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अध्याय 01 मित्रता

लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी


'मित्रता पाठ के सभी गद्यांशों के रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या

 

सभी गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या


 मित्रता – रामचन्द्र शुक्लआचार्य जी


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1.हम लोग ऐसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरम्भ करते हैं, जबकि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने योग्य रहता है। हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती है। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं, जिसे जो जिस रूप का चाहे उस रूप का करे-चाहे राक्षस बनावे, चाहे देवता। ऐसे लोगों का साथ करना हमारे लिए बुरा है, जो हमसे अधिक दृढ़ संकल्प के हैं; क्योंकि हमें उनकी हर एक बात बिना विरोध के मान लेनी पड़ती है। पर ऐसे लोगों का साथ करना और बुरा है, जो हमारी ही बात को ऊपर रखते हैं; क्योंकि ऐसी दशा में न तो हमारे ऊपर कोई दबाव रहता है और न हमारे लिए कोई सहारा रहता है। 



प्रश्न(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। 


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) लेखक के अनुसार, हमें किन लोगों की संगति में नहीं रहना चाहिए?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी कहते हैं कि जब हम किशोरावस्था के पश्चात् युवावस्था में प्रवेश करने पर घर की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज में कार्य करना आरम्भ करते हैं, तब हमें संसार व समाज के लोगों के साथ रहने का अनुभव बिल्कुल नहीं होता, हमें दुनियादारी की बिल्कुल समझ नहीं होती। उस समय हमारा मन बहुत कोमल होता है, जो किसी प्रकार के अच्छे या बुरे संस्कार ग्रहण करने के योग्य होता है। हमारी बुद्धि इतनी विकसित नहीं होती कि उसे उचित-अनुचित का ज्ञान हो पाए। उस समय हमारी बुद्धि कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान होती है, जिस पर अच्छी या बुरी किसी बात का प्रभाव बहुत जल्दी पड़ता है। उस समय हम जैसे स्वभाव के लोगों के सम्पर्क में आते हैं उनके विचारों का हमारे मन पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। यदि किसी सुयोग्य व्यक्ति के सम्पर्क में हम आ जाते हैं, तो हम में देवताओं जैसे अच्छे गुण व संस्कार आ जाते हैं। यदि किसी दुश्चरित्र व दुष्ट व्यक्ति का साथ मिल जाता है, तो उसके सम्पर्क में रहकर हम भी दुर्गुण, बुरे संस्कार व घृणित कार्य करने वाले बनकर समाज में अपमानित होते हैं।


ऐसे समय में ही हमें एक सच्चे मित्र की आवश्यकता होती है, जो हमें सही मार्ग दिखाकर हमारे चरित्र व व्यक्तित्व को निखार दे। शुक्ल जी कहते हैं कि हम यदि ऐसे लोगों की संगति में रहने लग जाते हैं, जिनकी इच्छाशक्ति हमसे प्रबल होती है तथा वह अधिक दृढ़ निश्चय वाले होते हैं, तब हम उनके सामने कुछ भी बोल नहीं पाते और हमें उन्हीं के विचारों व आदर्शों पर चुपचाप चलना पड़ता है। उनकी अच्छी व बुरी सभी बातों को हमें बिना विरोध के मानना पड़ता है फलस्वरूप हम कमजोर पड़ते जाते हैं तथा हमारी सोचने-समझने की शक्ति व कार्यक्षमता घटती जाती है।


(ग) लेखक के अनुसार, हमें दो प्रकार के लोगों की संगति में नहीं रहना चाहिए, एक तो वे व्यक्ति जो हमसे अधिक दृढ़ संकल्पी हैं, क्योंकि हम उनकी प्रत्येक सलाह को बिना सोचे-समझे मान लेते हैं, इससे हमारा व्यक्तित्व दब जाता है। दूसरे, हमें उन लोगों के साथ भी नहीं रहना चाहिए, जो हमारी बात का विरोध किए बिना स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे लोग हमारे व्यावहारिक जीवन को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं कर सकते और अपने गुणों से हमें लाभान्वित भी नहीं कर सकते।





2.हँसमुख चेहरा, बातचीत का ढंग, थोड़ी चतुराई या साहस—ये ही दो-चार बातें किसी में देखकर लोग झटपट उसे अपना मित्र बना लेते हैं। हम लोग यह नहीं सोचते कि मैत्री का उद्देश्य क्या है? क्या जीवन के व्यवहार में उसका कुछ मूल्य भी है। यह बात हमें नहीं सूझती कि यह एक ऐसा साधन है, जिससे आत्मशिक्षा का कार्य बहुत सुगम हो जाता है। एक प्राचीन का वचन-विश्वासपात्र मित्र से बड़ी रक्षा रहती है, जिसे ऐसा मित्र मिल जाए उसे समझना चाहिए कि खज़ाना मिल गया।



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


 (ग) सामान्यतः लोग व्यक्ति में क्या देखकर मित्रता कर लेते हैं?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।




(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि मित्र बनाते समय हम इस बात पर विचार नहीं करते कि जिसे हम मित्र बना रहे हैं, उसकी संगति में रहकर क्या हम अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं या नहीं। क्या उस व्यक्ति में वे सभी गुण विद्यमान हैं, जिनकी हमारे जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यकता है।


यदि हमें जीवन में सच्चा मित्र मिल जाता है तो हमें एक ऐसा साधन मिल जाता है, जो आत्मशिक्षा प्राप्त करने में हमारा सहायक हो सकता है तथा हमें जीवन के उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करने में हमारी सहायता कर सकता है। एक प्राचीन विद्वान् का भी यही मत है कि एक सच्चा व अच्छा विश्वास के योग्य मित्र बहुत भाग्य से ही प्राप्त होता है। वह हर समय हमारी रक्षा करता है, हमारा मार्गदर्शन करता है, हमें हर बुराई से बचाता है। जिस व्यक्ति को ऐसा मित्र प्राप्त हो जाए, उसे यह समझना चाहिए कि मानो उसे संसार का कोई बड़ा खजाना मिल गया हो अर्थात् कोई बहुमूल्य निधि प्राप्त हो गई हो।


(ग) सामान्य रूप से व्यक्ति किसी का हँसमुख-सा चेहरा, उसका बातचीत करने का आकर्षक ढंग, उसकी चतुराई और उसका साहस देखकर सोचते हैं कि यही व्यक्ति मित्र बनाने के योग्य है और वे उसे ही अपना मित्र बना लेते हैं।




3.विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषध है। हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे उत्तम संकल्पों में हमें दृढ़ करेंगे, दोषों और त्रुटियों से हमें बचाएँगे, हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम को पुष्ट करेंगे, जब हम कुमार्ग पर पैर रखेंगे, तब वे हमें सचेत करेंगे, जब हम हतोत्साहित होंगे, तब हमें उत्साहित करेंगे। सारांश यह है कि वे हमें उत्तमतापूर्वक जीवन निर्वाह करने में हर तरह से सहायता देंगे। सच्ची मित्रता में उत्तम-से-उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है, अच्छी-से-अच्छी माता की-सी धैर्य और कोमलता होती है। ऐसी ही मित्रता करने का प्रयत्न प्रत्येक पुरुष को करना चाहिए।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।


(ग) (i) व्यक्ति को अपने मित्र से क्या उम्मीद करनी चाहिए? अथवा हमें अपने मित्रों से कौन-सी आशा रखनी चाहिए?


 (ii) एक सच्चा मित्र किसे कहा गया है?


(घ) लेखक ने सच्ची मित्र की तुलना किससे की है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या


आचार्य शुक्ल जी कहते हैं कि विश्वासपात्र मित्र दवा के समान होता है। जिस प्रकार अच्छी दवा लेने से व्यक्ति का रोग दूर हो जाता है, उसी प्रकार विश्वासपात्र मित्र हमारे जीवन में आकर हमारे बुरे संस्कार व दुर्गुणरूपी रोगों से हमें मुक्ति दिलवाता है। हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे हमें दोषों, अवगुणों व बुराइयों से बचाएँ और हमारे विचारों व संकल्पों को मजबूत बनाने में हमारी सहायता करें। हमारे हृदय में अच्छे विचारों को उत्पन्न करें तथा हमें हर प्रकार की बुराइयों से बचाते रहें। हमारे मन में सत्य, मर्यादा व पवित्रता के प्रति प्रेम विकसित करें। यदि हम किसी कारणवश या लोभवश किसी गलत मार्ग पर चल पड़े हैं, तब वे हमारा मार्गदर्शन करके हमें गलत मार्ग पर चलने से बचाएँ। यदि हम निराश व हताश हो जाएँ तो वह हमें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करें। तात्पर्य यह है कि वे हमें हर प्रकार से उत्तम जीवन जीने के लिए प्रेरित करें।


लेखक सच्चे मित्र के गुण बताते हुआ कहता है कि सच्चा मित्र एक कुशल वैद्य के समान होता है। जिस प्रकार एक उत्तम वैद्य रोगी की नब्ज़ देखकर ही उसके रोग का पता लगा लेता है, उसी प्रकार एक सच्चा मित्र भी मित्र के हाव-भाव व उसके लक्षणों को देखकर उसके गुण-दोषों की परख कर लेता है तथा उसका सही मार्गदर्शन करके उसको भटकने से बचा लेता है। जिस प्रकार एक अच्छी माता पुत्र के सभी कष्टों को धैर्य से स्वयं सहन करके अपने पुत्र को सभी मुसीबतों से बचाती है तथा कोमलता से उसे समझा-बुझाकर सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, ठीक उसी प्रकार के मित्र की खोज मनुष्य को करनी चाहिए, जिसमें एक अच्छे वैद्य की परख तथा अच्छी माँ जैसा धैर्य व कोमलता हो। तभी मानव का जीवन दिनों-दिन उन्नति को प्राप्त करेगा।


(ग) (i) व्यक्ति को अपने मित्रों से यह उम्मीद करनी चाहिए कि वे उसे संकल्पवान बनाएँगे, अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करेंगे, मन में अच्छे विचार उत्पन्न करेंगे, बुराइयों और गलतियों से बचाकर मानवीय गुण प्रगाढ़ करने तथा अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेंगे। वे हमें उत्साहित भी करेंगे।


(ii) एक सच्चा मित्र उसे कहा गया है, जो उत्तम वैद्य के समान हमारे दुर्गुणों को पहचान कर हमें उनसे मुक्ति दिलाए। उसमें अच्छी माता जैसा धैर्य हो तथा जो किसी भी स्थिति में कोमलता न छोड़े।


(घ) 'मित्रता' पाठ के आधार पर विश्वासपात्र मित्र की तुलना औषधि अर्थात् दवा से की गई है। जिस प्रकार अच्छी औषधि रोगी का रोग दूर करती है, ठीक उसी प्रकार विश्वासपात्र मित्र हमारे बुरे संस्कारों व दुर्गुणरूपी रोगों से हमें मुक्ति दिलाता है।





3.सुन्दर प्रतिमा, मनभावनी चाल और स्वच्छन्द प्रकृति ये ही दो-चार बातें देखकर मित्रता की जाती है, पर जीवन-संग्राम में साथ देने वाले मित्रों में इनसे कुछ अधिक बातें होनी चाहिए। मित्र केवल उसे नहीं कहते, जिसके गुणों की तो हम प्रशंसा करें, पर जिससे हम स्नेह न कर सकें, जिससे अपने छोटे-मोटे काम तो हम निकालते जाएँ, पर भीतर-ही-भीतर घृणा करते रहें? मित्र सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें, भाई के समान होना चाहिए, जिसे हम अपना प्रीति-पात्र बना सकें; हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए—ऐसी सहानुभूति, जिससे एक के हानि-लाभ को दूसरा अपना हानि-लाभ समझे। मित्रता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दो मित्र एक ही प्रकार के कार्य करते हों या एक ही रुचि के हों। इसी प्रकार प्रकृति और आचरण की समानता भी आवश्यक या वांछनीय नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में बराबर प्रीति और मित्रता रही है। 


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


 (ग) लेखक ने अच्छे मित्र की क्या विशेषताएँ बताई हैं? 


(घ) हमारे और हमारे मित्र के बीच कैसी सहानुभूति होनी चाहिए?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या शुक्ल जी के अनुसार, सच्चा मित्र वह नहीं हो सकता, जिसके गुणों व कार्यों की हम प्रशंसा तो करते हैं, लेकिन अपने मन से उसे प्रेम नहीं करते। सच्चे मित्र को हृदय प्रेम करना आवश्यक हो जाता है। यदि कोई ऐसा व्यक्ति है, जिससे हम अपने छोटे-मोटे काम तो निकलवाते रहते हैं, किन्तु हृदय में कहीं उसके लिए घृणा का भाव समाया हो, तो उसे हम अपना मित्र नहीं कह सकते उसे तो हमने केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मित्र बनाया था। वह हमारा सच्चा शुभ चिन्तक नहीं हो सकता। शुक्ल जी कहते हैं कि मित्र के प्रति हमारे हृदय में सच्चा व निष्कपट प्रेम होना चाहिए तथा मित्र भी हमारा सच्चा मार्गदर्शक होना चाहिए, जिस पर हम पूर्ण रूप से विश्वास कर सकें। दोनों मित्रों में परस्पर सहानुभूति हो तथा भाई के समान निःस्वार्थ प्रेम हो। एक-दूसरे की बात को सहन करने की शक्ति हो। मित्रता में दोनों मित्रों में ऐसे गुण होने चाहिए कि वे एक-दूसरे के लाभ-हानि को अपना ही लाभ-हानि समझें और एक-दूसरे के सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख मानकर उसकी सहायता को सदैव तत्पर रहें। आचार्य शुक्ल जी कहते हैं कि सच्ची मित्रता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दो मित्र एक-सा कार्य करते हों, समान हैं रुचि के हों। इसी प्रकार समान प्रकृति और समान आचरण भी सच्ची मित्रता के लिए आवश्यक नहीं है। भिन्न-भिन्न प्रकृति व आचरण वाले व्यक्ति भी आपस में मित्र हो सकते हैं।


(ग) लेखक ने अच्छे मित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई हैं


 (i) अच्छा मित्र ऐसा होना चाहिए, जो व्यक्ति को सच्चे पथ-प्रदर्शक की भाँति सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे।


(ii) अच्छा मित्र वह होता है, जिससे हम प्रेम करते हैं। 


(iii) अच्छा मित्र वैद्य के समान हितकारी होता है, जो हमारे दुर्गुणों को पहचानकर हमें उनसे मुक्ति दिलाता है। 


(iv) अच्छे मित्र में अपने मित्र के प्रति सच्ची सहानुभूति होती है।


(v) अच्छा मित्र विश्वसनीय होता है।



(घ) हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए। यह सहानुभूति ऐसी होनी चाहिए कि दोनों मित्र एक-दूसरे के लाभ-हानि को अपना ही लाभ-हानि समझें और एक-दूसरे के सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख मानकर उसकी सहायता करने के लिए हमेशा तैयार रहें।





5 .इसी प्रकार प्रकृति और आचरण की समानता भी आवश्यक या वांछनीय नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में बराबर प्रीति और मित्रता रही है। राम धीर और शान्त प्रकृति के थे, लक्ष्मण उग्र और उद्धत स्वभाव के थे, पर दोनों भाइयों में अत्यन्त प्रगाढ़ स्नेह था। उदार तथा उच्चाशय कर्ण और लोभी दुर्योधन के स्वभावों में कुछ विशेष समानता न थी, पर उन दोनों की मित्रता खूब निभी। यह कोई बात नहीं कि एक ही स्वभाव और रुचि के लोगों में ही मित्रता हो सकती है। समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं, जो गुण हम में नहीं हैं, हम चाहते हैं कि कोई ऐसा मित्र मिले, जिसमें वे गुण हों। चिन्ताशील मनुष्य प्रफुल्लित चित्त का साथ ढूँढता है, निर्बल बली का, धीर उत्साही का। उच्च आकांक्षा वाला चन्द्रगुप्त युक्ति और उपाय के लिए चाणक्य का मुँह ताकता था। नीति-विशारद अकबर मन बहलाने के लिए बीरबल की ओर देखता था।





प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।


(ग) लेखक के अनुसार, समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर क्यों आकर्षित होते हैं?


अथवा


 क्या देखकर लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं? सोदाहरण समझाइए।


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या


शुक्ल जी का कहना है कि दो व्यक्तियों में मित्रता के लिए यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं होती है कि उनका स्वभाव भी एक-सा हो। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे एक-दूसरे से कितनी सहानुभूति रखते हैं। यदि वे परस्पर सहानुभूति रखते हैं, तो विपरीत स्वभाव वालों में मित्रता कायम रहती है। यह मित्रता लम्बे समय तक चलती भी है और सच्ची सिद्ध भी होती है। श्रीराम-लक्ष्मण व कर्ण-दुर्योधन की मित्रता सच्ची मित्रता के साक्षात् उदाहरण हैं। श्रीराम कितने धीर-गम्भीर स्वभाव के थे और। लक्ष्मण कितने चंचल, उग्र व उद्धत स्वभाव के थे, लेकिन स्वभाव की भिन्नता होने पर भी उनमें घनिष्ठ स्नेह था। इसी प्रकार से कर्ण वीर, साहसी होने के साथ-साथ उच्च विचारों वाले, गम्भीर व दानी स्वभाव के थे, जबकि दुर्योधन स्वार्थी व लोभी था, फिर भी उन दोनों की मित्रता जीवन के अन्तिम क्षणों तक भी अटूट रही।


लेखक कहता है कि यह ज़रूरी नहीं है कि दो व्यक्तियों में मित्रता होने के लिए उनके स्वभाव और रुचियाँ एक-सी ही हों। मित्रता तो विपरीत स्वभाव और रुचियों वाले व्यक्तियों में भी हो सकती है। किसी व्यक्ति में जो गुण नहीं होता है, उसी गुण को दूसरे व्यक्ति में देखकर उससे आकर्षित होकर वह दोस्ती कर लेता है। इससे उस व्यक्ति के गुण की कमी की पूर्ति मित्रता के माध्यम से हो जाती है। व्यक्ति को ऐसे ही परस्पर विपरीत गुणों वाले व्यक्ति की तलाश रहती है। चिन्ताग्रस्त लोग प्रसन्नचित्त व्यक्ति से, कमज़ोर व्यक्ति बलवान से, धैर्यवान व्यक्ति उत्साही व्यक्ति से मित्रता इसलिए करना चाहता है, ताकि उसकी अपनी कमियाँ पूरी हो जाएँ।


(ग) लेखक के अनुसार, समाज में लोग विभिन्नता देखकर एक-दूसरे की ओर इसलिए आकर्षित होते हैं ताकि उनसे वे उन गुणों का लाभ उठा सकें, जिन गुणों की कमी वे अपने अन्दर महसूस करते हैं; जैसे-निर्बल व्यक्ति बलवान से, धैर्यवान व्यक्ति उत्साही व्यक्ति से मित्रता करना चाहता है।


अथवा


लोग विपरीत गुणों को देखकर एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं अर्थात् जो गुण वे अपने अन्दर नहीं पाते हैं, उसकी पूर्ति के लिए वे ऐसे व्यक्ति से दोस्ती करते हैं, जिसमें वे गुण हों। उदाहरणार्थ- चन्द्रगुप्त के पास उच्च आकांक्षा थी, पर उसे पूरा करने के लिए आवश्यक विपरीत गुण वाले अर्थात् युक्ति और उपाय सम्पन्न चाणक्य से उसने मित्रता की।


6.मित्र का कर्त्तव्य इस प्रकार बताया गया है—उच्च और महान् कार्य में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि तुम अपनी निज की सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ। यह कर्त्तव्य उसी से पूरा होगा, जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। इससे हमें ऐसे ही मित्रों की खोज में रहना चाहिए, जिनमें हम से अधिक आत्मबल हो। हमें उनका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए, जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था। मित्र हों तो प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के हों, मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सकें और यह विश्वास कर सकें कि उनसे किसी प्रकार का धोखा नहीं होगा।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) मित्र का कर्त्तव्य स्पष्ट कीजिए। अथवा अच्छे मित्र का क्या कर्त्तव्य होना चाहिए? अथवा मित्र का कर्त्तव्य कैसा होना चाहिए?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि सहायता करना, उत्साहित करना व मनोबल बढ़ाने का कार्य वही व्यक्ति कर सकता है, स्वयं भी दृढ़ इच्छाशक्ति वाला, परिश्रमी तथा सत्य संकल्पों वाला हो। अतः मित्र बनाते समय हमें ऐसे ही व्यक्ति को ढूँढना चाहिए, जो हम भी अधिक साहसी, परिश्रमी, दृढ़ इच्छाशक्ति वाला व उच्च आत्मबल से वाला हो। यदि सौभाग्य से ऐसा मित्र मिल जाता है, तो फिर हमें उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए; जैसे-वानर-राज सुग्रीव ने श्रीराम की आत्मशक्ति, ओज व बल का विश्वास हो जाने पर ही उनका आश्रय ग्रहण किया और फिर कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। श्रीराम की शक्ति के बल पर ही वह अपनी पत्नी व अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर सके। श्रीराम जैसा मित्र पाकर तो सुग्रीव धन्य हो गया था।

मित्र का चयन करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मित्र ऐसा जिसकी समाज में प्रतिष्ठा व सम्मान हो, जो निश्छल व निष्कपट हृदय का हो, स्वभाव से मृदुल हो, परिश्रमी हो, सभ्य आचरण वाला हो, सत्यनिष्ठ हो अर्थात् सत्य का आचरण करने वाला हो। ऐसे व्यक्ति पर हम यह विश्वास कर सकते हैं कि हमें उससे किसी प्रकार का धोखा नहीं मिलेगा।


 (ग) सच्चे मित्र का कर्त्तव्य है कि वह अपने मित्र को निम्नलिखित गुणों से अवगत कराए शिष्ट आचरण करने की सीख दे।सत्यनिष्ठ बनने की प्रेरणा दे। • आलस्य छोड़ उद्यमी बनने में सहयोग दे।बुरे मार्ग से हटाकर अच्छे मार्ग पर ले जाए।


7.जिनकी आत्मा अपने इन्द्रिय-विषयों में ही लिप्त है: जिनका हृदय नीचाशयों और कुत्सित विचारों से कलुषित है, ऐसे नाशोन्मुख प्राणियों को दिन-प्रतिदिन अन्धकार में पतित होते देख कौन ऐसा होगा, जो तरस न खाएगा?-उसे ऐसे प्राणियों का साथ नहीं करना चाहिए।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) उपरोक्त गद्यांश का साहित्यिक सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए। 


अथवा 


कौन-से लोग फूल-पत्तियों में सौन्दर्य का, झरने में संगीत का, सागर-तरंगों में रहस्यों का आभास नहीं कर पाते हैं?


उत्तर


(क)सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि जो लोग केवल विषय-वासनाओं में फँसे हैं तथा इन्द्रिय-सुख को ही सर्वोपरि मानकर उसी की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, जिनका हृदय गन्दे व घृणित विचारों से सदैव युक्त रहता है, ऐसे लोग दिन-प्रतिदिन अपने बुरे विचारों व बुरे आचरण के कारण विनाश की ओर ही अग्रसर होते हैं तथा अवनति व अज्ञान के दल-दल में फँसकर नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें देखकर सभी को उन पर दया आती है। ऐसे विनाश व पतन की ओर जाने वाले लोगों के साथ कभी भी मित्रता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे अपने गन्दे विचारों से दूसरों को केवल मार्ग से भटका ही सकते हैं। ऐसे भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्ति का साथ नहीं करना चाहिए।


(ग) गद्यांश का साहित्यिक सौन्दर्य


• भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त, सुबोध व साहित्यिक हिन्दी है।वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।


शब्द चयन उपयुक्त तथा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है। प्रस्तुत गद्यांश में बुरे विचार रखने वाले पतनोन्मुख लोगों से मित्रता न करने का सन्देश निहित है।


.

अथवा


8.जो लोग इन्द्रियों के सुख की कामना करते हुए, उनकी पूर्ति के लिए सतत प्रयासरत रहते हैं, ऐसे लोग भोग-विलास की संलिप्तता के कारण फूल-पत्तियों की सुन्दरता का, झरने के मधुर संगीत का और सागर की लहरों में छिपे रहस्य का आनन्द नहीं उठा पाते हैं। वे प्रकृति के निकट रहकर भी उसके आकर्षण एवं सौन्दर्य से वंचित रह जाते हैं।


8) कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-प्रतिदिन अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


 (ग) (i) युवा पुरुष की संगति के बारे में क्या कहा गया है? 

(ii) अच्छी संगति के लाभों का वर्णन कीजिए। 


(iii) कुसंग का क्या प्रभाव होता है?


अथवा


 कुसंग का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर किस प्रकार पड़ता है?



(घ) गद्यांश का साहित्यिक सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।


(ङ) कुसंग और अच्छी संगति में क्या अन्तर है?




उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – आचार्य शुक्ल जी कहते हैं कि मानव जीवन पर संगति का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। बुरे और दुष्ट लोगों की संगति घातक बुखार की तरह हानिकारक होती है। जिस प्रकार भयानक ज्वर व्यक्ति की सम्पूर्ण शक्ति व स्वास्थ्य को नष्ट कर देता है तथा कभी-कभी रोगी के प्राण भी ले लेता है, उसी प्रकार बुरी संगति में पड़े हुए व्यक्ति की बुद्धि, विवेक, सदाचार, नैतिकता व सभी सद्गुण नष्ट हो जाते हैं तथा वह उचित-अनुचित व अच्छे-बुरे का विवेक भी खो देता है। मानव जीवन में युवावस्था सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था होती है। कुसंगति किसी भी युवा पुरुष की सारी उन्नति व प्रगति को उसी प्रकार बाधित करती है, जिस प्रकार किसी व्यक्ति के पैर में बंधा हुआ भारी पत्थर उसको आगे नहीं बढ़ने देता, बल्कि उसकी गति को अवरुद्ध करता है। उसी प्रकार कुसंगति भी हमारे विकास व उन्नति के मार्ग को अवरुद्ध करके अवनति व पतन की ओर धकेल देती है तथा दिन-प्रतिदिन विनाश की ओर अग्रसर करती है। दूसरी ओर, यदि युवा व्यक्ति की संगति अच्छी होगी तो वह उसको सहारा देने वाली बाहु (हाथ) के समान होगी, जो अवनति के गर्त में गिरने वाले व्यक्ति की भुजा पकड़कर उठा देती है तथा सहारा देकर खड़ा कर देती है और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर देती है।


(ग) 

(i) युवा पुरुष यदि बुरी संगति करता है, तो विकास की अपेक्षा उसका विनाश होना तय है। यदि वह अच्छी संगति करेगा, तो उन्नति के पथ पर आगे बढ़ता जाएगा।


(ii) अच्छी संगति के लाभ निम्नलिखित हैं


• व्यक्ति को पतन से बचाती है।


 • मानवीय गुणों का विकास करती है।व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा दिलाती है। जीवन की रक्षा करने वाली औषधि (दवा) के समान होती है। 


(iii) कुसंग/कुसंगति का व्यक्ति के जीवन पर निम्नलिखित प्रकार से प्रभाव पड़ता है 


• व्यक्ति पतन के गड्ढे में गिर जाता है।


. व्यक्ति का सदाचार नष्ट हो जाता है। वह दुराचार करने लगता है। व्यक्ति की बुद्धि व विवेक का नाश हो जाता है।



(घ) गद्यांश का साहित्यिक सौन्दर्य


• भाषा तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली है।


भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है।


 प्रस्तुत गद्यांश में व्याख्यात्मक गद्य शैली है।


• शब्द चयन भावानुकूल तथा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है। कुसंगति और अच्छी संगति में अन्तर स्पष्ट किया गया है।


(ङ) कुसंग/कुसंगति हमारे विकास व उन्नति के मार्ग को अवरुद्ध करके अवनति व पतन की ओर धकेल देती है तथा दिन-प्रतिदिन विनाश की ओर अग्रसर करती है, जबकि अच्छी संगति सहारा देने वाले हाथ के समान होती है जो अवनति के गर्त में गिरने वाले व्यक्ति की भुजा पकड़कर उठा देती है और सहारा देकर खड़ा कर देती है, साथ ही उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर देती है।




9.बहुत-से लोग तो इसे अपना बड़ा भारी दुर्भाग्य समझते, पर वह अच्छी तरह जानता था कि वहाँ वह बुरे लोगों की संगति में पड़ता, जो उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होती। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनके घड़ीभर के साथ से भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है; क्योंकि उतने ही बीच में ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं जो कानों में न पड़नी चाहिए, चित्त पर ऐसे प्रभाव पड़ते हैं, जिनसे उसकी पवित्रता का नाश होता है। बुराई अटल भाव धारण करके बैठती है। बुरी बातें हमारी धारणा में बहुत दिनों तक टिकती हैं। इस बात को प्रायः सभी लोग जानते हैं कि भद्दे व फूहड़ गीत जितनी जल्दी ध्यान पर चढ़ते हैं, उतनी जल्दी कोई गम्भीर या अच्छी बात नहीं।


प्रश्न



(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) 'बहुत से लोग इसे अपना दुर्भाग्य समझते।' यहाँ पर 'इसे' शब्द द्वारा किस प्रसंग की ओर संकेत किया गया है?


(घ) आध्यात्मिक उन्नति के लिए क्या आवश्यक है?

(ङ) बुराई की प्रकृति कैसी होती है?


(च) व्यक्ति पर बुरी बात का प्रभाव जल्दी होता है, इसे उदाहरण के द्वारा स्पष्ट कीजिए।


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – आचार्य शुक्ल जी कहते हैं कि मानव मन पर बुरी बातों का प्रभाव बहुत जल्दी पड़ता है। बुरी संगति सदैव व्यक्ति की उन्नति में बाधक होती है। समाज में अनेक ऐसे लोग होते हैं, जिनका कुछ देर का साथ भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है, क्योंकि अच्छी बातों की अपेक्षा बुरी बातों का प्रभाव बहुत जल्दी पड़ता है और अधिक देर तक रहता है। कुछ लोग थोड़ी ही देर में ऐसी-ऐसी घिनौनी बातें कह डालते हैं, जो सामान्य व्यक्ति के कहने या सुनने योग्य नहीं होतीं। उनकी बातें सामान्य व्यक्ति की बुद्धि को भी भ्रष्ट कर देती हैं और मन की पवित्रता को भी नष्ट कर देती हैं तथा हमारे मन में भी बुरे विचार पनपने लगते हैं। यह मानव मन का स्वभाव है कि बुरी बातों का प्रभाव, अच्छी बातों की अपेक्षा जल्दी होता है।


(ग) 'इसे' शब्द द्वारा उस प्रसंग की ओर संकेत किया गया है, जब इंग्लैण्ड के एक विद्वान् को युवावस्था में राजदरबारियों में स्थान प्राप्त नहीं हुआ तब उसने इस प्रकार का स्थान न मिलना अपना दुर्भाग्य नहीं माना, पर दूसरे लोग इसे दुर्भाग्य मानते थे।


(घ) आध्यात्मिक उन्नति के लिए मन में पवित्र विचारों का होना बहुत आवश्यक है। ये विचार चिरस्थायी होने चाहिए। (ङ) बुराई की प्रकृति बुरी होती है। वह हमारी धारणा में जल्दी बैठती है और लम्बे समय तक हमारा पीछा नहीं छोड़ती है।


(च) बुराई का प्रभाव व्यक्ति पर जल्दी होता है, इसका उदाहरण यह है कि भद्दे और फूहड़ (मूर्खतापूर्ण) गीत जितनी सरलता से हमारे मनोमस्तिष्क में जगह बना लेते हैं, उतनी सरलता से गम्भीर और अच्छी बाते हमारे मस्तिष्क में जगह नहीं बना पाती है।




10 . सावधान रहो, ऐसा न हो कि पहले-पहल तुम इसे एक बहुत सामान्य बात समझो और सोचो कि एक बार ऐसा हुआ, फिर ऐसा न होगा अथवा तुम्हारे चरित्र-बल का ऐसा प्रभाव पड़ेगा कि ऐसी बातें बढ़ने वाले आगे चलकर आप सुधर जाएँगे। नहीं, ऐसा नहीं होगा। जब एक बार मनुष्य अपना पैर कीचड़ में डाल देता है, तब फिर यह नहीं देखता है कि वह कहाँ और कैसी जगह पैर रखता है। धीरे-धीरे उन बुरी बातों में अभ्यस्त होते-होते तुम्हारी घृणा कम हो जाएगी। पीछे तुम्हें उनसे चिढ़ न मालूम होगी; क्योंकि तुम यह सोचने लगोगे कि चिढ़ने की बात ही क्या है! तुम्हारा विवेक कुण्ठित हो जाएगा और तुम्हें भले-बुरे की पहचान नहीं रह जाएगी। अन्त में होते-होते तुम भी बुराई के भक्त बन जाओगे। अतः हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि बुरी संगत की छूत से बचो।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) विवेक कुण्ठित हो जाने से मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है? अथवा बुरी बातों का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?


(घ) लेखक ने हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का क्या उपाय सुझाया है? 


अथवा 


हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय क्या है?


(ङ) लेखक ने उपरोक्त गद्यांश में क्या सन्देश दिया है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'मित्रता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या शुक्ल जी कहते हैं कि जब मनुष्य बुराई के मार्ग पर चलने लगता है, तो उसे बुरे कार्यों में भी कोई बुराई नज़र नहीं आती, क्योंकि मनुष्य एक बार बुराई के मार्ग पर कदम बढ़ा देता है, तो आगे बढ़ता ही जाता है, परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए धीरे-धीरे जब तुम उनकी बातों के आदी हो जाओगे और तुम्हें वह बातें गलत व बुरी नहीं लगेंगी। फिर तुम उससे चिढ़ना भी बन्द कर दोगे। ऐसा करने से तुम्हारी सोचने-समझने की शक्ति धीरे-धीरे कम होती जाएगी, बुद्धि मन्द हो जाएगी और तुम्हें अच्छे-बुरे व नैतिक-अनैतिक कार्यों की समझ न रहेगी। अन्त में धीरे-धीरे तुम भी बुराइयों के दास बन जाओगे।


अतः अपने आपको इन बुराइयों से बचाने का सबसे सरल उपाय यह है कि बुरी संगति का हर प्रकार से त्याग कर दो, तभी तुम्हारा जीवन उज्ज्वल और कलंकरहित हो पाएगा। अतः हमें अपने हृदय को सहज एवं निर्मल तथा निष्कलंक रखने के लिए बुरी संगत से दूर रहना चाहिए। 


(ग) विवेक कुण्ठित हो जाने से मनुष्य पर निम्न प्रभाव पड़ते हैं


● व्यक्ति का विवेक नष्ट होता जाता है और वह बुराइयों के जाल में फँसता चला जाता है।


धीरे-धीरे वह बुराइयों के प्रति आकर्षित होने लगता व्यक्ति को बुराइयों में ही अच्छाइयाँ दिखती हैं। वह बुराइयों को बुरा नहीं मानता। बुरी बातें व्यक्ति को अपने जाल में इस प्रकार फँसाती हैं कि व्यक्ति चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाता है। बुरी बातों का व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


(घ) लेखक हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय यह बताया है कि मनुष्य को सदैव बुरी संगत से दूर रहना चाहिए। बुरी संगत छूत का एक रोग है और इस रोग से सदैव बचने का प्रयास करना चाहिए।


(ङ) लेखक ने उपरोक्त गद्यांश में मनुष्य को कुसंगति से बचने का सन्देश दिया है। कुसंगति एक ऐसा रोग है, जो मनुष्य के जीवन को पूर्णतः नष्ट कर देता है, इसलिए हमें सदैव इस कुसंगति से बचना चाहिए।




subhansh

अध्याय 02 ममता

 

लेखक 'जयशंकर प्रसाद





Class 10th Hindi chapter 2 ममता यशंकर प्रसाद 


गद्यांशों के रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या एवं प्रश्नोत्तर


रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता,हे भगवान! तब के लिए! विपद के लिए,काशी के उत्तर में धर्मचक्र विहार मौर्य,"मैं ब्राह्मणी हूँ, अश्वारोही










  1. रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, सोन नदी के तीक्ष्ण गम्भीर प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा थी। उसका यौवन सोन नदी के समान ही उमड़ रहा था। मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिए, वह सुख के कंटक-शयन में विकल थी। वह रोहतास-दुर्गपति के मन्त्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असम्भव था, परन्तु वह विधवा थी-हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है-तब उसकी विडम्बना का कहाँ अन्त था?



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) उपरोक्त गद्यांश में हिन्दू-विधवा की स्थिति कैसी बताई गई है?


(घ) ममता कौन थी? वह क्या देख रही थी?


(ङ) ममता का संक्षिप्त परिचय दीजिए।


उत्तर


(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'ममता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयशंकर प्रसाद' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि रोहतास दुर्ग (राजप्रासाद) के मुख्य द्वार के पास अपने कक्ष में बैठी हुई ममता सोन नदी के तेज बहाव को देख रही है। लेखक ममता के यौवन और सोन नदी के प्रबल वेग से प्रवाहित होने की तुलना करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सोन नदी अपने तेज बहाव से उफनती हुई बह रही है, उसी प्रकार ममता का यौवन भी पूर्ण रूप से अपने उफान पर है। ममता रोहतास दुर्गपति के मन्त्री की इकलौती पुत्री है, जोकि बाल-विधवा है। रोहतास दुर्गपति के मन्त्री की पुत्री होने के कारण ममता सभी प्रकार के भौतिक सुख-साधनों से सम्पन्न है, परन्तु वह विधवा जीवन के कटु सत्य को अभिशाप रूप में झेलने के लिए विवश है। उसके मन मस्तिष्क में दुःख रूपी आँधी तथा आँखों से आँसू बह रहे हैं। उसका मन भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों और भावों की आँधी से भरा हुआ है। उसकी स्थिति काँटों की शय्या पर सोने वाले व्याकुल व्यक्ति के समान है अर्थात् जिस प्रकार काँटों की शय्या पर सोने वाला व्यक्ति हर समय व्याकुल रहता है, उसी प्रकार सभी प्रकार के भौतिक सुख-साधनों से परिपूर्ण होते हुए भी ममता का जीवन दुःखदायी प्रतीत होता है। बाल्यावस्था में ही विधवा हो जाने के कारण ही ममता की स्थिति दयनीय हो गई थी। हिन्दू समाज में विधवा स्त्रियों को संसार का सबसे तुच्छ प्राणी माना जाता है। प्रत्येक विधवा स्त्री को विभिन्न प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं तथा समाज में अनेक प्रतिबन्धों का सामना करना पड़ता है। विधवा का जीवन स्वयं विधवा के लिए भार-सा बन जाता है। ममता भी एक ऐसी ही स्त्री थी, जो सभी प्रकार के भौतिक साधन होते हुए भी असहाय और दयनीय स्थिति का सामना कर रही थी। वह अपने बाल-विधवा जीवन के भार को ढो रही थी, जिससे छुटकारा पाने का हिन्दू समाज में कोई विकल्प ही नहीं है।


(ग) उपरोक्त गद्यांश में हिन्दू-विधवा की स्थिति को दयनीय, शोचनीय, तुच्छ और उस प्राणी के समान बताया गया है, जिसे कोई आश्रय नहीं देना चाहता है। वह तरह-तरह के दुःख सहने के लिए विवश होती है।


(घ) ममता रोहतास-दुर्ग के सेनापति चूड़ामणि की इकलौती पुत्री थी, जो बचपन में विधवा हो गई थी। वह अपने कमरे में बैठकर सोन नदी के उफनते बहाव को देख रही थी।


(ङ) ममता रोहतास दुर्ग के सेनापति चूड़ामणि की इकलौती पुत्री थी, जो बचपन में विधवा होकर हिन्दू समाज द्वारा बनाए गए नियमों में बँधकर अपना जीवन व्यतीत कर जी रही थी। उसके जीवन में दुःख की सीमा न थी। भौतिक सुखों का ढेर लगा होने पर भी ममता सुखी न थी।


  1. हे भगवान! तब के लिए! विपद के लिए! इतना आयोजन! परमपिता की इच्छा के विरुद्ध इतना साहस! पिताजी, क्या भीख न मिलेगी? क्या कोई हिन्दू भू-पृष्ठ पर न बचा रह जाएगा, जो ब्राह्मण को दो मुट्ठी अन्न दे सके? यह असम्भव है। फेर दीजिए पिताजी, मैं कॉप रही हूँ-इसकी चमक आँखों को अन्धा बना रही है।




उत्तर


(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'ममता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयशंकर प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि चाँदी के दस थालों में लाए गए ढेर सारे सोने को देखकर ममता चकित होकर अपने पिता से कहती है कि हे भगवान! उस समय के लिए जब आपका मन्त्रित्व न रहेगा, उन विपदा भरे दिनों के लिए इतना सारा आयोजन अभी से ही, यह अच्छा नहीं है। रिश्वत में लिया गया इतना सारा सोना लेकर आपने ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य और उसका अपमान किया है। यदि ईश्वर की इच्छा से हमें दुःख मिलने वाला है, तो हमें उसे सहने के लिए सहर्ष तैयार रहना चाहिए। पिताजी! मन्त्रित्व न रहने पर भी हमें पेट भरने के लिए कम-से-कम भीख तो मिल ही जाएगी। इस रिश्वत की अपेक्षा तो भीख माँगकर जीवित रहना अधिक उचित है। इस पृथ्वी पर उस समय भी बहुत से हिन्दू ऐसे होंगे, जो हम ब्राह्मणों को दो मुट्ठी अनाज भीख में दे देंगे।


() ममता बाल-विधवा थी, जो ब्राह्मण जाति से सम्बन्ध रखती थी। ईश्वर और भाग्य में उसकी प्रबल आस्था थी। वह सुख-दुःख दोनों को ही ईश्वर को इच्छा मानती थी। आने वाले कुसमय के लिए रिश्वत के रूप में धन एकत्र करने को वह ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध मानती थी। इस प्रकार गद्यांश में ममता की भाग्यवादी, करुणामयी, निर्लोभी तथा ईश्वरवादी मनोवृत्ति को स्पष्ट किया गया है।


  1. काशी के उत्तर में धर्मचक्र विहार मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खण्डहर था। भग्न चूड़ा, तृण गुल्मों से ढके हुए प्राचीन, ईंटों के ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी। जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम का उपदेश ग्रहण करने के लिए पहले मिले थे, उसी स्तूप के भग्नावशेष की मलिन में एक झोंपड़ी के दीपालोक में एक स्त्री पाठ कर रही थी


“अनन्याश्चिन्तयन्तो मा ये जनाः पर्युपासते-"


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) धर्मचक्र कहाँ स्थित था?


(घ) पंचवर्गीय भिक्षु कौन थे? ये गौतम से क्यों और कहाँ मिले थे?


उत्तर


(क)सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'ममता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयशंकर प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या प्रसाद जी कहते हैं कि काशी के उत्तर में अनेक बौद्ध स्मारक हैं। इन स्मारकों को मौर्य वंश एवं गुप्त वंश की शान बढ़ाने के लिए बनवाया गया था। ये स्मारक अब टूट-फूट चुके हैं। इनकी टूटी-फूटी चोटियाँ, दीवारें, कंगूरे खण्डहर बन गए हैं। इन पर झाड़ियाँ उग आई हैं, पत्ते बिखरे हैं। इन खण्डहरों को देखकर ऐसा लगता है मानो ईंट के ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्पकला की आत्मा ग्रीष्म ऋतु की चाँदनी से स्वयं को शीतलता प्रदान कर रही थी।


(ग) धर्मचक्र काशी नगर के उत्तर में स्थित है, जिसे भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ नामक स्थान पर स्थापित किया था।


() पंचवर्गीय भिक्षु गौतम बुद्ध के प्रथम पाँच शिष्य थे, ये पाँचों शिष्य गौतम बुद्ध से उपदेश ग्रहण करने के लिए काशी के उत्तर में स्थित उन खण्डहरों में मिले थे, जो सारनाथ नामक स्थान पर स्थित है।


  1. "मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म-अतिथि देव की उपासना का पालन करना चाहिए, परन्तु यहाँ ……. नहीं – नहीं, सब विधर्मी दया के पात्र  नहीं।परन्तु यह दया तो नहीं …...कर्त्तव्य करना है। तब?

  मुगल अपनी तलवार टेककर उठ खड़ा हुआ। ममता ने कहा-"क्या आश्चर्य है कि तुम छल करोः ठहरो।" "छल! नहीं, तब नहीं, स्त्री! जाता हूँ, तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा? जाता हूँ। भाग्य का खेल है।"


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) ममता के मन में क्या अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था?


 (घ) ममता मन-ही-मन क्या विचारती है?


(ङ) 'क्या आश्चर्य है कि तुम छल करो।' यह कथन किसने, किससे कहा और क्यों?


(च) 'छल! नहीं, तब नहीं स्त्री! जाता हूँ।' यह कथन किसके द्वारा किसे और क्यों कहा गया?


उत्तर


(क) सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'ममता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयशंकर प्रसाद' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या लेखक कहता है कि जब हुमायूँ ममता की झोंपड़ी में शरण लेता है, तब ममता के मन में अन्तर्द्वन्द्व चलता है कि वह हुमायूँ की मदद करे अथवा नहीं। ममता मन-ही-मन विचार करती है कि मैं तो ब्राह्मणी हूँ और सच्चा ब्राह्मण कभी अपने धर्म से विमुख नहीं होता, इसलिए मुझे तो अपने अतिथि-धर्म का पालन करना ही चाहिए और उसकी सेवा करनी चाहिए, परन्तु दूसरी ओर उसके मन में विचार आया कि यह तो अत्याचारी, पापी है।


इन मुगलवंशियों ने तो मेरे पिताजी की हत्या की थी। यदि कोई और पापी होता तो उसके प्रति दया दिखाकर उसे सहारा दिया जा सकता था, परन्तु पिता की हत्या करने वाले को कभी नहीं। एक बार पुनः उसके मन में विचलन होना आरम्भ हो जाता है और वह कहती है-मैं इसके ऊपर दया-भाव तो नहीं दिखा रही हूँ, परन्तु अपना कर्त्तव्य निर्वाह कर रही हूँ।


(ग) ममता के मन में अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था कि हुमायूँ की मदद करे अथवा नहीं। 


() ममता मन-ही-मन यह विचारती है कि मैं तो ब्राह्मणी हूँ और सच्चा ब्राह्मण कभी अपने धर्म से विमुख नहीं होता।



(ङ)क्या आश्चर्य है कि तुम भी छल करो।" यह कथन ममता ने हुमायूँ से कहा, क्योंकि ममता के पिता की हत्या भी मुगलों ने छल से ही की थी।


(च) "छल! नहीं, तब नहीं स्त्री! जाता हूँ।" यह कथन हुमायूँ द्वारा ममता से कहा गया, हुमायूँ ने कहा तैमूरवंशी कुछ भी कर सकते हैं, परन्तु किसी स्त्री के साथ छल कभी नहीं कर सकते।


5 अश्वारोही पास आया। ममता ने रुक-रुककर कहा-"मैं नहीं जानती कि वह शहंशाह था या साधारण मुगल; पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा। मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था। मैं आजीवन अपनी झोंपड़ी खो जाने के डर से भयभीत रही। भगवान ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल मैं अपने चिर-विश्राम गृह में जाती हूँ।”



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) वह आजीवन क्यों भयभीत रही?


(घ) (i) 'शहंशाह' शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?


 (ii) 'चिर-विश्राम-गृह' से क्या आशय है?



उत्तर


(क)  सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित 'ममता' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयशंकर प्रसाद' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या प्रसाद जी कहते हैं कि मरणासन्न पड़ी ममता ने अश्वारोही सैनिक को अपने पास बुलाया और कहा कि किसी समय इस झोपड़ी में रात बिताने वाले व्यक्ति ने एक सैनिक को यहाँ घर बनवाने के लिए कहा था। मैं इस झोंपड़ी को खोने के भय से पूरी ज़िन्दगी डरती रही, क्योंकि इस झोंपड़ी के साथ उसके जीवन की बहुत-सी यादें जुड़ी हुई थीं। मैं जब तक ज़िन्दा रही, तब तक ईश्वर ने इसे बचाए रखने की मेरी प्रार्थना सुन ली। अब मैं यह दुनिया छोड़कर जा रही हूँ। अब तुम चाहे मकान बनवाओ या महल। मैं तो मृत्यु की गोद में चिर-विश्राम करने जा रही हूँ, जहाँ मुझे अनन्त काल तक विश्राम मिलेगा।


(ग) ममता आजीवन इसलिए भयभीत रही, क्योंकि पता नहीं कब उसकी झोपड़ी को गिराकर महल बनाने का आदेश दे दिया जाए और उसके सामने रहने

की समस्या आ जाए। वह जीवनभर अपनी झोंपड़ी छोड़ना नहीं चाहती थी।


(घ) (i) 'शहंशाह' शब्द अकबर के पिता हुमायूँ के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिसने ममता की झोपड़ी में शरण ली थी और शेरशाह से अपनी जान बचाई थी।

व्यक्ति उत्सकुता और आश्चर्य से अपने आप से बेखबर हो गया था। अर्थात् वे अपनी सुध-बुध खो बैठे थे।


(ग) संसार के समस्त व्यक्ति अर्थात् वह (ii) "चिर-विश्राम-गृह' से आशय मौत की गोद से है, जहाँ जाकर आदमी सांसारिक भाग-दौड़ से मुक्ति पा जाता है और सदा के लिए विश्राम करता है। Subhansh classes 'गद्य खण्ड' अध्याय 01 पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' नामक लेखक 'जयप्रकाश भारती दुनिया के सभी भागों में स्त्री-पुरुष और बच्चे रेडियो से कान सटाए बैठे थे, जिनके पास टेलीविजन थे, वे उसके पर्दे पर आँखें गड़ाए थे। मानवता के सम्पूर्ण इतिहास की सर्वाधिक रोमांचक घटना के एक क्षण के वे भागीदार बन रहे थे-उत्सुकता और कुतूहल के कारण अपने अस्तित्व से बिल्कुल बेखबर हो गए थे। प्रश्न (क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। (ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (ग) रोमांचक घटना के भागीदार कौन बन रहे थे? उत्तर (क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयप्रकाश भारती हैं। (ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि मानव का चन्द्रमा पर उतरना मनुष्य के अब तक के इतिहास की सबसे अधिक रोमांचक घटना थी। दुनिया के सभी स्थानों के स्त्री-पुरुष और बच्चे इस महत्त्वपूर्ण घटना के इस अद्भुत क्षण का हिस्सा बन रहे थे। यह सब सुनकर प्रत्येक प्रत्येक स्त्री-पुरुष और बालक जो रेडियो पर मानव के चाँद पर उतरने की खबर सुन रहे थे, इस रोमांचक घटना के भागीदार बन रहे थे।


  1. मानव को चन्द्रमा पर उतारने का यह सर्वप्रथम प्रयास होते हुए भी असाधारण रूप से सफल रहा यद्यपि हर क्षण, हर पग पर खतरे थे। चन्द्रतल पर मानव के पाँव के निशान, उसके द्वारा वैज्ञानिक तथा तकनीकी क्षेत्र में की गई असाधारण प्रगति के प्रतीक हैं, जिस क्षण डगमग-डगमग करते मानव के पग उस धूलि-धूसरित अनछुई सतह पर पड़े तो मानो वह हजारों-लाखों वर्षों से पालित-पोषित सैकड़ों अन्धविश्वासों तथा कपोल-कल्पनाओं पर पद-प्रहार ही हुआ। कवियों की कल्पना के सलोने चाँद को वैज्ञानिकों ने बदसूरत और जीवनहीन करार दे दिया-भला अब चन्द्रमुखी कहलाना किसे रुचिकर लगेगा।



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। 


(ग) चन्द्रतल पर मानव के पाँव के निशान किस बात के प्रतीक थे?


(घ) चन्द्रतल पर मानव के पग पड़ने से उसके अन्धविश्वासों तथा कल्पनाओं पर पद-प्रहार कैसे हुआ?


अथवा


 मानव के चन्द्रमा पर उतरने का क्या भाव प्रतिध्वनित हुआ?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयप्रकाश भारती हैं।




(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि जिस समय अमेरिकी चन्द्रयान चन्द्रमा की सतह पर पहुंचा और मानव ने अपने लड़खड़ाते हुए कदम सफलतापूर्वक चन्द्रमा की सतह पर रखे, उस समय ही चन्द्रमा के सम्बन्ध में प्राचीनकाल से आज तक चली आ रही कोरी कल्पनाएँ तथा अन्धविश्वास व निरर्थक अनुमान असत्य सिद्ध हो गए। मनुष्य द्वारा चन्द्रमा 

पर पहुँचने के कारण उसके विषय में यथार्थ सत्य के रूप में सबके सम्मुख आ गया। प्राचीन कवियों ने चन्द्रमा को सुन्दर कहते हुए नारियों के मुख की तुलना उससे की थी, परन्तु चन्द्रमा की सतह पर पहुंचकर वैज्ञानिकों ने कवियों की इन भ्रान्तियों व सन्देह को असत्य सिद्ध कर दिया। वैज्ञानिकों ने चन्द्रमा के विषय में बताया कि वह बहुत कुरूप, ऊबड़ खाबड़ और जीवन रहित है। आज यदि कोई व्यक्ति किसी सुन्दर मुख वाली स्त्री की तुलना चन्द्रमा से करेगा तो अब वह अपने को चन्द्रमुखी कहलाना कैसे पसन्द करेगी? अर्थात् चन्द्रमा तो कुरूप है और कोई सुन्दरी स्वयं की तुलना उस कुरूप चन्द्रमा से नहीं करवाना चाहेगी।


(ग) चन्द्रतल पर मनुष्य के जो पैरों के निशान पड़े हैं, वे मनुष्य की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के अतिरिक्त उसके अदम्य साहस, अलौकिक इच्छा और अलौकिक वैज्ञानिक प्रगति के प्रतीक थे।


(घ) मनुष्य, चन्द्रमा के सौन्दर्य से आदिकाल से आकर्षित होता रहा है। उसने चन्द्रमा के विषय में अनेक कल्पनाएँ और अन्धविश्वास पाल रखे थे परन्तु चन्द्रतल पर मानव के कदम पड़ने के पश्चात् इन कल्पनाओं और अन्धविश्वासों पर प्रहार हुआ, क्योंकि उसने चाँद को ऊबड़-खाबड़ सतह वाला और जीवन के अयोग्य पाया। इस प्रकार उसके अन्धविश्वास और कल्पनाओं पर प्रहार हुआ।


  1. हमारे देश में ही नहीं संसार की प्रत्येक जाति ने अपनी भाषा में चन्द्रमा के बारे में कहानियाँ गढ़ी हैं और कवियों ने कविताएँ रची हैं। किसी ने उसे रजनीपति माना तो किसी ने उसे रात्रि की देवी कहकर पुकारा। किसी विरहिणी ने उसे अपना दूत बनाया तो किसी ने उसके पीलेपन से क्षुब्ध होकर उसे बूढ़ा और बीमार ही समझ लिया। बालक श्रीराम चन्द्रमा को खिलौना समझकर उसके लिए मचलते हैं तो सूर के श्रीकृष्ण भी उसके लिए हठ करते हैं। बालक को शान्त करने के लिए एक ही उपाय था-चन्द्रमा की छवि को पानी में दिखा देना।



प्रश्न



(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


 (ग) राम और कृष्ण चन्द्र के लिए क्यों हठ करते थे? उनके हठ को कैसे शान्त किया जाता था?


अथवा


 बालक को शान्त करने के लिए क्या उपाय था?


(घ) उपरोक्त गद्यांश का साहित्यिक सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।




उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयप्रकाश भारती हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि किसी कवि ने चन्द्रमा को रात्रि के अधिपति की उपमा दी है, तो किसी ने इसका निशा देवी के रूप में वर्णन किया है। प्रेमी के वियोग में दुःखी प्रेमिका ने भी चन्द्रमा को में दूत बनाकर स्वयं के सन्देशों को प्रियतम तक पहुँचाने का असफल प्रयत्न किया है, तो कभी उसका पीलापन देखकर उसे बूढ़ा, बीमार और दुर्बल समझ लिया गया है। बाल्यकाल में श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे श्रेष्ठ पुरुष भी इस चन्द्रमा की ओर आकर्षित हुए तो उन्होंने इसे खिलौने के रूप में लेने की हठ कर ली। बालक की जिद के समक्ष बेबस माँ कौशल्या और यशोदा क्या करती? उनके सम्मुख बालक राम और कृष्ण के हठ को शान्त करने का एक ही उपाय था, चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब (परछाई) को पानी में दिखा दिया जाए। उस समय उन्हें इस बात का बोध नहीं था कि एक दिन वास्तव में चन्द्रमा के पास पहुंचना सम्भव हो सकेगा किन्तु आज मानव में इतनी प्रगति कर ली है कि इस असम्भव कार्य को सम्भव करके दिखा दिया है। मानव विकास की इस कहानी को महादेवी वर्मा ने इस प्रकार स्पष्ट किया है कि प्राचीन समय में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को पानी में दिखाकर उसे पृथ्वी पर उतारा जाता था, किन्तु आधुनिक समय में स्वयं मानव चन्द्रमा पर उतर गया है अर्थात् कहने का तात्पर्य यह है कि पहले चन्द्रमा को प्राप्त करने की कल्पनाएँ की जाती थीं, किन्तु आज मनुष्य उस तक पहुँचने में सफल हो गया है।


(ग) कवि तुलसीदास के श्रीराम और सूरदास के श्रीकृष्ण चन्द्रमा को खिलौना समझकर उसे पाने की बार-बार ज़िद करते रहे हैं। उनकी ज़िद को पूरा करने के लिए थाली में पानी रखकर उसमें चाँद का प्रतिबिम्ब दिखाकर उन्हें शान्त किया जाता था।


(घ) साहित्यिक सौन्दर्य


भाषा सरल, सहज, बोधगम्य (प्रवाहमयी) साहित्यिक हिन्दी। गद्य शैली भावात्मक वाक्य-विन्यास सुगठित

शब्द चयन विषय-वस्तु के अनुरूप तथा भावाभिव्यक्ति में समर्थ । विचार-विश्लेषण चाँद के आकर्षण से आकर्षित होकर उसके विषय में कहानियाँ गढ़ लेने तथा लम्बी यात्रा के पश्चात् चाँद पर पहुंचने का सुन्दर वर्णन किया गया है।


  1. मानव मन सदा से ही अज्ञात के रहस्यों को खोलने और जानने-समझने को उत्सुक रहा है। जहाँ तक वह नहीं पहुँच सकता था, वहाँ वह कल्पना के पंखों पर पहुँचा। उसकी अनगढ़ और अविश्वसनीय कथाएँ उसे सत्य के निकट पहुँचाने में प्रेरणाशक्ति का काम करती रहीं। अन्तरिक्ष युग का सूत्रपात 4 अक्टूबर, 1947 को हुआ था, जब सोवियत रूस ने अपना पहला स्पूतनिक छोड़ा। प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का गौरव यूरी गागरिन को प्राप्त हुआ। अन्तरिक्ष युग के आरम्भ के ठीक 11 वर्ष 9 मास 17 दिन पश्चात् चन्द्र तल पर मानव उतर गया।



प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। 


(ग) अन्तरिक्ष युग का सूत्रपात कब हुआ?


अथवा अन्तरिक्ष युग का आरम्भ कब हुआ? प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का श्रेय किस व्यक्ति को है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयप्रकाश भारती हैं।



 (ख) रेखांकित अंश की व्याख्या –  लेखक कहता है कि मानव अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण सदैव नई वस्तुओं व नए विषयों को जानने के लिए जिज्ञासु रहा है। इसी प्रवृत्ति के कारण वह सदैव अज्ञात रहस्यों को सुलझाने में सफलता प्राप्त करता रहा है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार वह अनजाने (अज्ञात) रहस्यों पर पड़े पर्दे को हटाने के लिए निरन्तर प्रयास करता रहा है और जो उसकी सामर्थ्य से बाहर है वहाँ वह कल्पना द्वारा उसे जानने की चेष्टा करता है।मानव ने अपनी कल्पना शक्ति के द्वारा अनेक काल्पनिक कहानियाँ गढ़ी हैं, यद्यपि यह कल्पित कथाएँ सत्य से परे निराधार मालूम पड़ती है, किन्तु इन्हीं कल्पनाओं के सहारे वह सत्य के निकट पहुँचने का प्रयास करता रहा है और अनजाने रहस्यों पर पड़े पर्दे को हटाने में सफलता प्राप्त कर रहा है। मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ही उसे सदैव सत्य की खोज के लिए प्रेरित करती रहेगी। अन्तरिक्ष युग का सूत्रपात सोवियत रूस के द्वारा पहले स्पतनिक को छोड़े जाने की तिथि अक्टूबर, 1917 थी। अतः यूरी गागरिन को प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। अन्तरिक्ष युग के प्रारम्भ में 11 वर्ष 9 महीने 17 दिन पश्चात् चन्द्रमा के तल पर मानव ने अपना पहला कदम रखा अर्थात् मानव चन्द्रतल पर उतर गया।


(ग) अन्तरिक्ष युग का सूत्रपात 4 अक्टूबर, 1947 को उस समय हुआ, जब रूस ने अपना पहला स्पूतनिक यान छोड़ा और यूरी गागरिन को प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का अवसर मिला।


  1. अभी चन्द्रमा के लिए अनेक उड़ानें होंगी। दूसरे ग्रहों के लिए मानव रहित यान छोड़े जा रहे हैं। अन्तरिक्ष में परिक्रमा करने वाला स्टेशन स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से प्रयत्न किए जा रहे हैं। ऐसा स्टेशन बन जाने पर ब्रह्माण्ड के रहस्यों की पर्तें खोजने में काफी सहायता मिलेगी। यह पृथ्वी मानव के लिए पालने के समान है। वह हमेशा-हमेशा के लिए इसकी परिधि में बँधा हुआ नहीं रह सकता। अज्ञात की खोज में वह कहाँ तक पहुँचेगा, कौन कह सकता है?


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) मानव किसकी परिधि में नहीं बँधा रह सकता और क्यों?


उत्तर


(क) सन्दर्भ –  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'जयप्रकाश भारती हैं।




(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – मनुष्य जिज्ञासु प्रवृत्ति का प्राणी है। उसकी जिज्ञासा उसे नित नए तथ्य जानने के लिए प्रेरित करती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर लेखक कहता है कि मनुष्य ने 21 जुलाई, 1969 को चन्द्रमा के तल पर अपने कदम रखकर भले ही उसके कुछ रहस्यों को समझ लिया हो, पर मनुष्य इतने से ही शान्त नहीं होगा। वह चन्द्रमा के विषय में और अधिक जानने के लिए बार-बार उड़ान भरेगा।

उसकी जिज्ञासा यहीं शान्त नहीं होगी। वह चन्द्रमा पर अपने कदम रखने से उत्साहित होकर अन्य ग्रहों का रहस्य जानने के लिए मानव रहित यान छोड़ने में जुटा है। वह चाहता है कि अन्तरिक्ष में निरन्तर घूमने वाला कोई स्टेशन स्थापित हो जाए। इस दिशा में वह तेजी से निरन्तर प्रयासरत है। ऐसा स्टेशन बन जाने पर ब्रह्माण्ड के अनेक अनसुलझे रहस्यों को जानने व समझने में काफी सहायता मिलेगी।


(ग) मानव पृथ्वी की परिधि में बंधकर नहीं रह सकता है। इसका कारण है—पृथ्वी से बाहर की दुनिया का रहस्य जानने की जिज्ञासा। वह पृथ्वी के अतिरिक्त अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के अज्ञात रहस्यों की खोज में निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। चन्द्रमा के विषय में कुछ रहस्यों को जानने के पश्चात् उसका मनोबल और भी बढ़ गया है।




  1. चरन-कमल बंदौं हरि राइ जाकी कृपा पंगु

 गिरि लंघै, अंधे कौं सब कुछ दरसाइ।। बहिरौ सुनै, गूंग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौ तिहिं पाइ।।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 


प्रसंग – प्रस्तुत पद में सूरदास जी ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण के चरणों की वन्दना करते हुए उनकी महिमा का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया है।


व्याख्या – भक्त शिरोमणि सूरदास जी श्रीकृष्ण के चरण कमलों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! मैं आपके चरणों की, जो कमल के समान कोमल हैं, वन्दना करता हूँ, इनकी महिमा अपरम्पार है, जिनकी कृपा से लंगड़ा व्यक्ति पर्वतों को लाँघ जाता है, अन्धे व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देने लगता है, बहरे को सुनाई देने लगता है, गूँगा बोलने लगता है और गरीब व्यक्ति राजा बनकर अपने सिर पर छत्र धारण कर लेता है। सूरदास जी कहते हैं कि हे कृपालु और दयालु प्रभु! मैं आपके मैं चरणों की बार-बार वन्दना करता हूँ। आपकी कृपा से असम्भव से असम्भव कार्य भी। सम्भव हो जाते हैं। अतः ऐसे दयालु श्रीकृष्ण के चरणों की मैं बार-बार वन्दना करता हूँ।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने ईश्वर के चरणों की महिमा व्यक्त करते हुए उनके प्रति भक्ति भाव को व्यक्त किया है।


भाषा               साहित्यिक ब्रज


शैली                    मुक्तक             


गुण                     प्रसाद


रस                 भक्ति


शब्द-शक्ति।         लक्षणा


छन्द               गेयात्मक




अलंकार


पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 'बार-बार' में एक शब्द की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।


 अनुप्रास अलंकार 'सूरदास स्वामी' में 'स' वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


रूपक अलंकार 'चरण कमल' में कमलरूपी कोमल चरणों के बारे में बताया गया है। इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।






  1. अबिगत-गति कछु कहत न आवै। ज्या गूँगे मीठे फल को रस अंतरगत ही भावै।। परम स्वाद सबही सु निरंतर अमित तोष उपजावै। मन-बानी की अगम-अगोचर, सो जानै जो पावै।। रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु निरालंब कित धावै। सब विधि अगम विचारहिं तातै सूर सगुन-पद गावै।।



सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 



प्रसंग – प्रस्तुत पधांश में सूरदास ने कृष्ण के कमल-रूपी सगुण रूप के प्रति अपनी भक्ति का निरूपण किया है। इन्होंने निर्गुण भगवान की आराधना को अत्यन्त कठिन तथा सगुण ब्रह्म की उपासना को अत्यन्त सुगम और सरल बताया है।


व्याख्या सूरदास जी कहते हैं कि निर्गुण अथवा निराकार ब्रह्म की स्थिति का वर्णन नहीं किया जा सकता । वह अवर्णनीय है । निर्गुण ब्रह्म की उपासना के आनन्द का कोई नहीं कर सकता । जिस प्रकार गूंगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद अपने हृदय में ही अनुभव करता है, वह उसका शाब्दिक वर्णन नहीं कर सकता । उसी प्रकार निर्गुण ब्रह्म की भक्ति के आनन्द का  केवल अनुभव किया जा सकता है,उसे मौखिक रूप से (बोलकर ) प्रकट नहीं किया जा सकता। यद्यपि निर्गुण की प्राप्ति से निरन्तर अत्यधिक आनन्द होता है और उपाय को उससे असीम सन्तोग भी प्राप्त होता है। मा द्वारा उस ईश्वर तक पहुंचा नहीं जा सकता, जो इन्द्रियों से है, इसलिए उसे अगम एवं अगोचर कहा गया है। उसे जो प्राप्त कर लेता है, वही उसे जानना निर्गुण ईश्वरान कोई रूप हैन आकृति, न ही हमें उसके गुणों का ज्ञान जिससे हम उसे प्राप्त कर सके। बिना किसी आधार के न जाने उसे कैसे पाया है? ऐसी स्थिति में भक्त का मन बना किसी आधार के न जाने कहाँ कहाँ भटकता रहेगा, क्योंकि निर्गुण ब्रह्म तक पहुंचना असम्भव है। इसी कारण सर्भ प्रकार से विचार करके ही सूरदास जी ने सगुण श्रीकृष्ण की लीला के पद का अधिक उचित समझा है।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना की अपेक्षा सगुण ब्रह्म की उपासना को सरल बताया है।



भाषा      साहित्यिक ब्रज



छन्द।          गीतात्मक 


शब्द-शक्ति।     लक्षणा


गुण                 प्रसाद


रस।              भक्ति और शान्त


शैली।                 मुक्तक



अलंकार



 अनुप्रास अलंकार 


'अगम-अगोदर' और 'मन-बानी में क्रमश'अ' 'ग' और 'न' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।



दृष्टांत अलंकार ज्यों गूंगे नीठे फल में उदाहरण अर्थात फल के माध्यम से मानव हृदय के भाव को प्रकट किया गया है।इसलिए यहाँ दृष्टान्त अलंकार है। 


  1. किलकत कान्हा धुतुरुवन आवत।मनिमय कनक नंद के आँगन, बिम्ब पकरिव धावत।। कमर्हु निरखि हरि आपु छाँह कौ, कर सौंपकरन चाहत ।किलकि हंसत राजत द्वि दतियाँ, पुनि-पुनि तिहि अवगाह कनक- भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति करि करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति।। बाल-दसा-मुख निरधि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलायति । अँचरा तर लै ढंकी , सूर के प्रभु को दूध पियावति ।।




सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 



प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने मणियुक्त आँगन में घुटनों के बल चलते हुए बालक श्रीकृष्ण की शोभा का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि सूरदास जी श्रीकृष्ण की बाल-मनोवृत्तियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बालक कृष्ण किलकारी मारते हुए घुटनों के बल चल रहे हैं। नन्द द्वारा बनाए मणियों से युक्त आँगन में श्रीकृष्ण अपनी परछाई देख उसे पकड़ने के लिए दौड़ने लगते हैं। कभी तो अपनी परछाई देखकर हँसने लगते हैं और कभी उसे पकड़ना चाहते हैं, जब श्रीकृष्ण किलकारी मारते हुए हँसते हैं, तो उनके आगे के दो दाँत बार-बार दिखाई देने लगते हैं, जो अत्यन्त सुशोभित लग रहे हैं।


श्रीकृष्ण के हाथ-पैरों की छाया उस पृथ्वी रूपी सोने के फर्श पर ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो प्रत्येक मणि में उनके बैठने के लिए पृथ्वी ने कमल का आसन सजा दिया हो अथवा प्रत्येक मणि पर उनके कमल जैसे हाथ-पैरों का प्रतिबिम्ब पड़ने से ऐसा लगता है कि पृथ्वी पर कमल के फूलों का आसन बिछ रहा हो।


श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को देखकर माता यशोदा जी बहुत आनन्दित होती है और बाबा नन्द को बार-बार वहाँ बुलाती है। उसके पश्चात् माता यशोदा सूरदास के प्रभु बालक श्रीकृष्ण को अपने आँचल से ढककर दूध पिलाने लगती है।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने श्रीकृष्ण की बाल-क्रीड़ाओं का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया है।


 

भाषा         ब्रज


शैली         मुक्तक


गुण      प्रसाद और माधुर्य


छंद          गीतात्मक


रस         वात्सल्य 


शब्द-शक्ति    लक्षणा




अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'किलकत कान्ह' और 'प्रतिपद प्रतिमनि' में क्रमशः 'क', 'प' तथा 'त' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुपास अलंकार है। 


पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 'पुनि-पुनि' और 'करि-करि में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।


 उपमा अलंकार 'कनक-भूमि' और 'कमल बैठकी' अर्थात् स्वर्ण रूपी फर्श और कमल जैसा आसन में उपमेय-उपमान की समानता प्रकट की गई है, इसलिए उपमा अलंकार है।




  1. मैं अपनी सब गाइ चरैहौ।प्रात होत बल कै संग जैहाँ, तेरे कहै न रैहौ।। ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैकहुँ डर नहिं लागत। आजु न सोवौ नंद-दुहाई, रैनि रहौंगौ जागत।। और ग्वाल सब गाइ चरैहैं, मैं घर बैठो रैहौ।सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं देहौं।।


सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 



प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने श्रीकृष्ण के स्वाभाविक बालहठ का चित्रण किया है, जिसमें वे अपने ग्वाल सखाओं के साथ अपनी गायों को चराने के लिए वन में जाने की हठ कर रहे हैं।


व्याख्या – बालक कृष्ण अपनी माता यशोदा से हठ करते हुए कहते हैं कि है माता! मैं भी अपनी गायों को चराने वन जाऊँगा। प्रातःकाल होते ही मैं भैया बलराम के साथ बन में जाऊँगा और तुम्हारे कहने पर भी घर में न रुकूँगा, क्योंकि बन में ग्वाल सखाओं के साथ रहते हुए मुझे तनिक भी डर नहीं लगता। आज में नन्द बाबा की कसम खाकर कहता हूँ कि में रातभर नहीं सोऊंगा, जागता रहूँगा। हे माता! अब ऐसा नहीं होगा कि सब ग्वाल बाल गाय चराने जाएं और में घर में बैठा रहूँ। ये सुनकर माता यशोदा ने कृष्ण को विश्वास दिलाया हे पुत्र अब तुम सो जाओ, सुबह होने पर तुम्हें गायें चराने के लिए अवश्य भेज दूंगी।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने श्रीकृष्ण के बाल मनोविज्ञान का स्वाभाविक चित्रण किया है।


भाषा          ब्रज


शैली         मुक्तक  


 रस        वात्सल्य


गुण        माधुर्य


छन्द       गेह पद




अलंकार


अनुप्रास अलंकार रैनि रहेंगौ', 'ग्वाल बाल' और 'सूर स्याम' में क्रमश: 'र', 'ल' और 'स' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।



  1. मैया हौं न चरैहौं गाइ।सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं, मेरे पाई पिराइ जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौहं दिवाइ।यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ मैं पठवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ।।



सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में माता यशोदा ने श्रीकृष्ण द्वारा हठ किए जाने पर उन्हें वन भेज दिया, किन्तु वन में ग्वाल सखाओं ने उन्हें परेशान किया तथा प्रस्तुत पद में श्रीकृष्ण घर लौटकर माता यशोदा से उनकी शिकायत करते हैं।



 व्याख्या – श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं कि हे माता! अब मैं गाय चराने नहीं जाऊँगा। सभी ग्वाले मुझसे ही अपनी गायों को घेरने के लिए कहते हैं, इधर से उधर दौड़ते-दौड़ते मेरे पैरों में दर्द होने लगता है। हे माता! यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो अपनी सौगन्ध दिलाकर बलराम भैया से पूछ लो। यह सुनकर माता यशोदा क्रोधित होकर ग्वालों को गाली देने लगती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा कहती हैं कि मैं अपने पुत्र को वन में इसलिए भेजती हूँ कि उसका मन बहल जाए। मेरा कृष्ण अभी बहुत छोटा है, ये ग्वाले उसे इधर-उधर दौड़ाकर मार डालेंगे।


काव्य सौन्दर्य


कवि सूरदास ने श्रीकृष्ण व माता यशोदा का स्थितिवश व्यवहार का यथार्थपरक चित्रण किया है।


भाषा          ब्रज


गुण           माधुर्य 


शैली           मुक्तक


छन्द           गेय पद


रस।           वात्सल्य


शब्द-शक्ति       अभिधा



छन्द अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'मोसौं मेरे', 'पाइँ पिराई', 'ग्वालनि गारी' और 'सूर स्याम' में क्रमश: 'म', 'प' तथा 'इ', 'ग' और 'स' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।



  1. सखी री, मुरली लीजै चोरि। 'जिनि गुपाल कीन्हे अपनै बस, प्रीति सबनि की तोरि।। छिन इक घर-भीतर, निसि-बासर, धरत न कबहूँ छोरि । कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोसत जोरि ।। ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-अँग भोरि। सूरदास प्रभु कौ मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि।।



सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 



प्रसंग – प्रस्तुत पोश में श्रीकृष्ण का मुरलों के प्रति प्रेम तथा उससे ईर्ष्या करती गोपियों को मनोदशा का चित्रण किया गया है।


 व्याख्या – गोपियों एक-दूसरे से कहती है कि है सखी! कृष्ण की मुरली को हमे बुरा लेना चाहिए। इस पुरती ने श्रीकृष्ण को अपनी ओर आकर्षित कर अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण ने भी मुरली के वशीभूत होकर हम सभी गोपियों को भुला दिया है। वे घर के भीतर हो बाहर कभी एक पल के लिए भी मुरली को नहीं छोड़ते। कभी हाथ में रखते हैं तो कभी होठो पर और कभी कमर में खास लेते है। इस तरह से श्रीकृष्ण भी उसे कभी भी अपने से दूर नहीं होने देते। यह हमारी समझ में नहीं आ रहा कि मुरली ने कौन-सा मोहिनी मन्त्र श्रीकृष्ण पर चला दिया है, जिससे श्रीकृष्ण पूर्णरूपेण उसके वश में हो गए हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों कह रही है कि हे सजनी इस वंशी ने श्रीकृष्ण का मन प्रेम की डोरी से बांधा हुआ है।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने श्रीकृष्ण की मुरली के प्रति ईर्ष्या भाव का स्वाभाविक चित्रण किया है।


भाषा            ब्रज 


गुण              माधुर्य


रस                 श्रृंगार


शैली              मुक्तक और गीतात्मक 


छंद                 गेव पद


शब्द-शक्ति          लक्षणा



अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'कबहूँ कर कबहूँ' और 'मेलि मोहनी' में क्रमश: 'क' तथा 'ह' और 'म' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 'अँग-अंग' में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। 


रूपक अलंकार 'राग की डोरी' अर्थात् प्रेम रूपी डोर का वर्णन किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।



  1. ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं। बृन्दाबन गोकुल बन उपबन, सघन कुंज की छाँही। प्रात समय मात जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत। माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत।। गोपी ग्वाल बाल संग खेलत, सब दिन हँसत सिरात।सूरदास धनि धनि बजबासी, जिनसौं हित जदु-जात ।



सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 



प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की मनोदशा का चित्रण किया है। उद्धव ने मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण को वहाँ की सारी स्थिति बताई, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण भाव-विभोर हो गए।



व्याख्या श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे उद्धव! मैं ब्रज को भूल नहीं पाता हूँ। मैं सबको भुलाने का बहुत प्रयत्न करता हूँ, पर ऐसा करना मेरे लिए सम्भव नहीं हो पाता। वृन्दावन और गोकुल, वन, उपवन सभी मुझे बहुत याद आते हैं। वहाँ के कुंजों की घनी छाँव भी मुझसे भुलाए नहीं भूलती। प्रातः काल माता यशोदा और नन्द बाबा मुझे देखकर हर्षित होते तथा अत्यन्त सुख का अनुभव करते थे। माता यशोदा मक्खन, रोटी और दही मुझे बड़े प्रेम से खिलाती थी। गोपियाँ और ग्वाल-बालों के साथ अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ करते थे और सारा दिन हँसते-खेलते हुए व्यतीत होता था। ये सभी बाते मुझे बहुत याद आती हैं। 


सूरदास जी ब्रजवासियों की सराहना करते हुए कहते हैं कि वे ब्रजवासी धन्य हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण स्वयं उनके हित की चिन्ता करते हैं और इनका प्रतिक्षण ध्यान करते हैं। उन्हें श्रीकृष्ण के अतिरिक्त ऐसा हितैषी और कौन मिल सकता है।


काव्य सौन्दर्य


श्रीकृष्ण साधारण मनुष्य की भाँति अपने प्रियजनों को याद कर द्रवित हो रहे हैं। यद्यपि उनका व्यक्तित्व अलौकिक है फिर भी ब्रज की स्मृतियाँ उन्हें व्याकुल कर देती हैं।



भाषा       ब्रज


गुण          माधुर्य


रस           श्रृंगार


छन्द          गेयात्मक


शब्द-शक्ति   अभिधा और व्यंजना




अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'ब्रज बिसरत', 'गोपी ग्वाल' और 'अति हित' में क्रमश: 'ब', 'ग' और 'त' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 'धनि-धनि' में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।




  1. ऊधौ मन न भए दस बीस'एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधे ईस।। इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस। आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।। तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के ईस सूर हमारैं नँद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस।।


सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश 'भ्रमरगीत' का एक अंश है। श्रीकृष्ण मथुरा चले जाते हैं और गोपियाँ उनको याद कर-कर के अत्यन्त व्याकुल हैं। श्रीकृष्ण उद्धव को गोपियों के पास भेजते हैं। वह ज्ञान और योग का सन्देश लेकर ब्रज में पहुंचते हैं, लेकिन वे उनके इस सन्देश को स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ बताती हैं, क्योंकि वे श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी अन्य की आराधना नहीं कर सकती है।


व्याख्या – गोपियाँ, उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! हमारे दस-बीस मन नहीं हैं। हमारे पास तो एक ही मन था, वह भी श्रीकृष्ण के साथ चला गया। अब हम किस मन से तुम्हारे द्वारा बताए गए निर्गुण ब्रह्म की आराधना करें? अर्थात् जब मन ही नहीं है तो किस प्रकार हम तुम्हारे द्वारा बताए गए धर्म का पालन करें। श्रीकृष्ण के बिना हमारी सारी इन्द्रियाँ शिथिल (कमजोर) हो गई है अर्थात् शक्तिहीन और निर्बल हो गई हैं। इस समय इनकी स्थिति ठीक वैसी ही हो गई है, जैसी बिना सिर के प्राणी की हो जाती है। श्रीकृष्ण के बिना हम निष्प्राण हो गई हैं। हमें हमेशा उनके आने की आशा बनी रहती है। इसी कारण हमारे शरीर में श्वास चल रही है। इसी आशा में हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह सकती हैं।


गोपियाँ कहती है कि हे उद्धव! आप तो श्रीकृष्ण के मित्र है और सभी प्रकार के योग विद्या के स्वामी हैं, सम्पूर्ण योग विद्या तथा मिलन के उपायों को जानने वाले हैं। आप ही श्रीकृष्ण से हमारा मिलन करा सकते हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों ने स्पष्ट रूप से उद्धव को बता दिया कि नन्द जी के पुत्र श्रीकृष्ण के बिना उनका कोई और आराध्य नहीं है। उनके अतिरिक्त वे और किसी की आराधना नहीं कर सकती।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने श्रीकृष्ण के विरह में विचलित गोपियों की शारीरिक व मानसिक स्थिति का चित्रण किया है।


भाषा             ब्रज


रस             शृंगार (वियोग


शैली             मुक्तक


गुण।              माधुर्य


छन्द।              गेय पद



शब्द-शक्ति।       व्यंजना




अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'दस बीस', 'स्याम सँग' और 'नंद-नंदन' में क्रमश 'स', 'स' और 'न' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


उपमा अलंकार 'ज्यौं देही बिनु सीस' अर्थात् बिना सिर के प्राणी के रूप में मानवीय वेदना का वर्णन किया गया है। इसलिए उपमा अलंकार है।


श्लेष अलंकार 'ज्यौं देही बिनु सीस' में 'ज्यौं' वाचक शब्द का प्रयोग किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।


भाव साम्य


इसी प्रकार का भाव व्यक्त करते हुए तुलसीदास ने भी कहा है.


 "एक भरोसो, एक बल, एक आस बिस्वास

एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास "



  1. ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने। स्याम तुमहिं ह्या को नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने।। ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ, बात कहत न लजाने। बड़े लोग न बिवेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने।। हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेह सयाने। कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने।। साँच कहौं तुमको अपनी सौं, बूझतिं बात निदाने। सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ, तब नैकहुँ मुसकाने।।



सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 



प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं- हे उद्धव! हम तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म को नहीं मानेंगी। उद्धव तथा गोपियों के बीच हुए तर्क-वितर्क का वर्णन किया गया है।


व्याख्या – गोपियाँ, उद्धव से कहती हैं कि तुम यहाँ से वापस चले जाओ। हम तुम्हें भली प्रकार से जानती हैं। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम्हें यहाँ श्रीकृष्ण ने नहीं भेजा है। तुम स्वयं रास्ता भटककर यहाँ आ गए हो। तुम ब्रज की नारियों (गोपियाँ) से योग की बात कह रहे हो, तुम्हें लज्जा नहीं आती। तुम भले ही बुद्धिमान और ज्ञानी होंगे, परन्तु हमें ऐसा लगता है कि तुममें विवेक नहीं है, नहीं तो तुम ऐसी अज्ञानतापूर्ण बातें हमसे क्यों करते? तुम ये मन में विचार कर लो, जो हमसे कह दिया ब्रज में किसी अन्य से ऐसी बात न कहना। हमने तो सहन कर लिया, कोई दूसरी गोपी सहन नहीं करेगी। कहाँ योग की दिगम्बर (वस्त्रहीन) अवस्था और कहाँ हम अबला नारियाँ। अतः अब तुम चुप हो जाओ और जो भी कहना सोच-समझकर कहना। अब तुम सच-सच बताओ कि जब श्रीकृष्ण ने तुम्हें यहाँ भेजा था, वह क्या थोड़ा-सा मुस्कुराए थे। वे अवश्य मुस्कुराए होंगे। तभी तो उन्होंने तुम्हारे साथ उपहास करने लिए तुम्हें यहाँ भेजा है।



काव्य सौन्दर्य


कवि ने निर्गुण ब्रह्म की श्रेष्ठता तथा गोपियों द्वारा उद्धव की उलाहना का हास्यस्पद चित्रण किया गया है।



भाषा          ब्रज


गुण            माधुर्य


छन्द        गेय पद


शैली       मुक्तक


रस       शृंगार का वियोग रूप


शब्द-शक्ति    व्यंजना



अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'स्याम तुमहिं', 'बात कहत', 'बूझति बात' और 'नैकहुँ मुसकाने' में क्रमशः 'स', 'त', 'ब' और 'क' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।





  1. निरगुन कौन देस कौ बासी? मधुकर कहि समुझाइ सौह दै, बूझतिं साँच न हाँसी।। को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी? कैसो बरन, भेष है कैसो, किहिं रस मैं अभिलाषी? पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी। सुनत मौन हवै रह्यौ बाबरौ, सूर सबै मति नासी।।




सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 


 प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास ने गोपियों के माध्यम से निर्गुण ब्रह्म की उपासना का खण्डन तथा सगुण कृष्ण की भक्ति का मण्डन किया है।


व्याख्या – गोपियाँ भ्रमर की अन्योक्ति के माध्यम से उद्धव को सम्बोधित करते हुए कहती है कि हे उद्धव! ये निर्गुण ब्रह्म किस देश के निवासी है? हम तुम्हें सौगन्ध देकर पूछती है, कि तुम हमें सच-सच बताओ, हम कोई हंसी-मजाक नहीं कर रही हैं। तुम यह बताओ कौन उसका पिता है, कौन माता है, कौन स्त्री है और कौन उसकी दासी है? उसका रंग-रूप कैसा है, उसकी वेशभूषा कैसी है? तथा वह किस रस की इच्छा रखने वाला है?


गोपियाँ, उद्धव को चेतावनी देते हुए कहती है कि हमें सभी बातों का ठीक-ठीक उत्तर देना। गोपियाँ कहती है कि यदि तुम हमसे कपट करोगे तो उसका परिणाम तुम्हे अवश्य भुगतना पड़ेगा। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के इस प्रकार व्यंग्यात्मक तर्कपूर्ण प्रश्नों को सुनकर उद्धव स्तब्ध हो गए। वह उनके प्रश्नों का कुछ उत्तर न दे सके। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उनका सारा ज्ञान समाप्त हो गया हो। गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य से ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया अर्थात् उद्धव का सारा ज्ञान अनपढ़ गोपियों के सामने नष्ट हो गया।



काव्य सौन्दर्य


कवि ने गोपियों द्वारा निर्गुण ब्रह्म का उपहास अत्यन्त व्यंग्यात्मक तथा तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है।


भाषा         ब्रज


शैली        मुक्तक


 गुण       माधुर्य


छन्द       गेह पद


रस    वियोग शृंगार एवं हास्य


 शब्द-शक्ति        व्यंजना




अलंकार


 अनुप्रास अलंकार 'समुझाई सौह', 'कैसो किहिं', 'पावैगो पुनि' और 'सुनत मौन' में क्रमश: 'स', 'क', 'प' और 'न' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


अन्योक्ति अलंकार मधुकर अर्थात् भ्रमर के रूप में उद्धव की तुलना की गई है, जिस कारण अन्योक्ति अलंकार है।





  1. सँदेसौ देवकी सौं कहियौ ।हौं तो धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ ।। जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै।प्रात होत मेरे लाल लड़ैते, माखन रोटी भावै।। तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देखि भजि जाते। जोइ-जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते।। सूर पथिक सुन मोहिं रैनि-दिन बढ्यौ रहत उर सोच। मेरौ अलक लड़ैतो मोहन हैहै करत संकोच।।



सन्दर्भ–प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' महाकाव्य से हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी के काव्यखण्ड में संकलित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। 


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की माता देवकी के पास मथुरा चले जाने के बाद माता यशोदा के स्नेह तथा उनकी पीड़ा का वर्णन किया है।


व्याख्या – यशोदा जी देवकी को एक पथिक के हाथ सन्देश भिजवाते हुए कहती हैं कि मैं तो तुम्हारे पुत्र की धाय माँ (माँ समान पालन-पोषण करने वाली सेविका) हूँ पर वह मुझे मैया कहता रहा है। इसलिए मेरा उसके प्रति वात्सल्य भाव स्वाभाविक है। यद्यपि आप तो उसकी सारी आदतें जानती होंगी, फिर भी मेरा मन आपसे कुछ कहने को उत्कंठित हो रहा है।


मेरे लाड़ले कृष्ण को सुबह होते ही माखन-रोटी खाने की आदत है। उबटन, तेल और गर्म पानी को देखते ही मेरे लाड़ले कृष्ण भाग जाते हैं। उन्हें यह सब पसन्द नहीं है। स्नान के समय वे जो माँगा करते थे, मैं उन्हें दिया करती थी। उन्हें धीरे-धीरे स्नान करने की आदत है। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा के हृदय में रात-दिन यही चिन्ता रहती है कि उनका लाड़ला कृष्ण मथुरा में कुछ माँगने में संकोच तो नहीं करता।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने पुत्र वियोगी माता यशोदा का श्री कृष्ण के प्रति अथाह प्रेम का स्वाभाविक रूप व्यक्त किया है।


भाषा          ब्रज


रस            वात्सल्य


शैली          मुक्तक


 गुण           माधुर्य


छन्द          गेय-पद


शब्द-शक्ति।   – व्यंजना


अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'सँदेसौ देवकी', 'मोहिं कहि', 'लाल लड़ैतैं' और 'रैनि-दिन' में क्रमश: 'द', 'ह', 'ल' और 'न' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार 'जोइ-जोइ', 'सोइ-सोइ' और 'क्रम-क्रम में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।


 हिन्दी कक्षा-10 पद्यांशों की सन्दर्भ व प्रसंग सहित व्याख्या एवं उनका काव्य सौन्दर्य



  1. उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग। बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंगा। नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।। मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने ।। भए बिसोक कोक मुनि देवा। बारसहिं सुमन जनावहिं सेवा।। गुरु पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा। सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी ने श्रीराम द्वारा धनुष-भंग से पहले गुरुओं और मुनियों से आज्ञा माँगने, सभा में उपस्थित राजाओं की मनःस्थिति, राम की विनयशीलता तथा उदारता का वर्णन किया है।


व्याख्या – तुलसीदास कहते हैं कि जब श्रीराम जी स्वयंवर सभा में की आज्ञा प्राप्त करके धनुष-भंग के लिए मंच से उठे, तो उनकी शोभा ऐसी प्रतीत हो गुरु विश्वामित्र रही थी, जैसे मंच-रूपी उदयाचल पर्वत पर श्रीराम रूपी बाल सूर्य का उदय हो गया हो, जिसे देखकर सन्तरूपी कमल पुष्प खिल उठे हों और उनके नेत्ररूपी भौंरे प्रसन्न हो गए हों अर्थात् जब श्रीराम मंच से खड़े हुए उस समय स्वयंवर सभा में उपस्थित सभी जन हर्षित हो उठे।कवि कहते हैं कि जब श्रीराम धनुष-भंग के लिए मंच से उठे तो स्वयंवर सभा में उपस्थित राजाओं की सीता को प्राप्त करने की मनोकामना नष्ट हो गई तथा उनके वचनरूपी तारों का समूह चमकना बन्द हो गया अर्थात् वे सभी मौन हो गए। वहाँ जो अभिमानी कुमुदरूपी राजा थे, वे सकुचाने लगे तथा श्रीराम रूपी सूर्य को देखकर मुरझा गए और कपटरूपी उल्लू की तरह छिप गए। जिस प्रकार रात होने पर चकवा-चकवी अपने बिछोह के कारण शोक में डूब जाते हैं, उसी प्रकार सभा में उपस्थित मुनि व देवता भी चकवारूपी शोक में डूबे हुए थे, परन्तु श्रीराम की तत्परता देख उनका दुःख समाप्त हो गया।


अब राम और सीता के संयोग की बाधा समाप्त हो गई। श्रीराम को देखकर सभा में उपस्थित समस्त जन फूलों की वर्षा कर रहे हैं। इसी बीच श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र के चरणों की प्रेमपूर्वक वन्दना कर अन्य सभी मुनियों से धनुष-भंग करने की अनुमति माँगते हैं। सम्पूर्ण जगत् के स्वामी श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र जी के चरणों की वन्दना कर तथा अन्य मुनियों की आज्ञा प्राप्त करके सुन्दर मतवाले हाथी की भाँति मस्त चाल से धनुष की ओर स्वाभाविक रूप से बढ़ रहे हैं।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने उस समय का मनोहरी चित्रण किया है, जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्रीराम धनुष-भंग के लिए मंच से उठ खड़े होते हैं।


भाषा           अवधी


शैली           प्रबन्ध और विवेचनात्मक/चित्रात्मक


गुण            माधुर्य


रस             भक्ति / शृंगार


छन्द           दोहा


शब्द-शक्ति।           अभिधा और व्यंजना




अनुप्रास अलंकार 'उदित उदयगिरि', और 'संत सरोज सब', 'निसिनासी' मानी महिप, बरसहि सुमन, पद बँदि में क्रमश: 'उ', 'द' और 'स' 'न', 'म', 'स', 'द' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


रूपक अलंकार 'रघुबर बालपतंग' में मंच रूपी उदयांचल का वर्णन किया गया है, 'कपटी भूप उलूक लुकाने' कपटरूपी उल्लू के समान राजा का वर्णन किया गया है। जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।




  1. सखि सब कौतुकु देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे।। कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।। रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।। सो धनु राजकुअर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं ।।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।




प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी की माता का राम के प्रति चिन्ता का वर्णन है। श्रीराम की कोमलता को देखकर उनका मन चिन्तित है। जब शक्तिशाली राजा इस धनुष को हिला तक नहीं सके, तब यह बालक इस धनुष को कैसे तोड़ पाएगा?


व्याख्या – सीता जी की माता अपनी सखियों से कहती हैं कि हे सखि! जो लोग हमारे हितैषी कहलाते हैं, वे सभी तमाशा देखने वाले हैं। क्या इनमें से कोई भी राम के गुरु विश्वामित्र को समझाने के लिए जाएगा कि ये (राम) अभी बालक हैं। इस धनुष को तोड़ने के लिए हठ (जिद) करना अच्छा नहीं अर्थात् इस धनुष को बड़े-बड़े योद्धा हिला तक नहीं पाए।


धनुष को तोड़ने के लिए विश्वामित्र का आज्ञा देना और राम का आज्ञा मानकर चल देना तमाशे जैसा नहीं है। यह मेरी पुत्री का स्वयंवर है खेल नहीं, फिर इन्हें कोई क्यों नहीं समझाता ? इस धनुष की कठोरता के कारण रावण और बाणासुर जैसे वीर योद्धाओं ने इसे छुआ तक नहीं। सभी राजाओं का धनुष तोड़ने का घमण्ड टूट चुका है अर्थात् सभी अपनी हार मान चुके हैं, तो धनुष को तोड़ने के लिए इस राजकुमार के हाथों में क्यों दे दिया है? कोई इन्हें समझाता क्यों नहीं कि क्या हंस का बच्चा कभी मन्दराचल पहाड़ उठा सकता है अर्थात् शिवजी के जिस धनुष को रावण और बाणासुर जैसे महान् शक्तिशाली योद्धा छू तक नहीं सकें, उसे तोड़ने के लिए विश्वामित्र का श्रीराम को आज्ञा देना अनुचित है। श्रीराम का भी उसे तोड़ने के लिए आगे बढ़ना बालहठ ही है।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने धनुष भंग से पहले सभा में उपस्थित सीता जी की माता के श्रीराम के प्रति व्याकुलता भाव को स्पष्ट किया है।


भाषा   –    अवधी


शैली   –    प्रबन्ध और विवेचनात्मक


गुण    –    प्रसाद


रस    –    वात्सल्य छन्द चौपाई 



अलंकार 


अनुप्रास अलंकार –'सखि सब', 'हितू हमारे', 'बुझाइ कहइ' और 'बाल मराल' में क्रमशः 'स', 'ह', 'इ' और 'ल' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है। 


दृष्टान्त अलंकार – 'रावन बान हुआ नहिं चापा' में रावण का उदाहरण दिया गया है, इसलिए यहाँ दृष्टान्त अलंकार है। 


रूपक अलंकार – 'बाल मराल कि मंदर लेहीं यहाँ धनुष की #तुलना पहाड़ से की गई है, जिस कारण रूपक अलंकार है।



  1. बोली चतुर सखी मृदु बानी तेजवंत लघु गनिअ न रानी ।। कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।। रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा ।। दोहा- मंत्र परम लघु जासु बस, विधि हरि हर सुर सर्व महामत्त गजराज कहुँ, बस कर अंकुस खर्ब ।।


सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी की माता श्रीराम की कोमलता को देखकर विचलित हो उठती है, तब उनकी सखियाँ उनको शंका को दूर करती हैं कि तेजस्वी व्यक्ति चाहे छोटा ही क्यों न हो, उसे छोटा नहीं मानना चाहिए।


व्याख्या एक सखी सीता जी की माता की शंका का निवारण करते हुए मधुर वाणी में कहती है कि हे रानी। तेजवान व्यक्ति चाहे उम्र में छोटा ही क्यों न हो, उसे छोटा नहीं मानना पतिकहाँ घड़े से उत्पन्न होने वाले मुनि अगस्त्य और कहाँ विस्तृत और दोनों में यद्यपि कोई समानता नहीं है, पर मुनि ने अपने पराक्रम से उस अपार समुद्र को सोख लिया था। इस कारण उनका यश सारे संसार में विद्यमान है। इसी प्रकार सूर्य का घेरा छोटा-सा दिखाई देता है, किन्तु सूर्य के उदित होते ही तीनों लोकों का अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार तुम श्रीराम को छोटा मत समझो।


दोहे का अर्थ 'ओ३म्' का मन्त्र अत्यन्त छोटा है, पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव और समस्त देवगण उसके वश में हैं। इसी प्रकार महान् मदमस्त हाथी को वश में करने वाला अंकुश भी बहुत छोटा-सा होता है। अतः तुम भी श्रीराम को छोटा मत समझो। वह उम्र में छोटे क्यों न हो, तुम उनकी कोमलता पर मत जाओ, वे अवश्य ही धनुष

को तोड़ेंगे। 


काव्य सौन्दर्य


सीता जी की माता की सखी द्वारा दिए गए तर्क श्रीराम के महत्व को दर्शाते हैं।


भाषा.      अवधी


गुण           प्रसाद


रस          वीर छन्द चौपाई 


शैली.        प्रबन्ध और विवेचनात्मक



अलंकार



अनुप्रास अलंकार हरि हर, 'कहँ कुंभज कहँ' और 'तासु तिभुवन' हरि हर में क्रमश: 'प', 'स', 'क' और 'त' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।





  1. मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब महामत्त गजराज कहूँ, काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन बस अपने कीन्हे ।। देबि तजिय संसउ अस जानी। मिटा बिषाद् बढ़ी अति प्रीती ।।बस कर अंकुस खर्ब ।।भंजब धनुषु राम सुनु रानी ।। सखी बचन सुनि भै परतीती।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।


प्रसंग – प्रस्तुत दोहा-चौपाई में सीता जी की माता की सखी श्रीराम की तेजस्विता का वर्णन करते हुए अनेक तथ्यों द्वारा उनका संशय दूर करती है, तभी सीता जी, श्रीराम से विवाह करने के लिए सभी देवताओं से विनती करती है। इसी मोहकता का यहाँ वर्णन किया गया है।


व्याख्या तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता जी की माता जब श्रीराम को छोटा समझकर उनके प्रति अपनी शंका प्रकट करती हैं, तब एक सखी सीता जी की माता से कहती है कि हे रानी! जिस प्रकार ओ३म का मन्त्र अत्यन्त छोटा होता है पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव और समस्त देवगण उसके वश में हैं, उसी प्रकार महान् मदमस्त हाथी को वश में करने वाला अंकुश भी बहुत छोटा-सा होता है। अतः तुम श्रीराम को छोटा मत समझो वह उम्र में छोटे क्यों न हो, आप उनकी कोमलता पर मत जाओ, वे अवश्य ही धनुष तोड़ देंगे।


सीता जी की माता को उनकी सखी श्रीराम की वीरता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर सारे संसार को अपने वश में कर रखा है। अतः हे देवी! आप अपने मन की शंका का परित्याग कर दीजिए। श्रीराम इस शिव-धनुष को अवश्य ही तोड़ देंगे। आप मेरी बात का विश्वास कीजिए। अपनी सखी के ऐसे वचन सुनकर रानी को श्रीराम की क्षमता पर विश्वास हो गया और उनका दुःख (उदासी) समाप्त हो गया तथा उनका विषाद श्रीराम के प्रति स्नेह के रूप में परिवर्तित हो गया।


काव्य सौन्दर्य


कवि ने श्रीराम के पराक्रम तथा उनकी वीरता का बखान सीता जी की माता की सखी द्वारा व्यक्त किया गया है।


भाषा           अवधी


शैली         प्रबन्ध, उद्धरण और वर्णनात्मक


रस.            श्रृंगार



गुण             माधुर्य


छन्द           दोहा


शब्द-शक्ति        अभिधा और लक्षणा



अलंकार


अनुप्रास अलंकार मंत्र परम', 'बस विधि', 'हरि हर', 'सुर सर्व में क्रमश: 'म', 'ब', 'ह' और 'स' तथा 'काम कुसुम', 'संसउ अस 'सुनु रानी' और 'विषादु बढ़ी में क्रमशः 'क', 'स', तथा 'न' और 'ब' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।




  1. लखन लखेड रघुवंसमनि, ताकेउ हर कोदड्डु। पुलकि गात बोले बचन, चरन चापि ब्रह्मांडु || दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला धरहु धरनि धरि धीर न डोला। राम चहहिं संकर धनु तोरा, होहु सजग सुनि आयसु मोरा ।। चाप समीप रामु जब आए, नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए सब कर संसउ अरु अग्यानू, मंद महीपन्ह कर अभिमानू ।। भृगुपति केरि गरब गरुआई, सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई ।। सिय कर सोचु जनक पछितावा, रानिन्ह कर दारुन दुख दावा ।। संभुचाप बड़ बोहितु पाई, चढ़े जाइ सब संगु बनाई।




सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।


प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में लक्ष्मण द्वारा श्रीराम को देखकर प्रसन्न होना, लक्ष्मण द्वारा कच्छप, शेषनाग आदि को चेताना करना तथा राजाओं द्वारा शंका करना कि क्या श्रीराम धनुष तोड़ पाएंगे आदि का वर्णन किया गया है।


व्याख्या तुलसीदास जी कहते हैं कि जब लक्ष्मण जी ने देखा कि रघुकुलमणि श्रीराम, शिवजी के धनुष को खण्डित करने की दृष्टि से देख रहे हैं, तो उनका शरीर आनन्दित हो उठा। शिव-धनुष के खण्डन से ब्रह्माण्ड में उथल-पुथल न हो जाए, इसलिए लक्ष्मण जी ने अपने चरणों से ब्रह्माण्ड को दबा लिया।


लक्ष्मण जी कहते हैं कि हे दिग्गजों! हे कच्छप! हे शेषनाग! हे वाराह! आप सभी धैर्य धारण करें तथा पृथ्वी को संभालकर रखें, क्योंकि श्रीराम इस शिव धनुष को तोड़ने जा रहे हैं, इसलिए आप सब मेरी इस आज्ञा को सुनकर सतर्क हो जाइए। जब श्रीराम धनुष के पास गए, तब वहाँ उपस्थित नर-नारी अपने पुण्यों को मनाने लगे, क्योंकि सभी को श्रीराम के धनुष तोड़ने पर शंका तथा अज्ञान है कि श्रीराम इस धनुष को तोड़ पाएँगे या नहीं। सभा में उपस्थित नीच अहंकारी राजाओं को भी यही लग रहा




काव्य सौन्दर्य


सीता जी की माता की सखी द्वारा दिए गए तर्क श्रीराम के महत्व को दर्शाते हैं।


भाषा।        अवधी


गुण            प्रसाद


शैली      – प्रबन्ध और विवेचनात्मक


रस            वीर


 छन्द        चौपाई


अलंकार



अनुप्रास अलंकार हरि हर, 'कहँ कुंभज कहँ' और 'तासु तिभुवन' हरि हर में क्रमश: 'प', 'स', 'क' और 'त' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।



है कि श्रीराम धनुष नहीं तोड़ पाएंगे, क्योंकि जब हम से यह धनुष नहीं टूटा तो राम से कैसे टूटेगा ? कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि परशुराम के गर्व की गुरुता, सभी देवता तथा श्रेष्ठ मुनियों का भय, सीता जी की चिन्ता, राजा जनक का पछतावा और उनकी

रानियों के दारुण दुःख का दावानल, ये सभी शिवजी के धनुषरूपी बड़े जहाज को पाकर उसमें सब एक साथ चढ़ गए है।



  1.  गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी प्रगट न लाज निसा अवलोकी ।। लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना। सकुची व्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।। तन मन बचन मोर पनु साचा रघुपति पद सरोज चितु राचा।।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।



प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में सीता जी का श्रीराम के प्रति सात्विक प्रेम का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया गया है।


व्याख्या – यहाँ कवि सीता जी की वाणी की असमर्थता को प्रकट करते हुए कहते हैं कि सीता जी के प्रेमभाव की वाणीरूपी भ्रमरी को उनके मुखरूपी कमल ने रोक रखा है अर्थात् वह कुछ बोल नहीं पा रही हैं। जब वह भ्रमरी लज्जारूपी रात देखती है, तो वह अत्यन्त मौन होकर कमल में बैठी रहती है और स्वयं को प्रकट नहीं करती, क्योंकि वह तो रात्रि के बीत जाने पर ही प्रातःकाल में प्रकट होकर गुनगुनाती है अर्थात् सीता जी लज्जा के कारण कुछ नहीं कह पाती और उनके मन की बात मन में ही रह जाती है।


उनका मन अत्यन्त भावुक है, जिसके कारण उनकी आँखों में आँसू छलछला आते हैं, परन्तु वह उन आँसुओं को बाहर नहीं निकलने देती।

सीता जी के आँसू आँखों के कोनों में ऐसे समाए हुए हैं जैसे महाकंजूस का सोना घर के कोनों में ही गड़ा रहता है। सीता जी अत्यन्त विचलित हो रही थीं, जब उन्हें अपनी इस व्याकुलता का बोध हुआ तो वह सकुचा गईं और अपने हृदय में धैर्य रखकर अपने मन में यह विश्वास लाई कि यदि मेरे तन, मन, वचन से श्रीराम का वरण सच्चा है, रघुनाथ जी के चरणकमलों में मेरा चित्त वास्तव में अनुरक्त है तो ईश्वर मुझे उनकी दासी अवश्य बनाएँगे।




 काव्य सौन्दर्य


कवि ने सीता जी के प्रेम तथा श्रीराम से विवाह करने की विचलित स्थिति को व्यक्त किया है।


भाषा              अवधी 


 गुण               माधुर्य


छन्द                 दोहा


शैली                प्रबन्ध और चित्रात्मक


रस।                 शृंगार 


शब्द-शक्ति।       अभिधा एवं लक्षणा



अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'लोचन कोना', 'परम कृपन' और 'धीरे धीरजु' में क्रमश: 'न', 'प' और 'घ' तथा 'र' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


उपमा अलंकार 'जैसे परम कृपन कर सोना' यहाँ समता बताने वाले शब्द 'जैसे का प्रयोग किया गया है। इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है।




  1.  देखी बिपुल बिकल वैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा ।। का बरषा सब कृषी सुखानें समय चुके पुनि का पछितानें ।। अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।। गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा ।। दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।। लेत चढ़ावत खैचत गाढ़े। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें ।। तेहि छन राम मध्य धनु तोरा भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।। छन्द – भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ।। सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेठ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं।। 



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में राजा जनक की राज्यसभा में सीता जी के स्वयंवर का दृश्य है। श्रीराम जी ने देखा कि धनुष-भंग का सही समय आ गया है, उन्होंने देखा कि सारा समाज व्याकुल हो रहा है। यदि समय रहते काम सम्पन्न न हो तो बाद में व्यर्थ ही पछताना पड़ता है। इसी का मनमोहक चित्रण कवि ने किया है।


व्याख्या – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम चन्द्र जी ने सीता जी को अत्यन्त व्याकुल देखा, उन्होंने अनुभव किया कि उनका एक-एक क्षण एक-एक कल्प के समान बीत रहा था तभी श्रीराम जी को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब बिना एक पल का भी विलम्ब किए मुझे धनुष-भंग कर देना चाहिए, क्योंकि यदि कोई प्यासा व्यक्ति पानी न मिलने पर शरीर त्याग दे, तो उसकी मृत्यु के पश्चात् अमृत के तालाब का भी कोई औचित्य नहीं। खेती के सूख जाने पर अगर वर्षा होती है, तो उसका क्या लाभ? समय बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ?


अतः किसी भी कार्य को सही अवसर पर ही करना चाहिए अन्यथा बाद में हाथ मलने से कोई लाभ नहीं होता। ऐसा हृदय में विचारकर श्रीराम जी ने सीता जी की ओर देखा और अपने प्रति उनका विशेष प्रेम देखकर प्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए। तब मन-ही-मन उन्होंने अपने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से उस धनुष को अपने हाथ में उठा लिया।


ज्यों ही श्रीराम ने धनुष को अपने हाथ में उठाया, त्यों ही वह बिजली की भाँति चमका और आकाश में मण्डलाकार हो गया। श्रीराम ने यह सब कार्य इतनी फुर्ती और कुशलता से किया कि सभा में उपस्थित लोगों में से किसी ने भी उन्हें हाथ में धनुष लेते हुए, प्रत्यंचा चढ़ाते और जोर से खींचते हुए नहीं देखा अर्थात् किसी को पता ही नहीं चला कि कब उन्होंने धनुष हाथ में लिया, कब प्रत्यंचा चढ़ाई और कब खींच दिया। सारे कार्य एक क्षण में ही हो गए। किसी को कुछ पता ही नहीं चला। सभी ने श्रीराम को धनुष खींचते ही खड़े देखा। उसी क्षण उन्होंने धनुष को बीच में से तोड़ डाला। धनुष के टूटने की इतनी भयंकर ध्वनि हुई कि वह तीनों लोकों में व्याप्त हो गई।


छन्द का अर्थ – तीनों लोकों में उस भयंकर कर्कश ध्वनि की गूंज व्याप्त हो गई, जिससे घबराकर सूर्य के रथ के घोड़े मार्ग को छोड़कर चलने लगे। समस्त दिशाओं के हाथी चिंघाड़ने लगे, पृथ्वी काँपने लगी, शेषनाग, वाराह और कच्छप व्याकुल हो उठे। देवता, राक्षस और मुनि कानों पर हाथ रखकर व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदास जी कहते हैं कि जब सभी को यह विश्वास हो गया कि श्रीराम जी ने यह धनुष तोड़ डाला, तब सब श्रीराम चन्द्र जी की जय बोलने लगे।




काव्य सौन्दर्य कवि ने श्रीराम द्वारा धनुष भंग करने का सादृश्य चित्रण प्रस्तुत किया है।


भाषा             अवधी


गुण              माधुर्य


छन्द           दोहा


शैली।          प्रबन्ध और सूक्तिपरक


 रस             शृंगार और अद्भुत 


शब्द-शक्ति     अभिधा और लक्षणा




अलंकार



अनुप्रास अलंकार 'बिपुल विकल वैदेही', 'करइ का', 'जिस जानि' 'भरे भवन' 'रव रबि कोल कूरूम' बिकल बिचारहीं' और 'प्रभु पुलके' में क्रमशः 'ब', 'क', 'ज' 'भ', 'र', क, 'ब' प वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


दृष्टान्त अलंकार – तृषित बारि दिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा' और ' का बरषा सब कृषी सुखानें', यहाँ एक ही आशय को दो भिन्नार्थो में व्यक्त किया गया है। इसलिए यहाँ दृष्टान्त अलंकार है। 


अतिशयोक्ति अलंकार – इस पद्यांश में धनुष तोड़ने का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया है, इसलिए यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।


  1. पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग है। झलकी भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै।। फिरि बूझति है—“चलनो अब केतिक, पर्णकुटी करिहौ कित है?" तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।। 



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।



प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में श्रीराम, सीता तथा लक्ष्मण वन में जा रहे हैं। सुकोमल शरीर वाली सीता जी चलते-चलते थक गई हैं, उनकी व्याकुलता का अत्यन्त

मार्मिक वर्णन यहाँ किया गया है।



व्याख्या कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम, लक्ष्मण तथा अपनी सुकोमल प्रिया (पत्नी) के साथ महल से निकले तो उन्होंने बहुत धैर्य से मार्ग में दो कदम रखे। सीता जी थोड़ी ही दूर चली थीं कि उनके माथे पर पसीने की बूँदें आ गई तथा सुकोमल होंठ बुरी तरह से सूख गए। तभी वे श्रीराम से पूछती हैं कि अभी हमें कितनी दूर और चलना है और हम अपनी पर्णकुटी (झोपड़ी) कहाँ बनाएँगे? पत्नी (सीता जी) की इस दशा व व्याकुलता को देखकर श्रीराम जी की आँखों से आँसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। राजमहल का सुख भोगने वाली अपनी पत्नी की ऐसी दशा देखकर वे द्रवीभूत हो गए।


काव्य सौन्दर्य


कवि तुलसीदास जी ने वन मार्ग पर जाते समय सीता जी की थकान भरी स्थिति को देख श्रीराम की व्याकुलता प्रस्तुत की है।


भाषा       ब्रज


गुण       प्रसाद और माधुर्य


शैली          चित्रात्मक और मुक्तक


शब्द-शक्ति।    लक्षणा एवं व्यंजना


छन्द।        सवैया

 

रस          शृंगार 



 अलंकार 


अनुप्रास अलंकार 'रघुबीर बधू', 'भरि भाल', 'पर्णकुटी करिहौ' और 'अँखियाँ अति' में क्रमश: 'ब', 'भ', 'क' और 'अ' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


 स्वाभावोक्ति अलंकार 'झलकी भरी भाल कनी जल की पुट सूखि गए मधुराधर वै' में यथावत स्वाभाविक स्थिति का वर्णन किया गया है, इसलिए यहाँ स्वाभावोक्ति अलंकार है।


  1. जल को गए लक्खन हैं लरिका, परिखौ, पिय! छाँह घरीक है ठाढ़े। पोछि पसेउ बयारि करौं, अरु पायँ पखरिहौं भूभुरि डाढ़े।।” तुलसी रघुबीर प्रिया सम कै बैठि बिलंब लौ कंटक काढ़े। जानकी नाह को नेह लख्यौ, पुलको तनु बारि बिलोचन बाढ़े।। 



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।




प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी ने सीता जी की व्याकुलता तथा सीता जी के प्रति राम के प्रेम का सजीव वर्णन किया है।



 व्याख्या – कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता जी चलते-चलते थक गई हैं और उन्हें प्यास लगने लगती है, तो लक्षमण उनके लिए जल लेने के लिए गए हुए है। तभी सीता जी, श्रीराम से कहती है कि जब तक लक्ष्मण नहीं आते, तब तक हम घड़ी भर (कुछ देर के लिए) कहीं छाँव में खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लेते हैं। सीता जी, श्रीराम से कहती हैं, मैं तब तक आपका पसीना पोछकर हवा कर देती हूँ तथा बालू से तपे हुए पैर धो देती हूँ। श्रीराम समझ गए कि सीता जी थक चुकी हैं और वह कुछ समय विश्राम करना चाहती हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जब श्रीराम ने सीता जी को थका हुआ देखा तो उन्होंने बहुत देर तक बैठकर उनके पैरों में से काँटे निकाले। सीता जी ने अपने स्वामी के प्रेम को देखा तो उनका शरीर पुलकित हो उठा और आँखों में प्रेमरूपी आँसू छलक आए। 



काव्य सौन्दर्य


कवि ने वन मार्ग की कठिनाइयाँ तथा वनवासी जीवन की परिस्थितियाँ प्रकट


की हैं।


भाषा         ब्रज



रस          शृंगार



शैली       मुक्तक


छन्द       सवैया


गुण।     माधुर्य


शब्द-शक्ति      लक्षणा एवं व्यंजना



 अलंकार 


अनुप्रास अलंकार – "परिखो पिय', 'बैठि बिलंब', 'कंटक काढ़े और 'जानकी नाह' में क्रमश: 'प'. 'ब' 'क' और 'न' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।



  1.  रानी मैं जानी अजानी महा, पबि पाहन हूँ ते कठोर हियो है। राजहु काज अकाज न जान्यो, कह्यो तिय को जिन कान कियो है।। ऐसी मनोहर मूरति ये, बिछुरे कैसे प्रीतम लोग जियो है? । आँखिन में, सखि! राखिबे जोग, इन्हें किमि कै बनवास दियो है? ।।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।



प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में गोस्वामी तुलसीदास जी ने ग्रामीण स्त्रियों के माध्यम से कैकेयी और राजा दशरथ की निष्ठुरता पर प्रतिक्रिया का वर्णन किया है।


व्याख्या – श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे हैं, उन्हें देखकर गाँव की स्त्रियाँ आपस में वार्तालाप कर रही है। एक स्त्री दूसरी से कहती है कि मुझे यह ज्ञात हो गया है कि रानी कैकेयी बड़ी अज्ञानी है। वह पत्थर से भी अधिक कठोर हृदय वाली नारी है, क्योंकि उन्हें इन तीनों को वनवास देते समय तनिक भी दया नहीं आई।


दूसरी ओर वे राजा दशरथ को भी बुद्धिहीन समझकर कहती हैं कि राजा दशरथ ने उचित-अनुचित का भी विचार नहीं किया, उन्होंने भी पत्नी का कहा माना और उन्हें वन भेज दिया। ये तीनों तो इतने सुन्दर और मनोहर हैं कि इनसे बिछुड़कर इनके प्रियजन कैसे जीवित रहेंगे? हे सखी! ये तीनो तो आँखों में योग्य हैं। इनको अपने से दूर नहीं किया जा सकता। इन्हें किस कारण वनवास दे दिया गया है? ये तो सदैव अपने सामने रखने योग्य हैं।



काव्य सौन्दर्य


कवि ने ग्रामीण स्त्रियों के माध्यम से रानी कैकेयी की कठोरता तथा राजा दशरथ को राज-काज न जानने वाला बताया है।


भाषा         ब्रज


शैली       मुक्तक


रस         शृंगार और करुण


 गुण        माधुर्य


छन्द       सवैया


शब्द-शक्ति       अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना




अलंकार



अनुप्रास अलंकार पवि पाहन', 'कान कियो', 'मनोहर मूरति' और 'सखि राखिने' में क्रमशः 'प', 'क', 'म' और 'ख' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।



  1. सीस जटा, उर बाहु बिसाल बिलोचन लाल, तिरीछी सी भी हैं। तून सरासन बान धरे, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहैं। सादर बारहि बार सुभाय चितै तुम त्यों हमरो मन मोहैं। पूछति ग्राम बधू सिय सो 'कहाँ साँवरे से, सखि रावरे को हैं?' ।।



सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।




प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन को जा रहे हैं। मार्ग में ग्रामीण स्त्रियाँ उत्सुकतावश सीता जी से प्रश्न पूछती है। वे श्रीराम जी के बारे में जानना चाहती हैं। वे उनसे परिहास भी करती हैं।


व्याख्या – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जी से पूछती हैं कि जिनके सिर पर जटाएँ हैं, जिनकी भुजाएँ और हृदय विशाल हैं, लाल नेत्र हैं, तिरछी भौहे हैं, जिन्होंने तरकश, बाण और धनुष सँभाल रखे हैं, जो वन मार्ग में अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं, जो बार-बार आदर और रुचि या प्रेमपूर्ण चित्त के साथ तुम्हारी ओर देखते हैं, उनका यह सौन्दर्य हमारे मन को मोहित कर रहा है। ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जी से प्रश्न पूछती हैं कि हे सखी! बताओ तो सही, ये साँवले से मनमोहक तुम्हारे कौन हैं?


काव्य सौन्दर्य


यहाँ ग्रामीण स्त्रियों की उत्सुकता का सहज चित्रण हुआ है।


भाषा    ब्रज


शैली।      मुक्तक


गुण।     माधुर्य 


शब्द-शक्ति      व्यंजना


रस       शृंगार


छन्द      सवैया




अलंकार


 अनुप्रास अलंकार 'बाहु बिसाल', 'बिलोचन लाल', 'सरासन बान','सादर बारहि' और 'सावरे से सखि में क्रमश: 'ब', 'ल', 'न', 'र' और 'स' वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


  1. सुनि सुन्दर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली। तिरछे करि नैन दे सैन तिन्है, समुझाइ कछू मुसकाइ चली ।। तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै, अवलोकति लोचन-लाहु अली। अनुराग-तड़ाग में भानु उदै, बिगसी मनो मंजुल कंज-कली ।।




सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के काव्यखण्ड के 'धनुष-भंग' शीर्षक से उद्धृत है। यह कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड' से लिया गया है।




प्रसंग– प्रस्तुत पद्यांश में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन में जा रहे हैं। ग्रामीण स्त्रियों ने सीता जी से उनके पति के विषय में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया। इस पर सीता जी ने संकेतों के माध्यम से श्रीराम जी के विषय में सब बता दिया।


व्याख्या गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ग्राम वधुओं ने सीता जी से राम के विषय में पूछा कि ये साँवले और सुन्दर रूप वाले तुम्हारे क्या लगते हैं? उनकी यह अमृत के समान मधुर वाणी सुनकर सीता जी समझ गईं कि ये स्त्रियाँ बहुत चतुर हैं, वे उनके

मनोभावों को समझ गईं। ये प्रभु (श्रीराम) के साथ मेरा सम्बन्ध जानना चाहती हैं। तब सीता जी ने उनके प्रश्न का उत्तर अपनी मुस्कुराहट तथा संकेत भरी दृष्टि से ही दे दिया। उन्होंने अपनी मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन किया। उन्होंने संकेत के द्वारा ही यह समझा दिया कि ये मेरे पति हैं। अपने नेत्र तिरछे करके, इशारा करके, समझा कर मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गईं अर्थात् उन्हें कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।


तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समय वे स्त्रियाँ श्रीराम की सुन्दरता को एकटक देखती हुई, अपने नेत्रों को आनन्द प्रदान करने लगीं अर्थात् उनके सौन्दर्य को देखकर जीवन को धन्य मानने लगीं। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो प्रेम के सरोवर में रामरूपी सूर्य उदित हो गया हो और ग्राम वधुओं के नेत्ररूपी कमल की सुन्दर कलियाँ खिल गई हों अर्थात् उनके नेत्रों ने अपने जीवन को सफल बना लिया हो।



काव्य सौन्दर्य


कवि ने सीता जी द्वारा ग्रामीण वधुओं को संकेतपूर्ण उत्तर देने से भारतीय नारी की मर्यादा को चित्रित किया है।


भाषा      ब्रज


शैली।     चित्रात्मक व मुक्तक



 गुण।   माधुर्य


छन्द       सवैया


रस       शृंगार


शब्द-शक्ति      व्यंजना


अलंकार


अनुप्रास अलंकार 'सुनि सुन्दर', 'जानकी जानी', 'तिरछे करि', 'तुलसी तेहि' और 'लोचन लाहु' में क्रमश: 'स', 'ज', 'न', 'र', 'त' और 'ल' वर्ण की पुनरावृत्ति से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।


रूपक अलंकार 'सुधारस साने' में उपमेय और उपमान में कोई भेद नहीं है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।


उत्प्रेक्षा अलंकार 'मनो मंजुल कंज कली' में उपमेय में उपमान की सम्भावना को व्यक्त किया गया है। इसलिए यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।



 धनुष-भंग, वन-पथ पर,गोस्वामी तुलसीदास 





  1. ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है, जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं। वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते हैं। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर ईर्ष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या? आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।


(ग) (i) ईर्ष्या का अनोखा वरदान क्या है?


अथवा लेखक ने ईर्ष्या को अनोखा वरदान क्यों कहा है? 


अथवा ईर्ष्यालु व्यक्ति को ईर्ष्या से क्या कष्ट मिलता है?


(ii) ईर्ष्या की किन विशेषताओं का उल्लेख किया गया है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।


(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या


लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' कहते हैं कि जो व्यक्ति ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के होते हैं, उन्हें ईर्ष्या एक अद्भुत एवं अनोखा वरदान देती है। यह वरदान है बिना दुःख के दुःख भोगने का। जब व्यक्ति की के साथी ईर्ष्या बन जाती है या उसके हृदय में बस जाती है, तब वह व्यक्ति सदैव दुःख का अनुभव करता है। उसके दुःखी अनुभव करने के पीछे कोई कारण नहीं होता है। वह अकारण ही कष्ट भोगता है अर्थात् जिस व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में अन्य व्यक्ति की प्रगति और उन्नति को देख ईर्ष्या भाव जाग्रत हो उठता है, वह जीवनभर सुख प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है। वह स्वयं के समीप विद्यमान असंख्य सुख-साधनों के भोग के पश्चात् भी आनन्दित महसूस नहीं कर पाता है, जिसके पीछे का कारण यह है कि वह दूसरों की वस्तुओं को देखकर ज्वलनशील प्रवृत्ति का बन जाता है।


लेखक ईर्ष्या और उसके स्वभाव के विषय में कहता है कि इस डंक से उत्पन्न कष्ट और पीड़ा को सहना उचित नहीं हैं। ईर्ष्या की आग में जलना बुरा होता है। ईर्ष्या करने वाला अपनी इस आदत को आसानी से छोड़ नहीं पाता है। दूसरे की वस्तुएँ देखकर ईर्ष्या करना उसकी आदत बन जाती है। ईर्ष्या से व्यक्ति को सुख तो मिलता नहीं, अपितु उसे पीड़ा ही सहनी पड़ती है, व्यक्ति अपनी ईर्ष्या करने की आदत से यह पीड़ा झेलने को विवश होता है तथा व्यक्ति अपने पास सब कुछ होते हुए भी कष्ट को सहने तथा वेदना (दुःख) को भोगने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता।


(ग) (i) ईर्ष्या का अनोखा वरदान है-दुःख न होते हुए भी दुःख की पीड़ा भोगना। इसे अनोखा वरदान इसलिए कहा गया है, क्योंकि व्यक्ति के पास जो भी वस्तुएँ हैं, उनका आनन्द उठाने के बजाय वह उन वस्तुओं से दुःखी होता है, जो उसके पास नहीं हैं। वह दूसरों की वस्तुएँ देखकर ईर्ष्या करता है और दुःखी होता है।


 (ii) ईर्ष्या की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख प्रस्तुत गद्यांश में किया गया है


() ईर्ष्या के कारण मनुष्य अपने पास मौजूद चीजों का आनन्द नहीं उठा पाता और दुःख उठाता है।


(ब) ईर्ष्यालु मनुष्य अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है


  1. एक उपवन को पाकर भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका आनन्द नहीं लेता और बराबर इस चिन्ता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला, यह एक ऐसा दोष है, जिससे ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन-रात सोचते सोचते वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है और अपनी उन्नति के लिए उद्यम करना छोड़कर वह दूसरों को हानि पहुँचाने को ही अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझने लगता है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए। 


(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र कब भयंकर हो उठता है?


अथवा

 लेखक ने ईर्ष्यालु व्यक्ति के चरित्र के भयंकर हो उठने का क्या कारण बताया है?


(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति किस बात को अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझता है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।



(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या


. लेखक ईर्ष्या से मुक्ति का साधन बताते हुए कहता है कि ईश्वर ने जो वस्तुएं छोटी या बड़ी, कम या ज्यादा, सुन्दर या कुरूप, चाहे जिस रूप में भी प्रदान की हैं, उनके लिए हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और उपलब्ध वस्तुओं से जीवन को आनन्दमय बनाना चाहिए, परन्तु इसके विपरीत यदि हम सारा समय इसी चिन्ता में व्यर्थ करेंगे कि अन्य व्यक्तियों के पास जो सुख-सुविधा के साधन मुझसे अधिक हैं, वे मेरे पास क्यों नहीं है ऐसा सोचते रहने पर ईर्ष्या बढ़ती जाती है और अन्दर-ही-अन्दर ज्वलनशीलता पैदा होती जाती है। इस कारण ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भयंकर हो उठता है। लेखक आगे कहता है कि जय-पराजय, उत्थान-पतन, जीवन-मृत्यु ये सभी ईश्वर के अधीन हैं। हमें इसको प्राप्त करने के लिए दिन-रात चिन्तामग्न रहकर अपने जीवन को कष्टों से युक्त नहीं बनाना चाहिए।


• मनुष्य दूसरे सम्पन्न व्यक्तियों से अपनी तुलना करते रहने पर तथा अपने अभावों पर दिन-रात चिन्तित रहने के कारण सृष्टि की रचना-प्रक्रिया को भूलकर अपना सम्पूर्ण समय ईर्ष्या में व्यर्थ कर देता है। वह कार्य करना छोड़ देता है। वह इस सोच में लगा रहता है कि मैं अन्य सम्पन्न व्यक्ति को किस प्रकार हानि पहुँचा सकता हूँ। इसी कार्य को वह अपने जीवन का उच्चतम व उत्तम कर्त्तव्य समझने लगता है। लेखक कहता है कि ऐसी विचारधारा का जन्म उन व्यक्तियों में होता है, जो असन्तोषी स्वभाव के होते हैं, उनमें ईर्ष्या की भावना अधिक पाई जाती है।


(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र तब भयंकर हो उठता है, जब अपने सुख के साधनों को यह कमतर मान बैठता है और दूसरों के साधनों को बेहतर मान कर उन्हें भी अपना न होने की सोच में जलने लगता है। वह सोचने लगता है कि भगवान ने हमें और अधिक क्यों नहीं दिया।


(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति ईर्ष्या में जलते हुए अपनी सृजनात्मकता खो बैठता है। वह अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी उन्नति के लिए दूसरों को नीचा दिखाने के लिए अधिक करता है। वह विनाश के कृत्य करता है और उसे ही अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझने लगता है।



  1. ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है, जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही बुरे " किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों की निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊँगा।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। 


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


 (ग) ईर्ष्यालु और निन्दक का क्या सम्बन्ध है?


(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा क्यों करता है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है अर्थात् जिस व्यक्ति में ईर्ष्या करने का भाव उत्पन्न हो जाता है, उस व्यक्ति में निन्दा करने की आदत अपने आप पड़ जाती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की बहुत निन्दा करता है। इस निन्दा में भी उसे एक आनन्दानुभूति होती है। वह जिस व्यक्ति की निन्दा करता है, उसके बारे में चाहता है कि सभी उसकी निन्दा करें। वह दूसरों की निन्दा करके समाज की दृष्टि में उस व्यक्ति को गिराना चाहता है, जिसकी वह निन्दा कर रहा है। वह सोचता है कि ऐसा करने से मित्रों और परिचितों की आँखों से वह गिर जाएगा और इस प्रकार उसके रिक्त हुए स्थान स्वयं को स्थापित कर लेगा अर्थात् दूसरों की दृष्टि में प्रशंसा का पात्र बन जाएगा। इस प्रकार वह अपनी उन्नति के चक्कर में दूसरों को गिराने का सतत प्रयास करता रहता है।


(ग) ईर्ष्यालु और निन्दक का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, जो व्यक्ति किसी से जितनी अधिक ईर्ष्या करता है, वह उतनी ही अधिक उसकी निन्दा भी करता है अर्थात् वही निन्दक होता है, जो स्वभाव से ईर्ष्यालु होता है।


(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा इसलिए करता है, क्योंकि वह (ईर्ष्यालु) यह मानने की भूल कर बैठता है कि निन्दा करने से वह व्यक्ति अपने मित्रों और परिचितों की दृष्टि में गिर जाएगा, जिसकी वह निन्दा कर रहा है। इस प्रकार उस व्यक्ति के स्थान को वह स्वयं ले लेगा और वह सम्मानित बन जाएगा।




  1. मगर ऐसा न आज तक हुआ है और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कहीं जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाए तथा अपने गुणों का विकास करे।




प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। 


(ग) ऐसी कौन-सी बात है, जो न आज तक हुई है और न होगी?


(घ) मनुष्य के पतन का क्या कारण होता है? 


(ङ) मनुष्य की उन्नति कैसे हो सकती है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।




(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति हमेशा दूसरे व्यक्तियों की निन्दा करके उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करता है और स्वयं को उसके स्थान पर स्थापित करना चाहता है, परन्तु आज तक ऐसा न हुआ है और न भविष्य में ऐसा होगा। ऐसा न होने के पीछे के कारण को बताते हुए लेखक कहता है कि जो व्यक्ति संसार में ऊंचा उठना चाहता है, वह अपने सुकमों से ही ऊँचा उठ सकता है। दूसरों की निन्दा करके या दूसरों के प्रति ईर्ष्या भाव रखकर कभी कोई श्रेष्ठ व्यक्ति नहीं बन सकता। यदि किसी व्यक्ति का पतन भी होता है तो उसके पीछे निन्दा को दोष दिया जाना भी उचित नहीं है, जबकि उसके पतन के पीछे का कारण उस व्यक्ति के अच्छे गुणों का नष्ट हो जाना होता है, इसलिए लेखक कहता है किकिसी भी व्यक्ति की उन्नति के लिए आवश्यक बात यह है कि मनुष्य निन्दा करना छोड़कर अपने चरित्र को स्वच्छ एवं साफ बनाए तथा अपने अतिरिक्त गुणों का विकास करे। ऐसा करने में सफल होने वाले व्यक्ति की उन्नति सुनिश्चित होती है तथा उसकी उन्नति में न तो निन्दा, न ईर्ष्या और न ही किसी अन्य प्रकार के विकार बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।


(ग) दूसरों को नीचा दिखाकर अपने को ऊँचा बनाने और समाज में सम्मानित स्थान पाने की बात न आज तक हुई है और न ही भविष्य में होगी। अपनी उन्नति के लिए सद्गुणों का विकास आवश्यक है।


(घ) मनुष्य के पतन का कारण उसके सद्गुणों का ह्रास होता है, क्योंकि दूसरों की निन्दा करके स्वयं की कभी भी उन्नति नहीं की जा सकती। 


(ङ) मनुष्य की उन्नति तभी हो सकती है जब मनुष्य निन्दा करना छोड़कर अपने चरित्र को स्वच्छ एवं साफ बनाए तथा अपने अतिरिक्त गुणों का विकास करे।






  1. ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत से लोगों को जानते होंगे, जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलतेही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येयनहीं हो। अगर ज़रा उनके अपने इतिहास को देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब वे अपने क्षेत्र मेंआगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय व शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहाँ होता।




प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (ग) उपरोक्त गद्यांश में ईर्ष्यालु व्यक्ति की मनोदशा कैसी बताई गई है?


(घ) ईर्ष्या का क्या कार्य है? वह सबसे पहले किसे जलाती है?


उत्तर


(क)सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए लेखक कहता है कि जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है, सबसे पहले ईर्ष्या उसी को जलाती है। ईर्ष्या से उत्पन्न दुःख सबसे पहले उसी को भुगतना पड़ता है। यह ईर्ष्या का काम है। ऐसे लोग अपने दुःख को सुनाने के लिए दूसरों को खोजते रहते हैं। ईर्ष्यालु व्यक्ति हर जगह सरलता से मिल जाते हैं। वे ईर्ष्या की जीती-जागती मूर्ति होते हैं।


(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति इस मनोदशा में रहता है कि कब उसके दुःखो को सुनने वाला कोई मिले और वह अपना दुःख-पुराण बाँचना शुरू कर दे। सुनने वाला मिलते ही ईर्ष्यालु बड़ी होशियारी से दूसरों की निन्दा की एक-एक बात बढ़ा-चढ़ाकर इस प्रकार बताता है मानो संसार के कल्याण का सर्वश्रेष्ठ कार्य वही है। 


(घ) ईर्ष्या का कार्य है-जलाना। वह सबसे पहले उसी व्यक्ति को दुःख पहुँचाती और जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है।




  1. चिन्ता को लोग चिता कहते हैं, जिसे किसी प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की ज़िन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईर्ष्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज़ है, क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुण्ठित बना डालती है। मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ है, बनिस्वत इसके कि हमें अपने गुणों को कुण्ठित बनाकर जीना पड़े। चिन्ता-दग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किन्तु ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की एक चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।


(ग) चिन्ता को लोग चिता क्यों कहते हैं?


(घ) ईर्ष्या चिन्ता से भी हानिकारक चीज़ क्यों है?


 (ङ) ईर्ष्यालु और चिन्ताग्रस्त व्यक्ति में क्या अन्तर है?




उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।


(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या


लेखक चिन्ता की तुलना चिता से करते हुए कहता है कि चिन्ता व्यक्ति को उसी प्रकार जलाती है, जैसे चिता। चिता मृत शरीर को जलाती है, परन्तु चिन्ता जीवित व्यक्ति को धीरे-धीरे जलाती है, जिस व्यक्ति को चिन्ता ने जकड़ लिया, उसका जीवन कष्टदायक हो जाता है। व्यक्ति का जीवन दुःखमय बन जाता है, क्योंकि वह हर समय चिन्ता में घुलता रहता है।

लेखक कहता है कि मृत्यु को फिर भी श्रेष्ठ कहा जा सकता है। ईर्ष्या व्यक्ति के सद्गुणों का नाश कर देती है, जिस व्यक्ति के सद्गुण नष्ट हो गए हों उसके जीने से अच्छा है मर जाना। सद्गुणों के बिना मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं रह जाता है। व्यक्ति के पास सारे सुख-साधन हों और वह ईर्ष्या के कारण उनसे लाभान्वित न हो सके ऐसे व्यक्ति पर समाज दया नहीं करता है। हाँ चिन्ता से ग्रस्त व्यक्ति पर समाज ज़रूर दया करता है, क्योंकि वह समाज का अहित नहीं करता है। उसके विचार और कार्य से दूसरों का अहित नहीं होता है। इसके विपरीत ईर्ष्यालु व्यक्ति ज़हर की पोटली के समान होता है, जिसके विचारों और कार्यों से समाज का वातावरण दूषित होता जाता है।


(ग) चिन्ता को लोग चिता इसलिए कहते हैं, क्योंकि चिता व्यक्ति के मृत शरीर को जलाती है और चिन्ता भी व्यक्ति को जलाने का ही कार्य करती है। वह व्यक्ति के जीवित शरीर अर्थात् जीवन को तिल-तिल कर जलाती है। अतः चिन्ता, चिता से भयंकर है। चिन्ता किसी व्यक्ति को चिता से भी अधिक हानि पहुँचाती है।


(घ) ईर्ष्या चिन्ता से भी हानिकारक चीज़ है, क्योंकि ईर्ष्या व्यक्ति के सद्गुणों का नाश कर देती है। जिस व्यक्ति के सद्गुण नष्ट हो जाएँ उसे जीने का कोई लाभ नहीं है। सद्गुणों के बिना मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं रह जाता है। 


(ङ) चिन्ताग्रस्त व्यक्ति समाज में दया का पात्र होता है, क्योंकि वह समाज का अहित नहीं करता, परन्तु ईर्ष्यालु आदमी जहाँ भी जाता है, वहाँ के वातावरण को दूषित कर देता है।


  1. ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष ही नहीं है, प्रत्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पड़ती है, जब भी मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम-सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैं, मानो वह देखने के योग्य ही न हों। आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्रियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर यह हँसी मनुष्य की नहीं राक्षस की होती है और यह आनन्द भी दैत्यों का होता है।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


 (ग) ईर्ष्यालु की मनोदशा कैसी होती है?


(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार क्या है?




उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – ईर्ष्या के स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए लेखक रामधारी सिंह कहते हैं कि ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र का दोष नहीं है। यह भाव व्यक्ति के आनन्दमय क्षणों में भी बाधा उत्पन्न करता है। जिस व्यक्ति के हृदय में ईर्ष्या का भाव जाग्रत हो जाता है, उसे अपना सुख भी दुःख-सा प्रतीत होने लगता है। वह सुखद स्थिति में होते हुए भी सुख से वंचित रहता है। सुख के साधनों से सम्पन्न होने के बाद भी उसे सुख की अनुभूति नहीं होती। पक्षियों के कलरव अथवा उनके मधुर स्वर में उसे कोई आकर्षण नहीं दिखता। उसे सुन्दर और खिले हुए फूलों से भी ईर्ष्या होने लगती है और उसमें कोई सुन्दरता का अनुभव नहीं होता अर्थात् प्राकृतिक सौन्दर्य भी उसे सुख व आनन्द प्रदान नहीं करता। लेखक आगे कहता है कि निन्दा करने वाला प्रायः अपने वचनों के बाणों से अपने प्रतिद्वन्द्वी को घायल करके आनन्द और सुख का अनुभव करता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति समझता है कि उसने निन्दा करके अपने प्रतिद्वन्द्वी को हीन दिखा दिया है और अपना स्थान दूसरों की दृष्टि में ऊँचा बना लिया है, इसीलिए वह खुश होता है और इसी खुशी को प्राप्त करना उसका सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। वास्तव में, ईर्ष्यालु व्यक्ति की यह हँसी और यह क्रूर आनन्द उसमें छिपे हुए राक्षस की हँसी और आनन्द है अर्थात् यह उसके राक्षसी स्वभाव को प्रकट करता है।


(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों के सुख के साधनों का रोना रोता रहता है कि उसके ये साधन अपने क्यों न हुए। वह ईर्ष्या की आग में जलता रहता है और उसे अपने सामने के सुख में कोई आनन्द नहीं मिल पाता है। वह ऐसी मनोदशा में जीता है कि उसे पक्षियों के गीत और फूल भी आकर्षित नहीं कर पाते हैं।


 (घ) ईर्ष्यालु व्यक्तियों का सबसे बड़ा पुरस्कार है-अपनी ईर्ष्या और निन्दा के कुछ वाक्यों से किसी को दुःख पहुँचाकर हँसना और आनन्द उठानाअर्थात् दूसरों को दुःखी करके आनन्दित होना ईर्ष्यालु का सबसे बड़ा पुरस्कार है। 





  1. ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है, क्योंकि प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है, किन्तु अगर आप संसारव्यापी सुयश चाहते हैं, तो आप रसेल के मतानुसार शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेंगे, मगर याद रखिए कि नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरक्युलिस से। 


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। 


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) विश्वव्यापी प्रसिद्धि के इच्छुक लोगों को किस से स्पर्द्धा करनी चाहिए और उन्हें क्या याद रखना चाहिए?


(घ) प्रतिद्वन्द्विता से क्या लाभ है? 


(ङ) ईर्ष्या से प्रतिद्वन्द्विता का क्या सम्बन्ध है?


उत्तर


(क)सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।


(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक ने ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से बताते हुए उसे मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक कहता है कि कोई धनी व्यक्ति किसी भिखारी या कंगाल व्यक्ति से ईष्यां नहीं करता है। ईर्ष्या का कारण है-प्रतिद्वन्द्विता और यह प्रतिद्वन्द्विता सदैव अपने बराबर वालों में ही उत्पन्न होती है अर्थात् किसी धनी व्यक्ति का प्रतिद्वन्द्वी कोई गरीब न होकर धनी व्यक्ति ही होगा। लेखक कहता है कि ईर्ष्या मनुष्य का चारित्रिक दोष है, क्योंकि वह व्यक्ति के आनन्दमय जीवन में बाधा उत्पन्न करती है, परन्तु यह एक दृष्टि से लाभप्रद भी हो सकती हैं, क्योंकि ईर्ष्या के अन्दर ही प्रतिद्वन्द्विता का भाव समाहित होता है। ईर्ष्या के कारण ही मनुष्य किसी अन्य व्यक्ति से स्पर्द्धा (प्रतियोगिता) करता है और अपने जीवन स्तर को विकासशील बनाता है।




रसेल के अनुसार, जो व्यक्ति संसार में अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ना चाहता है, वह शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेगा, किन्तु नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर हरक्युलिस से। आशय यह है कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को प्रभावी, शक्तिशाली आदि समझता है, वह उनसे स्पर्द्धा करके अपना विकास करता है। इस प्रकार यह कहना अनुचित न होगा कि स्पर्द्धा या प्रतिद्वन्द्विता ईर्ष्या के ही रूप हैं तथा ये रूप निश्चित रूप से उपयोगी हैं। स्पर्द्धा या प्रतिद्वन्द्विताओं से जुड़ी हुई यही एक बात ईर्ष्या को उचित सिद्ध कर सकती है, क्योंकि स्पर्द्धा से ही कोई भी मनुष्य जाति उन्नति के पथ पर अग्रसर होकर अपने जीवन को विकासशील बना सकता है।


(ग) विश्वव्यापी प्रसिद्धि पाने के इच्छुक लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इसके लिए नेपोलियन जैसे विश्वविख्यात और महत्त्वाकांक्षी शासक से प्रतिस्पर्द्धा करनी होगी। उसे यह बात भी याद रखनी होगी कि नेपोलियन जूलियस सीजर से, सीजर सिकन्दर से और सिकन्दर हरक्युलिस से प्रतिस्पर्द्धा करता था। प्रतिस्पर्द्धा की भावना के कारण ये शासक इतने महान् तथा विश्वप्रसिद्ध बन सके।


(घ) प्रतिद्वन्द्विता से यह लाभ है कि मनुष्य के मन में विकास करने की इच्छा जाग उठती है और वह विकास की दिशा में सकारात्मक प्रयास करती है। 



(ङ) ईर्ष्या से प्रतिद्वन्द्विता का सम्बन्ध बताते हुए लेखक ने उसे मनोवैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक कहता है कि कोई धनी व्यक्ति किसी भिखारी या कंगाल व्यक्ति से ईर्ष्या नहीं करता है। ईर्ष्या का कारण है-प्रतिद्वन्द्रिता और यह प्रतिद्वन्द्रिता सदैव अपने बराबर वालों में ही उत्पन्न होती है।




  1. ईर्ष्या का एक पक्ष सचमुच ही लाभदायक हो सकता है, जिसके अधीन हर आदमी, हर जाति और हर दल अपने को अपने प्रतिद्वन्द्वी का समकक्ष बनाना चाहता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब कि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो। अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज़ है जो उसके भीतर नहीं है, कोई वस्तु है, जो दूसरों के पास है,किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि इस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है, जबकि वे लोग भी अपने आप से शायद वैसे ही असन्तुष्ट हों।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए। 


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति लोगों से ईर्ष्या क्यों करता है? 


अथवा ईर्ष्यालु व्यक्ति क्या महसूस करता है



 (घ) ईर्ष्या का लाभदायक पक्ष क्या है?


उत्तर


(क)सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक का कहना है कि ईर्ष्या व्यक्ति को हर प्रकार से हानि पहुँचाती है। ईर्ष्या करने वाला मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता है, परन्तु इसका एक सकारात्मक पक्ष भी है। ईर्ष्या का यह सकारात्मक पक्ष व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समाज व प्रत्येक जाति में स्वाभाविक इच्छा उत्पन्न होती है कि वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान ही उन्नति करे और इसके लिए सकारात्मक प्रयास करे। ऐसा करना तभी सम्भव है, जब ईर्ष्या से उत्पन्न यह प्रेरणा विनाशात्मक न होकर रचनात्मक हो अर्थात् प्रतिद्वन्द्विता करते हुए। प्रगति करने के लिए रचनात्मक प्रयास करने की आवश्यकता होती है।


(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति लोगों से इसलिए ईर्ष्या करने लगता है, क्योंकि दूसरे के पास उन वस्तुओं को देखकर उसे दुःख होता है, जो उसके पास नहीं हैं। वह उन वस्तुओं को कैसे प्राप्त करें, वह यह समझ नहीं पाता और क्रोध में भरकर उस व्यक्ति से जलने लगता है, जिसके पास वे वस्तुएँ होती हैं। वह उन्हें अपने से श्रेष्ठ भी मानने लगता है। यही सोच धीरे-धीरे उसकी ईर्ष्या का कारण बन जाती है।



(घ) जो प्रत्येक व्यक्ति व समूह को अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान बनने की प्रेरणा देता है। वही ईर्ष्या का लाभदायक पक्ष है।


  1. तो ईर्ष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है? नीत्से कहता है कि "बाज़ार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो, जो कुछ भी अमर तथा महान् है, उसकी रचना और निर्माण बाज़ार तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है, जो लोग नए मूल्यों का निर्माण करने वाले हैं, वे बाज़ारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास नहीं रहते।" जहाँ बाज़ार की मक्खियाँ नहीं भिनकतीं, वहाँ एकान्त है।


प्रश्न



(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


(ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (ग) ईर्ष्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है?


(घ) नीत्से ने बाज़ार की मक्खियाँ किन्हें कहा है?


उत्तर


(क) सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या –  ईर्ष्यालु लोग सामाजिक वातावरण को दूषित करते हैं। ऐसे लोगों से बचने का उपाय बताता हुआ लेखक कहता है कि जो लोग समाज की प्रगति के नए-नए मूल्यों और सिद्धान्तों की रचना करते हैं, जो व्यक्ति अपना स्वयं का विकास चाहते हैं, उन्हें ऐसी बाजारू मक्खियों के समान भिनभिनाने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इन बाजारू मक्खियों के साथ रहकर कोई भी सुकार्य पूर्ण नहीं किया जा सकता। कोई भी रचनात्मक एवं महान् कार्य बाज़ार या भीड़ से दूर रहकर ही किया जाता है। श्रेष्ठ कार्य करने के लिए प्रसिद्धि के लोभ को त्यागना पड़ता है। जो व्यक्ति समाज में नए मूल्यों का निर्माण करते हैं, वे बाज़ार जैसे स्पर्द्धा के स्थानों से सदैव दूर व भिन्न रहते हैं और महान् व निर्माणात्मक कार्य में अपना सहयोग देते हैं।


(ग) ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय यही है कि यश, वैभव, मान, प्रतिष्ठा आदि देखकर जलने वालों से दूर रहा जाए। यश प्राप्ति का लोभ त्यागकर मन में लोगों के कल्याण की कामना रखते हुए एकान्त में रहना चाहिए।


(घ) नीत्से ने बाज़ार की मक्खियाँ उन लोगों को कहा है, जो दूसरों की सुख-सुविधाओं, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, पद आदि से जलते हैं और ईर्ष्या करने लगते हैं।



  1. ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है, जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है? जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।


प्रश्न


(क) उपरोक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।


 (ख) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।


(ग) ईर्ष्या से बचने के लिए क्या उपाय करना चाहिए?


अथवा ईर्ष्या से बचने के क्या उपाय हैं? 


(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति कब से ईर्ष्या करना कम कर सकता है?


उत्तर


(क)सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के 'गद्य खण्ड' में संकलित पाठ 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं।



(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या लेखक ईर्ष्या से बचने के उपाय को उजागर करते हुए कहता है कि हमें अपने मन पर नियन्त्रण करना चाहिए। मन पर नियन्त्रण करना ही मानसिक अनुशासन कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि मन का स्वभाव चंचल होता है और इसको नियन्त्रित करके ही ईर्ष्या भाव से बचा जा सकता है। कहने का आशय यह है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यदि अपने मन व मस्तिष्क को नियन्त्रित करेगा, तो वह फालतू और निरर्थक बातों पर विचार करने की बुरी आदत से छुटकारा पा सकेगा। जो वस्तु हमारे पास नहीं है, उसके विषय में सोचना व्यर्थ है, जिसके मन में ईर्ष्या-भाव जाग्रत हो गया है उसे यह जानना आवश्यक है कि किस साधन के अभाव के कारण उसके मन में ईर्ष्या भाव उत्पन्न हुआ है। इसके पश्चात् उसे उन अभावों को दूर करने का सकारात्मक प्रयत्न करना चाहिए। उस व्यक्ति को ऐसे उपायों की खोज करनी चाहिए, जिससे उन अभावों की पूर्ति रचनात्मक तरीके से हो सके। जिस दिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह जानने की इच्छा जागेगी कि किस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है और उस अभाव की पूर्ति का सकारात्मक व रचनात्मक उपाय क्या है? उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा।


(ग) ईर्ष्या से बचने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं को मानसिक अनुशासन में बाँध ले। जिन वस्तुओं का उसे अभाव है, उनके बारे में व्यर्थ का सोच-विचार नहीं करना चाहिए तथा अभावों की पूर्ति के लिए सकारात्मक प्रयास करना चाहिए।


(घ) जिस दिन व्यक्ति की समझ में यह आ जाएगा कि किस वस्तु की कमी के कारण उसके मन में ईर्ष्या भाव उत्पन्न हुआ है तथा उस वस्तु को पाने का सकारात्मक उपाय क्या है, इसका ज्ञान होते ही ईर्ष्या करना बन्द कर देगा।



पाठ का नाम ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से लेखक रामधारी सिंह दिनकर




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