तर

 भारतीय संस्कृति लेखक डॉ राजेन्द्र प्रसाद

गद्यांशों के रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या एवं प्रश्नोत्तर

कक्षा 10 हिन्दी गद्य के अध्याय 4 भारतीय संस्कृति के सभी गद्यांशों के सभी प्रश्नों के उत्तर

यह केवल एक काव्य ,आज हम इसी निर्मल, शुद्ध, शीतल और स्वस्थ  ,यह एक नैतिक,हमारी सारी संस्कृति ,हमने भिन्न-भिन्न,वैज्ञानिक और औद्योगिक,दूसरी बात


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1.यह केवल एक काव्य की भावना नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है, जो हजारों वर्षों से अलग-अलग अस्तित्व रखते हुए अनेकानेक जल-प्रपातों और प्रवाहों का संगम स्थल बनकर एक प्रकाण्ड और प्रगाढ़ समुद्र के रूप में भारत में व्याप्त है, जिसे भारतीय संस्कृति का नाम दे सकते हैं। इन अलग-अलग नदियों के उद्गम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं और हो रहे हैं। इनकी धाराएँ भी अलग-अलग बही हैं और प्रदेश के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के अन्न और फल-फूल पैदा करती रही हैं, पर सब में एक ही शुद्ध, सुन्दर, स्वस्थ और शीतल जल बहता रहा है, जो उद्गम और संगम में एक ही हो जाता है।



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) लेखक ने किसे भारतीय संस्कृति का नाम दिया है?


(घ) भारतीयों के हृदयों में प्रवाहित भारतीयता की भावना की तुलना किससे की गई है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या –  लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति की समानता पुष्पों को माला से करना कवि की कल्पना न होकर यथार्थ है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है, जो हजारों वर्षों तथा युगों-युगों से अलग-अलग रूपों में देखा जा सकता है। जिस प्रकार विभिन्न नदियों और जल प्रपातों का प्रवाह क्षेत्र एवं उद्गम स्थलों की स्थिति भिन्न-भिन्न होती है, परन्तु उनका जल दूर-दूर से आकर समुद्र में समाकर एक रूप हो जाता है, उसी प्रकार भारत देश में भी विभिन्न विचारधाराओं, धर्मी, जातियों के लोग नदी व झरने की भाँति हजारों वर्षों से आकर मिले हैं, जिससे एक विस्तृत समुद्र के समान ही गहन भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है। कहने का आशय यह है कि जिस प्रकार नदी में बहने वाला जल शीतल एवं स्वच्छ होता है, उसी प्रकार देश में विद्यमान विचारधाराओं में अहिंसा व प्रेम दोनों निहित होते हैं। लेखक अपने विचार को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक नदी का उद्गम स्थल भिन्न-भिन्न होता है। उसका प्रवाह मार्ग भी एक-दूसरे के प्रवाह मार्ग से भिन्न होता है और प्रत्येक नदी के तट की भूमि में प्रदेश की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप भिन्न-भिन्न प्रकार की फसलों की पैदावार होती है, परन्तु इन सभी भिन्न-भिन्न नदियों का पानी, जो समुद्र में एक साथ मिलकर विभिन्नता में एकता का रूप धारण करता है, जिसके पश्चात् बादल के रूप में भी एक जैसा ही बरसता है। जिस प्रकार नदियों का जल अपने उद्गम और संगम (मिलन) पर एक रूप हो जाता है, उसी प्रकार विभिन्न स्थानों से आई संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति में एकाकार होकर सुखद अनुभव करती हैं अर्थात् बाहर से दिखने वाली विभिन्नताएँ वास्तव में, भिन्न न होकर एक-साम्य ही हैं।


 (ग) लेखक ने भारत की विभिन्नताओं के बीच जो एकता की भावना देखी हैं, जो सभी को एकता के सूत्र में पिरोए हुए है, उसे ही भारतीय संस्कृति का नाम दिया गया है।


(घ) भारतवासियों के हृदयों में प्रवाहित होने वाली भारतीयता की भावना की तुलना विभिन्न नदियों और झरनों में प्रवाहित होने वाले जल से की गई है,


जिस प्रकार इनके जल का संगम सागर का रूप ले लेता है उसी प्रकार भारतीयता की भावना उनकी एकता को प्रगाढ़ करती है।




2.आज हम इसी निर्मल, शुद्ध, शीतल और स्वस्थ अमृत की तलाश में हैं और हमारी इच्छा, अभिलाषा और प्रयत्न यह है कि वह इन सभी अलग-अलग बहती हुई नदियों में अभी भी उसी तरह बहता रहे और इनको वह अमर-तत्त्व देता रहे, जो जमाने के हजारों थपेड़ों को बरदाश्त करता हुआ भी आज हमारे अस्तित्व को कायम रखे हुए हैं और रखेगा।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) हमारे अस्तित्व को कौन कायम रखे हुए है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं कि भारतीय संस्कृति के विशाल सागर में आकर गिरने वाली जाति, धर्म, भाषा आदि नदियों में एकता का जल अमृत की भाँति वह रहा है, परन्तु आज यह जल राजनैतिक स्वार्थ, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता आदि के कारणवश मैला होता जा रहा है। हमें आज भी उस अमृत-तत्त्व की तलाश है, जो सदियों पूर्व प्रवाहित होता था, जिसने भारतीय संस्कृति को स्थिरता प्रदान की। लेखक कहता है कि हमारी यह इच्छा है कि सभी लोगों में प्रेम एवं राष्ट्रीयता की भावना का संचार हो, यह तभी सम्भव है, जब विभिन्न विचारधाराओं के रूप में इन नदियों में सदैव यह जल अमृत के समान प्रवाहित होता रहे। राष्ट्रीय भावना एवं प्रेम का विशाल रूप ही सनातन धर्म है। भारतीय संस्कृति में विभिन्नता में एकता एक ऐसा अमृत-तत्त्व है, जो आज भी विद्यमान है। उसी अमृत-तत्त्व के आधार पर ही भारतीय संस्कृति का भविष्य भी उज्ज्वल होगा तथा भारतीय संस्कृति का अस्तित्व सदैव विद्यमान रहेगा।


(ग) आज तक हमारे अस्तित्व को कायम रखने वाला अमृत-तत्त्व 'भारतीय संस्कृति की एकता है।




3.यह एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत है, जो अनन्तकाल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण देश में बहता रहा है और कभी-कभी मूर्त रूप होकर हमारे सामने आता रहा है। यह हमारा सौभाग्य रहा है कि हमने ऐसे ही मूर्त रूप को अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते भी देखा है और जिसने अमरत्व की याद दिलाकर हमारी सूखी हड्डियों में नई मज्जा डाल हमारे मृतप्राय शरीर में नए प्राण फूँके और मुरझाए हुए दिलों को फिर खिला दिया। वह अमरत्व सत्य और अहिंसा का है, जो केवल इसी देश के लिए नहीं, आज मानवमात्र के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हो गया है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) लेखक ने अमरत्व का स्रोत किसे बताया है?


(घ) गाँधीजी ने कौन-सा अमरत्व हमारी सूखी हड्डियों में डाला?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति में विद्यमान अमृत तत्त्व का स्रोत नैतिक और आध्यात्मिक है, जो अनन्तकाल से ही प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समस्त देश में प्रवाहित होता चला आ रहा है। यह कभी-कभी प्रत्यक्ष रूप में किसी-न-किसी महान् पुरुष के रूप में भी जन्म लेता रहा है, यह हम भारतीयों का सौभाग्य है कि हमने अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते हुए महात्मा गाँधी के रूप को प्रत्यक्ष रूप में देखा है। महात्मा गाँधी ने इस संस्कृति को अमरता प्रदान की है। इनके माध्यम से ही भारत को उसकी अमरता का पाठ पुनः पढ़ाया गया है। इन्हीं के मूर्त रूप ने परतन्त्रता के परिणामस्वरूप निराशा से मुरझाए हुए मन में आशारूपी ऊर्जा का संचार किया है। हमारी सूख चुकी हड्डियों को अमृत-तत्त्व की स्मृति दिलाकर उसमें नई मज्जा प्रदान की है। सत्य और अहिंसा के तत्त्वों ने भारत को नव-जीवन और ताजगी प्रदान की है।


(ग) लेखक ने अमरत्व का स्रोत भारतीय संस्कृति को बताया है।


 (घ) गाँधीजी ने सत्य और अहिंसा रूपी अमरत्व हमारी सूखी हड्डियों में डाला।




4.हमारी सारी संस्कृति का मूलाधार इसी अहिंसा-तत्त्व पर स्थापित रहा है। जहाँ-जहाँ हमारे नैतिक सिद्धान्तों का वर्णन आया है, अहिंसा को ही उनमें मुख्य स्थान दिया गया है। अहिंसा का दूसरा नाम या दूसरा रूप त्याग है और हिंसा का दूसरा रूप या दूसरा नाम स्वार्थ है, जो प्रायः भोग के रूप में हमारे सामने आता है। पर हमारी सभ्यता ने तो भोग भी त्याग ही से निकाला है और भोग भी त्याग में ही पाया है। श्रुति कहती है-'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः'। इसी के द्वारा हम व्यक्ति और व्यक्ति के बीच का विरोध, व्यक्ति और समाज के बीच का विरोध, समाज और समाज के बीच का विरोध, देश और देश के बीच के विरोध को मिटाना चाहते हैं। हमारी सारी नैतिक चेतना इसी तत्त्व से ओत-प्रोत है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए। 


(ग) हमारी सभ्यता की विशेषता क्या रही है?


(घ) हम किसके द्वारा व्यक्ति, समाज और देशों के बीच विरोध की भावना मिटाना चाहते हैं?


 (ङ) स्वार्थ के क्या-क्या दुष्परिणाम होते हैं?



उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।


(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या


लेखक कहता है कि अहिंसा तत्त्व हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का मूल तत्त्व है। जहाँ कहीं भी हमारे ग्रन्थों में नैतिक सिद्धान्तों की चर्चा की गई है, वहाँ मन, वचन और कर्म से अहिंसा का उल्लेख अवश्य किया गया है। लेखक के अनुसार, अहिंसा त्याग है। त्याग करना ही अहिंसा है और दूसरे अर्थ में अहिंसा ही त्याग है। अहिंसा और त्याग एक-दूसरे के पूरक हैं। ठीक इसी प्रकार हिंसा का अन्य नाम व रूप स्वार्थ है। हिंसा ही स्वार्थ है और स्वार्थ का पर्याय हिंसा है। जब मनुष्य स्वार्थ के कारण किसी अन्य को हानि पहुंचाता है, तब हिंसा का जन्म होता है।


• उपनिषद् में भी कहा गया है-'संसार का भोग त्याग की भावना से करो।' एक समाज का दूसरे समाज से तथा एक देश का दूसरे देश से संघर्ष होने के पीछे का कारण भी भोग ही है। यदि हम त्याग की भावना रखते हैं, तो इस संघर्ष को समाप्त कर सकते हैं। आशय यह है कि यदि हमें समाज से सभी विरोध और संघर्षो का समापन करना है, तो हमें अपनी भावनाओं में नैतिक चेतना को इसी तत्त्व से सम्पन्न करना होगा।


 (ग) हमारी सभ्यता की विशेषता है 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः' अर्थात् भोग त्याग से ही निकलता है और भोग त्याग में ही पाया जाता है।


(घ) हम त्याग और अहिंसा की भावना के द्वारा व्यक्ति, समाज और समस्त देशों में व्याप्त विरोध की भावना को मिटाना चाहते हैं। 


(ङ) जब मनुष्य स्वार्थ के कारण किसी अन्य को हानि पहुँचाता है तो हिंसा का जन्म होता है। इस प्रकार स्वार्थ का दुष्परिणाम हिंसा के रूप में सामने आता है।


5.हमने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं को स्वच्छन्दतापूर्वक अपने-अपने रास्ते बहने दिया। भिन्न-भिन्न धर्मों और सम्प्रदायों को स्वतन्त्रतापूर्वक पनपने और भिन्न-भिन्न भाषाओं को विकसित और प्रस्फुटित होने दिया। भिन्न-भिन्न देशों की संस्कृतियों को अपने में मिलाया और अपने को उनमें मिलने दिया और देश तथा विदेश में एकसूत्रता तलवार के ज़ोर से नहीं, बल्कि प्रेम और सौहार्द से स्थापित की। दूसरों के हाथों और पैरों पर, घर और सम्पत्ति पर ज़बरदस्ती कब्जा नहीं किया, उनके हृदयों को जीता और इसी वजह से प्रभुत्व जो चरित्र और चेतना का प्रभुत्व है, आज भी बहुत अंशों में कायम है, अब हम स्वयं उस चेतना को बहुत अंशों में भूल गए हैं और भूलते जा रहे है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) भारतीय लोगों ने विभिन्न देशों के व्यक्तियों और संस्कृतियों के साथ क्या किया?


(घ) हमारा चरित्र और प्रभुत्व आज भी क्यों कायम है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता के बारे में लेखक बताता है कि हम भारतीयों ने अन्य देशों के लोगों को सहजता से स्वीकार किया और अपने में इस प्रकार घुल-मिल जाने दिया मानो वे हमारे ही अभिन्न अंग रहे हो। जितनी भी विदेशी संस्कृतियाँ यहाँ आई, वे भारतीय संस्कृति का अंग बन गई और वे इस प्रकार घुल-मिल गई कि उन्हें अलग करना कठिन हो गया। हम भारतीयों ने अपनी शक्ति के बल पर विदेशों में अपनी विचारधारा थोपने का प्रयास नहीं किया। हमने प्रेम-सद्भाव और भाईचारे के बल पर ही अपनी विचारधारा को स्थापित किया। भारतीय संस्कृति ने एकता व समानता का यह कार्य बिना किसी बल प्रयोग के किया है। उन्होंने सदैव प्रेम और मित्रता की भावना से दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को एकाएक किया है।

हम भारतीयों ने कभी दूसरों के शारीरिक अंगों, धन-दौलत, घर, सम्पत्ति आदि पर बलपूर्वक कब्जा नहीं किया, बल्कि उनके दिलों को जीतने का प्रयास किया है। इसका प्रभाव भी स्पष्ट है कि भारतीयों का प्रभाव दूसरे देशों के लोगों पर बना हुआ है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम अपने उस गुण को भूलते जा रहे हैं जिसके कारण दूसरों पर हम अपना प्रभाव जमाए हुए थे।


(ग) भारतीयों ने दूसरे देश के लोगों और संस्कृतियों को अछूत नहीं माना, उन्होंने उन लोगों और उनकी संस्कृतियों को अपनी संस्कृति में मिल जाने दिया और उन्हें पूरी तरह अपना बना लिया।


(घ) हमारा (भारतीयों का) प्रभुत्व और चरित्र आज भी इसलिए कायम है, क्योंकि इसे तलवार की ताकत और मार-काट के सहारे दूसरों पर नहीं थोपा गया है, बल्कि प्रेम और सौहार्द के बल पर उनके दिलों को जीतकर कायम किया गया है।


6.वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के उद्दण्ड परिणामों से अपने आपको सुरक्षित रखकर हम उनका उपयोग अपनी रीति से किस प्रकार करें- इस बारे में दो बातों का हमें बराबर ध्यान रखना है। पहली बात तो यह है कि हर प्रकार की प्रकृतिजन्य और मानवकृत विपदाओं के पड़ने पर भी हम लोगों की सृजनात्मक शक्ति कम नहीं हुई। हमारे देश में साम्राज्य बने और मिटे, विभिन्न सम्प्रदायों का उत्थान-पतन हुआ, हम विदेशियों से आक्रान्त और पद-दलित हुए. हम पर प्रकृति और मानवों ने अनेक बार मुसीबतों के पहाड़ ढा दिए, पर फिर भी हम बने रहे, हमारी संस्कृति बनी रही और हमारा जीवन एवं सृजनात्मक शक्ति बनी रही। हम अपने दुर्दिन में भी ऐसे मनीषियों और कर्मयोगियों की पैदा कर सके, जो संसार के इतिहास के किसी युग में अत्यन्त उच्च आसन के अधिकारी होते।



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (ग) लेखक ने उपरोक्त गद्यांश में भारतीयों की किस विशेषता का उल्लेख किया है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या –  लेखक कहता है कि भारतीयों पर भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रकृतिजन्य व मानवकृत विपत्तियाँ पड़ीं, परन्तु इनका सामना करते हुए भी यहाँ के लोगों की सृजनात्मक शक्ति में कोई कमी नहीं आई है। इस बात को इतिहास का साक्षी बनाते हुए लेखक ने कहा है कि भारतवर्ष में न जाने कितने ही साम्राज्यों का गठन हुआ और कितने ध्वस्त हुए, विभिन्न सम्प्रदाय, धर्म, जातियाँ विकसित हुई और उनका पतन भी हुआ तथा विदेशियों ने भारतीयों पर आक्रमण कर उन्हें अपमानित भी किया। प्रकृति की बात की जाए, चाहे मनुष्य जाति ने एक बार नहीं अनेक बार भारतीयों पर मुसीबतों के पहाड़ ढाए हैं, परन्तु हमारी संस्कृति इतनी महान् है कि उसने सम्पूर्ण संसार को स्वयं के अन्दर समाविष्ट कर लिया। यही कारण है कि हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारा जीवन और हमारी सृजनात्मक शक्ति आज तक विद्यमान है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि हमारी संस्कृति सभी संस्कृतियों में उच्च, श्रेष्ठ व महान् है।


(ग) गद्यांश में भारतीयों की विशेषता का उल्लेख किया गया है कि वे अनेक प्रकार के कष्ट सहकर भी नष्ट न हुए। उन्हें नष्ट करने के बहुत से प्रयास किए गए पर भारतवासी और भारतीय संस्कृति ज्यों के त्यो बने रहे।


7.दूसरी बात, जो इस सम्बन्ध में विचारणीय है, वह यह है कि संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश के प्राण हैं। इसी नैतिक चेतना के सूत्र से हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ उनमें सब तरह की विभिन्नताएँ हैं, वहाँ उन सब में यह एकता है। इसी बात को ठीक तरह से पहचान लेने से बापू ने जनसाधारण को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने और तत्पर रहने के लिए इसी नैतिक चेतना का सहारा लिया था। अहिंसा, सेवा और त्याग की बातों से जनसाधारण का हृदय इसीलिए आन्दोलित हो उठा, क्योंकि उन्हीं से तो वह शताब्दियों से प्रभावित और प्रेरित रहा।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। 


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) लेखक ने भारतीय संस्कृति की एकता और उसके बल का क्या महत्त्व बताया है? 


(घ) क्रान्ति के लिए बापू ने किसका सहारा लिया था?


(ङ) जनसाधारण किन बातों से आन्दोलित हो उठा?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।




(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी कहते हैं कि विश्व की प्रसिद्ध जातियाँ मिट गई, लेकिन हम भारतीयों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने आपको सुरक्षित रखते हुए अपने आध्यात्मिक एवं बौद्धिक गौरव को सुरक्षित बनाए रखा। हम भारतीयों की सामूहिक जागरूकता का नैतिक आधार पहाड़ों से भी मजबूत, समुद्रों से भी गहरा और आकाश से भी अधिक विस्तृत है। लेखक कहते हैं कि सामूहिक चेतना के विषय में दूसरी बात जो विचार करने योग्य है वह यह कि यही संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना हमारे भारत देश के प्राण है। इस देश के समस्त नगर और ग्राम, सभी प्रदेश और सम्प्रदाय, विभिन्न वर्ग और जातियाँ इसी नैतिक चेतना के सहारे आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही विभिन्न नगर और ग्राम प्रदेश और सम्प्रदाय तथा विभिन्न वर्ग एवं जातियों की एकता का आधार है। इस बात को गाँधीजी ने अच्छी तरह समझा था, इसलिए उन्होंने जनसाधारण को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने के लिए, इसी नैतिक चेतना को अपना सम्बल (सहारा) बनाया था।


(ग) लेखक ने भारतीय संस्कृति की एकता और उसके बल का महत्त्व बताते हुए कहा है कि इसी एकता के बल को हथियार बनाकर गाँधी जी क्रान्ति लाने में सफल हुए, जिससे भारतीयों को गुलामी से मुक्ति मिल सकी। था।


(घ) क्रान्ति के लिए गांधीजी ने नैतिकता की सामूहिक शक्ति का सहारा लिया 


(ङ) भारतीय जनसाधारण गाँधीजी के हथियार सत्य, अहिंसा, उनकी सेवा और त्यागमयी भावना के कारण आन्दोलित हो उठा।


8 .आज विज्ञान मनुष्यों के हाथों में अद्भुत और अतुल शक्ति दे रहा है, उसका उपयोग एक व्यक्ति और समूह के उत्कर्ष और दूसरे व्यक्ति और समूह के गिराने में होता ही रहेगा इसलिए हमें उस भावना को जाग्रत रखना है और उसे जाग्रत रखने के लिए कुछ ऐसे साधनों को भी हाथ में रखना होगा, जो उस अहिंसात्मक त्याग-भावना को प्रोत्साहित करें और भोग-भावना को दबाए रखें। नैतिक अंकुश के बिना शक्ति मानव के लिए हितकर नहीं होती। वह नैतिक अंकुश यह चेतना या भावना ही दे सकती है। वही उस शक्ति को परिमित भी कर सकती है और उसके उपयोग को नियन्त्रित भी।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। 


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) उपरोक्त अवतरण में लेखक ने मानव को क्या सन्देश दिया है? 


(घ) आज विज्ञान मनुष्य को क्या दे रहा है?


(ङ) विज्ञान की शक्ति के सन्तुलित उपयोग के लिए किस भावना को जाग्रत रखना आवश्यक हैं?


अथवा 


विज्ञान के सम्बन्ध में लेखक के क्या विचार हैं? स्पष्ट कीजिए। अथना आज विज्ञान मनुष्य के हाथ में कैसी शक्ति दे रहा है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – प्रस्तुत गद्यांश में लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक युग विज्ञान का युग है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने मनुष्य को अद्भुत एवं अतुलनीय शक्ति प्रदान की है, किन्तु विज्ञान से प्राप्त शक्तियों का प्रयोग मानव द्वारा उचित रूप से नहीं किया जा रहा है। जहाँ एक ओर मनुष्य विज्ञान द्वारा प्रदान की गई शक्ति का प्रयोग अपने तथा अपने समूह के विकास व उत्थान में करता है, वहीं दूसरी ओर दूसरे व्यक्ति एवं दूसरे समूह को गिराने के लिए करता है। मनुष्य की इस प्रवृत्ति को देखते हुए लेखक कहता है कि हमें कुछ ऐसे साधनों का निर्माण करना होगा, जिससे समाज एवं राष्ट्र में ऐसी भावना जाग्रत हो, जिससे विज्ञान की शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए अहिंसात्मक त्याग की भावना को प्रोत्साहित किया जा सके। लेखक कहता है कि यदि विज्ञान की शक्ति पर नैतिक मूल्यों का नियन्त्रण नहीं लगाया जाएगा, तो यह मानव के लिए हितकारी सिद्ध नहीं हो सकेगा। नैतिक अंकुश (बन्धन) के माध्यम से ही विज्ञान की असीमित शक्ति सीमित हो सकती है और उसका उपयोग विनाश के स्थान पर निर्माण के लिए किया जा सकता है। आशय यह है कि वर्तमान युग में विज्ञान की शक्ति को कल्याणकारी दिशा की ओर अग्रसर करना अत्यन्त आवश्यक व महत्त्वपूर्ण है।


(ग) उपरोक्त गद्यांश में लेखक ने यह सन्देश दिया है कि नैतिक अंकुश द्वारा उत्पन्न त्याग और अहिंसा की भावना से ही विज्ञान का दुरुपयोग रोका जा सकता है तथा उसकी शक्ति का सदुपयोग ही करना चाहिए।


(घ) आज विज्ञान मनुष्य को अद्भुत तथा अतुलनीय शक्ति दे रहा है, जिसका कुछ लोग सकारात्मक उपयोग कर रहे हैं और वहीं कुछ लोग नकारात्मक प्रयोग कर रहे हैं। 


(ङ) विज्ञान की शक्ति के सन्तुलित उपयोग के लिए हमें त्याग और अहिंसाकी भावना को जाग्रत रखना आवश्यक है।





9. दूसरी बात यह है, ऐसी संस्था की स्थापना की जाए जो इन सब भाषाओं में आदान-प्रदान का सिलसिला अनुवाद द्वारा आरम्भ करे। यदि सब भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सांस्कृतिक संगम स्थापित हो जाता है तो इस बारे में बड़ी सहूलियत होगी। साथ ही वह संगम साहित्यिकों को प्रोत्साहन भी प्रदान कर सकेगा और अच्छे साहित्य के स्तर के निर्धारण और सृजन करने में भी पर्याप्त अच्छा कार्य कर सकेगा। साहित्य संस्कृति का एक व्यक्त रूप है उसके दूसरे रूप गान, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, मूर्तिकला इत्यादि में देखे जाते हैं। भारत अपनी एकसूत्रता इन सब कलाओं द्वारा प्रदर्शित कर रहा है।



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। 


(ग) भारत अपनी एकसूत्रता किन-किन कलाओं द्वारा प्रदर्शित कर रहा है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'भारतीय संस्कृति' से उद्धृत है। इसके लेखक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और से साहित्यकार, 'डॉ. राजेन्द्र प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार और अन्य संस्कृतियों के साथ तालमेल बनाने के लिए ऐसी संस्थाएँ बनाई जानी चाहिए, जो विभिन्न भाषाओं के साहित्य का अनुवाद दूसरी भाषाओं में भी करें। इससे किसी एक भाषा के साहित्य का प्रचार-प्रसार अन्य क्षेत्रों में भी हो सकेगा तथा उनके जीवन मूल्यों का लाभ दूसरे भी उठाएँगे। इसके अतिरिक्त इससे एक लाभ यह है कि साहित्यिक रुचि के लोगों को अच्छा साहित्य पढ़ने को मिलेगा, क्योंकि अच्छे साहित्य सृजन पर भी बल दिया जाएगा। इसके लिए साहित्यकार भी प्रेरित होंगे। इससे एक-दूसरे के विचार, परम्परा और रीति-रिवाज़ों को जानने-समझने का अवसर मिलेगा। साहित्य और साहित्य प्रेमियों के अतिरिक्त इससे भारतीय संस्कृति को भी लाभ मिलेगा।


(ग) भारत अपनी एकसूत्रता का प्रदर्शन गायन-वादन, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला और मूर्तिकला जैसी अनेक कलाओं के माध्यम से कर रहा है।


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