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Biotechnology and its applications class 12th notes pdf in hindi/जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग नोट्स

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09 जैव-प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग

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[ Short Introduction of biotechnology and its applicationsजैव-प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग ]


जैव-प्रौद्योगिकी विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत जैविक तन्त्रों एवं जैविक क्रियाओं का उपयोग मानव कल्याण हेतु किया जाता है। यह विज्ञान की आधुनिकतम -शाखा है, जिसमें जैव-रसायन, सूक्ष्मजैविकी आण्विक जीव विज्ञान, आनुवंशिकी आण्विक जीव विज्ञान आनुवंशिकी, आदि के अध्ययन का विस्तृत उपयोग किया जाता है। जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा औद्योगिक स्तर पर आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित सूक्ष्मजीवियों, कवकों, पादपों व जन्तुओं द्वारा जैव-औषधियों व अन्य जैविक पदार्थों का उत्पादन किया जाता है। जैव-प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुपयोग निम्नवत् हैं


कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग


जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा उच्च उत्पादकता वाली फसलों की किस्म तैयार की गई। 'हरित क्रान्ति' के दौरान इन फसलों के प्रयोग से उत्पादन लगभग तीन गुना बढ़ गया। यह जीवों में आनुवंशिक स्तर पर रूपान्तरण द्वारा सम्भव हुआ। ऐसे जीव 'आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित जीव (Genetically Modified 

Organisms-GMOs)' कहलाते हैं। इनके द्वारा उत्पन्न फसलें होती हैं


(i) अजैविक कारकों के प्रति प्रतिरोधी


(ii) रासायनिक कीटनाशकों पर कम निर्भर अर्थात् कीट-प्रतिरोधी


(iii) खनिजों का कुशलता से प्रयोग करने वाली


(iv) उच्च गुणवत्ता वाली फसलें।


(v) नॉन-लेग्यूमिनस पादपों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता के विकास हेतु किया जाता है।


इनके कुछ उदाहरण निम्न हैं


1. Bt फसलें


जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा ऐसी फसलें उत्पन्न की जा रही हैं, जिनमें कीटनाशकों (Pesticides) की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि ये पादप जातियाँ पीड़क प्रतिरोधी (Pest resistant) होती हैं। Bt एक प्रकार का प्रतिविष है, जो बैसिलस थ्यूरिन्जिएन्सिस (Bacillus thuringiensis or Bt) जीवाणु से निर्मित होता है।


यह एक भूमिगत जीवाणु है, जिसकी खोज जापानी वैज्ञानिक ईशीवाटा ने सन् 1902 में की थी। Bt जीव विष का जीन जीवाणु से निकालकर पादपों में स्थानान्तरित कर देते हैं। इससे पादप (फसल) में प्रतिविष का निर्माण होने लगता है और कीटनाशक की आवश्यकता नहीं पड़ती है, इस प्रकार की फसलों को Bt फसल (Bf crop) कहते हैं जैसे Bt कपास, BI मक्वा, Bt धान (Rice), Bt टमाटर, Bt सोयाबीन, Bt तम्बाकू, आदि। 

इनमें Bt तम्बाकू का निर्माण सर्वप्रथम किया गया था।


नोट - Ti प्लाज्मिड को एग्रोबैक्टीरियम से प्राप्त किया जाता है।

 • Bt आविष के रवे कुछ जीवाणुओं द्वारा बनाए जाते हैं, लेकिन जीवाणु स्वयं को नहीं मारते हैं, क्योंकि ये अविष निष्क्रिय होते हैं।


Bt कपास


बैसिलस थ्यूरिन्जिएन्सिस (Bacillus thuringiensis) नामक भूमिगत जीवाणु ऐसी प्रोटीन (जीव विष) का निर्माण करता है, जिसमें अनेक प्रकार के कीट (तम्बाकू का कीट, सैनिक कीट, भृंग कीट) को नष्ट करने की क्षमता होती है। बैसिलस जीवाणु से बना जीव विष कीटनाशक होता है। ये जीवाणु में निष्क्रिय रहता है, परन्तु कीट में पहुँचते ही आहारनाल के क्षारीय माध्यम से सक्रिय हो जाता है तथा कीटों की मृत्यु हो जाती है।


जीव विष को बनाने वाले जीवाणु से जीन को पृथक करके फसलों में प्रवेश करा दिया जाता है। इसी प्रकार Bt कपास नामक पादप का निर्माण कर लिया गया है। Bt कपास पर शलभ (Ballworms) कृमि का प्रभाव नहीं होता और उत्पादन बढ़ जाता है। जीव विष को बनाने वाली जीन को क्राई (cry) कहते हैं। ये अनेक प्रकार की हो सकती हैं।


2. गोल्डन धान


जीनी अभियान्त्रिकी द्वारा वैज्ञानिकों ने जीन परिवर्तन कर विटामिन-A की कमी को दूर करने वाले चावल का विकास किया गया है, जिसे सुनहरा चावल (गोल्डन राइस) नाम दिया गया है। इस चावल को उत्पन्न करने के लिए उसके पादपों पर तीन जीनों का प्रत्यारोपण किया जाता है। इस प्रक्रिया के अनुरूप -कैरोटिन युक्त पीले रंग का चावल उत्पन्न होता है। यही -कैरोटिन शरीर में विटामिन-A में परिवर्तित हो जाता है।


भारतीय बासमती चावल का अर्द्धबौनी किस्मों से संकरण कराकर एक नयी खोज का दावा अमेरिकन कम्पनी द्वारा किया गया और इस बासमती चावल का पेटेन्ट भी अमेरिकन कम्पनी द्वारा करा लिया गया।


3. फ्लैवर सेवर

इस ट्रान्सजेनिक टमाटर में एटीसेन्स RNA तकनीक के कारण कोशिका भित्ति की पेक्टिन को नष्ट करने वाले एन्जाइम पॉलीगेलैक्टोयूरोनेज का संश्लेषण कम होता है। और यह टमाटर लम्बे समय तक ताजा बने रहते हैं।


4. पीड़क प्रतिरोधी पादप

सूत्रकृमि (निमैटोड) मिलोइडोगाइनी इनकोग्नीटा तम्बाकू के पादपों की जड़ों को संक्रमित कर उसकी पैदावार को काफी कम कर देता है। इस संक्रमण को रोकने के लिए एक नवीन पद्धति RNA अन्तरक्षेप (RNA Interference RNAi) का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में विशिष्ट mRNA की साइलेंसिंग (Silencing) की जाती है। dsRNA जीनों के अमोनीकरण में प्रयुक्त होता है।


चिकित्सा में जैव-प्रौद्योगिक का उपयोग


इसका चिकित्सा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान है। इसे निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है


• मानव इन्सुलिन (Human insulin) मानव इन्सुलिन (ह्यूमुलिन) तथा अन्य हॉर्मोन या प्रोटीनों का निर्माण अभियांत्रिकी द्वारा ई. कोलाई के प्रयोग से सम्भव हो सकता है। मधुमेह के रोगियों के लिए 'एली लिली' नामक एक अमेरिकन औषधि निर्माण कम्पनी ने 5 जुलाई, 1983 को दो DNA अनुक्रमों को तैयार किया, जो मानव इन्सुलिन की श्रृंखला A वB के समान थे। इन्सुलिन हॉर्मोन की दोनों श्रृंखलाएँ A व B में डाइसल्फाइड बन्धों से जोड़कर परिपक्व इन्सुलिन तैयार की गई। इस कार्य में फ्रैडरिक सेंगर प्रमुख भूमिका निभाई थी।


• फ्रैडरिक सेंगर ने गाय के अग्न्याशय से प्राप्त इन्सुलिन के अणु में A-एल्फा (≺) तथा B-बीटा (β) नामक दो पॉली पेप्टाइड श्रृंखलाओं का पता लगाया। ये दोनों ही श्रृंखलाएँ आपस में डाइसल्फाइड बन्धो (S-S bonds) की सहायता से जुड़ी होती हैं।


• फ्रेडरिक सेंगर के अनुसार, मवेशी के अग्न्याशय से प्राप्त इन्सुलिन की ≺ एवं β-श्रृंखलाओं में अमीनो अम्लों की संख्या क्रमश: 21 व 30 होती है। 


नोट

 •ह्यूमिलिन आनुवंशिकी अभियान्त्रिकी के सहयोग से बनाई गयी प्रथम औषधि है।

• आनुवंशिकी अभियान्त्रिकी की तकनीकी द्वारा रूपान्तरित प्रतिजैविकों का उत्पादन करते हैं। 


•प्रोइन्सुलिन के परिपक्वन से इन्सुलिन बनते समय इन्सुलिन का 'C' पेप्टाइड हटा दिया जाता है।


• धमनियों के रुधिर के थक्के को घोलने के लिए उपयुक्त प्लाज्मीनोजन इसी तकनीक से तैयार किया जा रहा है।


• मानव वृद्धि हॉर्मोन का संश्लेषण भी जीन अभियान्त्रिकी द्वारा किया जा रहा है। 


• हिपेटाइटिस-B के विरुद्ध प्रतिरक्षी भी पुनर्योजन DNA तकनीक से तैयार किए जा रहे हैं। इस तकनीक से बनाई गई प्रतिरक्षी अधिक शुद्ध है, क्योंकि इसमें केवल उन्हीं प्रोटीनों के विरुद्ध बनते हैं, जिनकी आवश्यकता होती है।


• जैव-प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा द्वितीय पीढ़ी के टीके (पुनर्योगज टीके) तथा तृतीय पीढ़ी के टीके का उत्पादन किया जाता है। पुनर्योगज तकनीक द्वारा हिपेटाइटिस-B, हर्पीज, इन्फ्लुएन्जा, काली खाँसी (Whooping cough),मैनिनजाइटिस, आदि रोगों के टीकों का उत्पादन किया जा रहा है।


जीन चिकित्सा (Gene therapy) द्वारा विकृत जीन को किसी दूसरे स्वस्थ जीन से प्रतिस्थापित करके अनेक रोगों का उपचार सम्भव है। सर्वप्रथम सन् 1990 में एक चार साल की बच्ची (SCID से ग्रसित) में एडिनोसीन डीएमीनेज (ADA) न्यूनता के उपचार हेतु जीन चिकित्सा का प्रयोग किया गया।


• इण्टरफेरॉन प्रतिविषाणु ग्लाइकोप्रोटीन है, जो प्रतिरक्षा नियन्त्रक की भाँति कार्य करते हैं। इनका प्रयोग अनेक रोगों के उपचार हेतु किया जा रहा है।


 नोट सिस्टिक फाइब्रोसिस रोग cfcf जीन में उत्परिवर्तन के कारण होता है।


 •जीन थेरैपी का उपयोग आनुवंशिक रोग जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस रोग के इलाज में भी इस विधि का उपयोग किया जाता है। 


आण्विक निदान पुनर्योगज DNA तकनीक, पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) व एन्जाइम लिंक्ड इम्यूनोसॉर्बेन्ट एस्से (ELISA) द्वारा रोगों की पहचान समय से पूर्व की जा सकती है। आजकल संदेहप्रद एड्स रोगियों में HIV की उपस्थिति का पता

करने हेतु पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) तकनीक को प्रयोग किया जा रहा है।


पारजीनी जन्तु (ट्रांसजेनिक एनिमल्स)


ऐसे जीव, जिनके DNA में हेर-फेर (DNA तकनीक) द्वारा एक अतिरिक्त जीन व्यवस्थित कर दिया जाता है, जो अभिव्यक्ति का भी प्रदर्शन करता है, पारजीनी या आनुवंशिक परिवर्ती जीन कहलाते हैं तथा ऐसे जीवों को पारजीवी या पारजीनी (Transgenic) कहते हैं।


दूसरे शब्दों में, पारजीनी जन्तु वह है, जिसका जीनोम किसी दूसरी जाति के जीन्स लेने के कारण बदल गया हो। विभिन्न उपयोगी लक्षणों वाले पारजीनी जन्तु उत्पन्न किए गए हैं, जैसे- पारजीनी गाय, जिसके दूध में एक विशेष प्रकार के प्रोटीन्स होते हैं तथा तीव्र वृद्धि करने वाली साल्मन मछली होती है। चूहे पारजींनी जन्तुओं के रूप में सर्वाधिक संख्या में पाए जाने वाले जीव हैं।


नैतिक मुददे 


आनुवंशिक रूपान्तरण के लिए नियामक उपायों की स्थापना की गई है, ताकि इनके दुरुपयोग पर नियन्त्रण तथा नैतिक समस्याओं का समाधान किया जा सके। इसी सन्दर्भ में भारत ने पहल करते हुए, आनुवंशिकी अभियान्त्रिकी संस्तुति समिति (Genetic Engineering Approval Committee or GEAC) का गठन किया है। यह समिति मानव हितों को ध्यान में रखकर आनुवंशिकी रूप से रूपान्तरित (GM) पारजीनी जीवों, भोजन तथा विभिन्न अनुसन्धानों की वैधता पर निर्णय लेती है।


जैवदस्युता या बायोपाइरेसी


विभिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ (MNCs) या अन्य संगठन जब किसी देश के जैविक संसाधनों का समुचित प्रतिकर भुगतान किए बिना अनाधिकृत रूप से उन संसाधनों का प्रयोग करते हैं, तो यह बायोपाइरेसी कहलाता है।


किसी भी देश के जैविक संसाधनों जैसे-जैविक पदार्थ तथा पुनर्योगज DNA उत्पाद के बिना पूर्व सूचना के गैर-कानूनी तरीके से प्रयोग, बाहर ले जाना,उसका उपभोग, बायोपाइरेसी के अन्तर्गत आता है।


जैव-एकस्व या बायोपेटेन्ट


एकस्व प्रक्रिया अन्वेषक (Invention) को एक अधिकार प्रदान करती है, ताकि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसकी खोज का दुरुपयोग न किया जा सके। विभिन्न देशों में एकस्व सम्बन्धी कानून अलग-अलग है। वर्तमान में यह कानूनी अधिकार जैविक उत्पादों, आनुवंशिकी अभियांत्रिकी उत्पादों आदि के लिए भी अनुमोदित किए जा रहे हैं।


नोट जैव-पौद्योगिकी के अविवेकपूर्ण उपयोग द्वारा जीप संहार के साधनों, वैविक हथियारों का निर्माण कर उन्हें मानवता एवं प्रवृत्ति के विरुद्ध प्रयोग करना जैविक युद्ध कहलाता है।


[ अभी तक आपने जाना जैव-प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग के बारे में अब इससे संबंधित बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर भी जानते हैं जो आपकी विभिन्न परिक्षाओं में पूछे जाएंगे इसलिए आप पोस्ट को पूरा जरूर पढ़ें ]"


{ biotechnology and its applications objective Questions Answer }


          { बहुविकल्पीय प्रश्न 1 अंक }


प्रश्न 1. जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग होता है 


(a) चिकित्सा में


(b) कृषि में


(c) दोनों (a) व (b) में


 (d) उपरोक्त में से कोई नहीं


उत्तर (c) दोनों (a) व (b) में


प्रश्न 2. आनुवंशिकता रूपान्तरित पौधा है।


(a) Bt कपास


(b) Br मक्का


 (c) गोल्डन राइस


 (d) ये सभी


उत्तर (d) ये सभी


प्रश्न 3. Bt आविष के रवे कुछ जीवाणुओं द्वारा बनाए जाते हैं, लेकिन जीवाणु स्वयं को नहीं मारते हैं, क्योंकि



(a) जीवाणु आविष के प्रति प्रतिरोधी हैं। 


(b) आविष अपरिपक्व है


(c) आविष निष्क्रिय है


(d) आविष जीवाणु की विशेष थैली में मिलता है


उत्तर (c) आविष निष्क्रिय होती है।


प्रश्न 4. Bt कपास में कीटनाशक के रूप में एक प्रकार का होता है।


(a) प्रोटीन


(b) लिपिड


(c) कार्बोहाइड्रेट


(d) विटामिन


उत्तर (a) प्रोटीन


प्रश्न 5. Bt फसलों के उत्पादन में निम्नलिखित में से कौन भाग लेता है?


(a) शैवाल


(b) फफूँदी


(c) जीवाणु


(d) ये सभी


उत्तर (c) जीवाणु


प्रश्न 6. Bt कपास है


(a) एक क्लोन्ड पादप 


(b) एक पारजीनी पादप


(c) एक संकर पादप


(d) एक उत्परिवर्तित पादप


उत्तर (b) एक पारजीनी पादप


प्रश्न 7. RNA अन्तरक्षेप में जीनों का अमोनीकरण किसके प्रयोग से होता है?


 (a) ssDNA


(b) dsDNA


(c) dsRNA


(d) ssRNA


उत्तर (c) dsRNA


प्रश्न 8.जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग होता है


(a) आनुवंशिक रूपान्तरण ने फसलों को सूखा व तण्ड के प्रति अधिक सहिष्णु बनाया है। 


(b) आनुवंशिक रूपान्तरण ने रासायनिक पीड़कनाशकों पर निर्भरता को कम किया है।


(c) आनुवंशिक रूपान्तरण ने खाद्य पदार्थों के पोषणिक स्तर में वृद्धि की है।


(d) उपरोक्त सभी


उत्तर (d) आनुवंशिक रूपान्तरण के सम्बन्ध में उपरोक्त सभी कथन सत्य है।


प्रश्न 9. जीनी अभियान्त्रिकी से प्राप्त होता है।


 (a) सुनहरा चावल (गोल्डन राइस)


 (b) ग्लूकोस


 (c) गेहूँ


(d) मक्का


उत्तर (a) सुनहरा चावल (गोल्डन राइस)


प्रश्न 10. निम्नलिखित में से किस वैज्ञानिक के अनुसार, मवेशी के अग्न्याशय से प्राप्त इन्सुलिन की एल्फा एवं  बीटा श्रृंखलाओं में अमीनो अम्लों की संख्या क्रमशः 21 व 30 है?


(a)फ्रैडरिक सेंगर 


(b) डार्विन


(c) क्रिस्टियन हैन्स


 (d) दोनों (b) एवं (c)


उत्तर (a) फ्रैडरिक सेंगर के अनुसार, मवेशी के अग्न्याशय से प्राप्त इन्सुलिन की α एवं β श्रृंखलाओं में अमीनो अम्लों की संख्या क्रमशः 21 व 30 होती है।


प्रश्न 11. निम्न में से कौन सी औषधि आनुवंशिकी अभियान्त्रिकी के सहयोग से बनाई गई प्रथम औषधि है?


(a)   ह्मूलिन 


(b) सोमॅटोस्टेटिन


(c) इण्टरफेरॉन


(d) मान्य वृद्धि हॉर्मोन 


उत्तर (a) ह्मूलिन आनुवंशिकी अभियान्त्रिको के सहयोग से बनाई गई प्रथम औषधि है।


12. मनुष्य की इन्सुलिन में 'C' पेप्टाइड है


(a) परिपक्व इन्सुलिन अणु का एक भाग


 (b) डाइसल्फाइड बन्ध निर्माण हेतु उत्तरदायी


(c) प्रोइन्सुलिन के परिपक्वन से इन्सुलिन बनते समय हटा दिया जाता है।


 (d) जैविक क्रिया के लिए उत्तरदायी


उत्तर (c) प्रोइन्सुलिन के परिपक्वन से इन्सुलिन बनते समय हटा दिया जाता है।


प्रश्न 13. किस पदार्थ का संश्लेषण जीनी अभियान्त्रिकी द्वारा औद्योगिक स्तर पर किया गया है?


 (a) मानव वृद्धि हॉर्मोन


(b) इन्सुलिन


(c) इण्टरफेरॉन


(d) इन सभी का


उत्तर (d) उपरोक्त सभी पदार्थों का संश्लेषेण जीन अभियान्त्रिकी द्वारा औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है।


प्रश्न 14. किस तकनीक के अन्तर्गत हिपेटाइटिस B के टीके तैयार किए जाते हैं?


 (a) बसन्तीकरण


(b) DNA पुनर्योगज


(c) अतिसूक्ष्म निस्यन्दन


(d)इनमें से कोई नहीं


उत्तर (b) DNA पुनर्योगज तकनीक हिपेटाइटिस-B, इन्फ्लूएन्जा, काली खाँसी (Whooping coup), आदि के टीके तैयार किए जा रहे हैं।


प्रश्न 15. पहली जीन चिकित्सा किस रोग के उपचार में की गई?


(a) एड्स


(b) कैंसर


(c) सिस्टिक फाइब्रोसिस


(d) ADA की कमी से होने वाला SCID


उत्तर (d) ADA की कमी से होने वाला SCID


प्रश्न 16. ADA का पूरा नाम है (जिसकी SCID रोगियों में न्यूनता होती है।


(a) एडीनोसीन डिएमीनेज


(b) एडीनोसीन डिऑक्सीएमीनेज 


(c) एस्पार्टेन्ट डिएमीनेज


(d) आर्जीनीन डिएमीनेज


उत्तर (a) एडीनोसीन डिएमीनेज


प्रश्न 17. जैविक युद्ध है


(a) जैव-प्रौद्योगिकी का अविवेकपूर्ण उपयोग 


(b) ऐसा युद्ध जिसमें मानव, फसली पादपों के विरुद्ध जैविक हथियारों का प्रयोग किया जाए


(c) ट्रान्सजेनिक जीवों के विकास में समस्या


 (d) दोनों (a) एवं (b)


उत्तर (d) जैव-प्रौद्योगिकी के अविवेकपूर्ण उपयोग से जीव संहार के साधन, जैविक हथियारों का निर्माण किया जा सकता है। ऐसे युद्ध को जिसमे मानव, फसली पादप एवं अन्य जीव-जन्तुओं के विरुद्ध जैविक हथियारों का प्रयोग किया जाए, उसे जैविक युद्ध कहते हैं।


[ Short Question of biotechnology and its applications ]

         अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1 अंक


प्रश्न 1. जैव-प्रौद्योगिकी की परिभाषा लिखिए। दो क्षेत्रों का केवल नाम लिखिए, जहाँ इस तकनीक का उपयोग मानव कल्याण में होता है।


उत्तर – जैव-प्रौद्योगिकी विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत जैविक तन्त्रों एवं जैविक क्रियाओं का उपयोग मानव कल्याण हेतु किया जाता है। यह विज्ञान की आधुनिकतम शाखा है, जिसमें जैव रसायन, सूक्ष्मजैविकी आण्विक जीव विज्ञान आनुवंशिकी आण्विक जीव विज्ञान आनुवंशिकी, आदि के अध्ययन का विस्तृत उपयोग किया जाता है।


प्रश्न 2. जैव-प्रौद्योगिकी के कृषि सम्बन्धित दो उपयोग लिखिए। 

उत्तर – जैव-प्रौद्योगिकी का कृषि में उपयोग पारजीनी (GM) फसलों के निर्माण व नॉन-लेग्यूमिनस पादपों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता के विकास करने हेतु

किया जाता है।


प्रश्न 3. Bt फसल पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर – Bt फसलें (Bt crops) जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा ऐसी फसलें उत्पन्न की जा रही हैं, जिनमें कीटनाशकों (Pesticides) की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि ये पादप जातियाँ पीड़क प्रतिरोधी (Pest resistant) होती है। एक प्रकार का प्रतिविष है, जो Bacillus thuringiensis or Bt जीवाणु से निर्मित होता है।


प्रश्न 4 इन्टरनेट से पता लगाइए कि गोल्डन राइस (सुनहरा धान) क्या है? 

उत्तर सुनहरा चावल (Oryza sativa) पारजीनी किस्म है, जिसको आनुवंशिक अभिन्त्रिकी द्वारा उत्पन्न किया गया है। इस किस्म में β-कैरोटीन (प्रोविटामिन A, विटामिन A का निष्क्रिय रूप) अच्छी मात्रा में होता है, जो विटामिन का मुख्य स्रोत है। इस चावल के दाने, β कैरोटीन की उपस्थिति के कारण पीले रंग के होते हैं। अतः इन्हें सुनहरा चावल कहते हैं।


प्रश्न 5. USA कम्पनी ने भारतीय चावल की कौन-सी किस्म का पेटेन्ट करा लिया है? 

उत्तर– भारतीय बासमती चावल का अर्द्धबौनी किस्मों से संकरण कराकर एक नयी खोज का दावा अमेरिकन कम्पनी द्वारा किया गया और इस बासमती चावल का पेटेन्ट भी अमेरिकन कम्पनी द्वारा करा लिया गया।


प्रश्न 6. GMO को विस्तारित कीजिए। यह संकर से किस प्रकार भिन्न है? 

उत्तर GMO का विस्तारित रूप आनुवंशिकीय रूपान्तरित जीव (Genetically Modified Organism) है। यह संकर से भिन्न होता है, क्योंकि संकर जीव में दो जातियों के जीन समूहों के बीच क्रॉस कराया जाता है, जबकि GMO जीव में किसी बाह्य जीन को प्रवेश कराकर उस जीव के जीनों में फेर-बदल कर दिया जाता है।


प्रश्न 7. जैव-प्रौद्योगिकी के चिकित्सीय उपयोग का वर्णन कीजिए। 

उत्तर जैव-प्रौद्योगिकी के चिकित्सीय उपयोग निम्नलिखित है

 (i) जीनी चिकित्सा द्वारा आनुवंशिक रोग दूर किए जा सकते हैं। 


(ii) मानव इन्सुलिन का उत्पादन जीवाणु द्वारा किया जाता है।


प्रश्न 8. इण्टरफेरॉन की परिभाषा एवं कार्य लिखिए।

उत्तर – इण्टरफेरॉन प्रतिविषाणु ग्लाइकोप्रोटीन है, जो प्रतिरक्षा नियन्त्रक की भाँति कार्य करते हैं। इनका प्रयोग अनेक रोगों के उपचार हेतु किया जा रहा है।


प्रश्न 9. मानव इन्सुलिन का उत्पादन किसने और कब किया था?

 उत्तर –  मधुमेह के रोगियों के लिए 'एली लिली' नामक एक अमेरिकन औषधि निर्माण कम्पनी ने 5 जुलाई, 1983 को दो DNA अनुक्रमों को तैयार किया, जो मानव इन्सुलिन की श्रृंखला A व B के समान थे। इन्हीं डाइसल्फाइड बन्धों से जोड़कर परिपक्व इन्सुलिन तैयार की गई।


प्रश्न 10. क्या हमारे रुधिर में प्रोटिओजेज तथा न्यूक्लिएजेज हैं?


उत्तर – नहीं, हमारे रुधिर में प्रोटिओजेज तथा न्यूक्लिएजेज नहीं पाए जाते हैं, क्योंकि रुधिर में उपस्थित होने पर ये प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल का विघटन कर, रुधिर कोशिकाओं व रुधिर वाहिनियों को घेरने वाली कोशिकाओं के विघटन का कारण बन जाएँगे।


प्रश्न 11. इन्टरनेट से पता लगाइए कि मुखीय सक्रिय औषधि प्रोटीन को किस प्रकार बनाएँगे? इस कार्य में आने वाली मुख्य समस्याओं का वर्णन कीजिए। 


उत्तर इस प्रकार की औषधि प्रोटीन के निर्माण में मुख्य समस्या यह है कि मुखीय सक्रिय प्रोटीन की अर्द्ध-आयु छोटी होती है, जिसके कारण वे जल्द ही निष्क्रिय हो जाते हैं तथा इनका उचित अवशोषण भी नहीं हो पाता है। ये उपापचयी रूप से स्थिर व दीर्घ आयु वाले होने चाहिए, ताकि इनका शीघ्र विघटन ना हो तथा इनके शरीर द्वारा पर्याप्त रूप से अवशोषण हो सके। इनका निर्माण लक्ष्य निर्धारित उत्परिवर्तनजन के उपयोग द्वारा प्रोटीन के जीनों को पुनर्निर्मित करके रूपान्तरित पेप्टाइड की अभिव्यक्ति के द्वारा किया जाता है।


प्रश्न 12. ELISA का विस्तृत रूप दीजिए। किस रोग की पहचान करने में इसका प्रयोग किया जाता है? इसके सिद्धान्त के बारे में बताए।


उत्तर – एन्जाइम सहलग्न प्रतिरक्षा शोषक आमापन (Enzyme Linked Immune Sorbent Asiay or ELISA) प्रतिजन प्रतिरक्षी पारम्परिक क्रिया के सिद्धान्त पर कार्य करता है। सन्देहप्रद एड्स रोगियों में HIV की उपस्थिति का पता करने हेतु

इसका उपयोग किया जाता है।


प्रश्न 13. पारजीनी (आनुवंशिक परिवर्ती जीव जन्तु से आप क्या समझते हैं

उत्तर – ऐसे जीव या जन्तु, जिनके DNA में हेर-फेर (rDNA तकनीक) द्वारा एक अतिरिक्त जीन व्यवस्थित कर दिया जाता है, जो अभिव्यक्ति का भी प्रदर्शन करता है. पारजीनी या आनुवंशिक परिवर्ती जीव कहलाते है। पारजीनी जंतुओं के रूप में सर्वाधिक संख्या में पाए जाने वाले जीव चूहे हैं।


प्रश्न 14. जैव एकाधिकार क्या है? 

उत्तर जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके खाद्य उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयुक्त तकनीक का पंजीकरण जैव एकाधिकार (bio-patent) कहलाता है। जैव एकाधिकार निम्नलिखित के लिए दिए जाते हैं


(i) DNA क्रमों तथा उनके द्वारा कोडित प्रोटीन, 


(ii) उत्पाद तथा उत्पादक प्रक्रियाएँ,


(iii) सूक्ष्मजीवों के विभेद,


(iv) पौधों एवं जन्तुओं के आनुवंशिक रूपान्तरित विभेद आदि।


प्रश्न 15. जैविक युद्ध क्या है?

उत्तर जैव-प्रौद्योगिकी के अविवेकपूर्ण उपयोग द्वारा जीव संहार के साध जैविक हथियारों का निर्माण कर, उन्हें मानवता एवं प्रकृति के विरुद्ध प्रयोग करना जैविक युद्ध कहलाता है।


प्रश्न 16. बायोपाइरेसी क्या है?

उत्तर विभिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ (MNCs) या अन्य संगठन जब किसी देश के जैविक संसाधनों का समुचित प्रतिकर भुगतान किए बिना अनाधिकृत रूप से

उन संसाधनों का प्रयोग करते हैं, तो यह बायोपाइरेसी कहलाता है।


प्रश्न 17. तेल के रसायन शास्त्र तथा rDNA जिसके बारे में आपको जितना भी ज्ञान प्राप्त है, उसके आधार पर बीजों से तेल हाइड्रोकार्बन हटाने की कोई एक विधि बताइए।


उत्तर –  पुनर्योगज DNA तकनीक के द्वारा बीजों से तेल हटाने के लिए निम्न चरण उपयोग में लिए जाते हैं


1. सर्वप्रथम तेल उत्पादित करने वाले जीन्स की पहचान करना।


 2. बीज के जीनी समूहों से उस जीन को हटाना।


3. बचे हुए DNA के साथ उस जीन को जोड़ना फिर इसे कोशिका में स्थापित कर देते हैं।


[ biotechnology and its applications Question Answers ]


          लघु उत्तरीय प्रश्न-I 2 अंक


प्रश्न 1. पुनर्योजन DNA तकनीक से क्या आप क्या समझते हैं? इसके कृषि में उपयोग का वर्णन कीजिए।

उत्तर आनुवंशिक अभियान्त्रिकी में कृत्रिम विधियों द्वारा कोशिकाओं की आनुवंशिक रूपरेखा में परिवर्तन किया जाता है। इसमें पुनर्संयोजन DNA बनाने के लिए जीन का स्थानान्तरण या पुनर्संयोजन होता है। इस तकनीक में दो भिन्न जीवों के DNA को संयुक्त कर पुनर्संयोजन DNA उत्पन्न किया जाता है। इस तकनीक को DNA पुनर्संयोजन तकनीक (DNA recombinant technique) भी कहा जाता है। इस तकनीक का कृषि में उपयोग पारजीनी (GM) फसलो के निर्माण व नॉन-लेग्यूमिनस पादपों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता के विकास करने हेतु किया जाता है।


प्रश्न 2. ग्रीन जैव-प्रौद्योगिकी क्या है?

 उत्तर ग्रीन जैव प्रौद्योगिकी से तात्पर्य पादपों में जैविक तकनीकों के अनुप्रयोग से है। इसका उद्देश्य पादपों के पौषणिक स्तर में गुणात्मक व मात्रात्मक वृद्धि से है। इसके द्वारा उच्य गुणवत्ता वाले पादपों का निर्माण कर मानव तथा पशुओं को सभी प्रकार की खाद्य, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। इसके विशिष्ट उदाहरण निम्न है

गोल्डन राइस → यह विटामिन A से भरपूर होता है। • फ्लैवर सेवर → दीर्घकाल तक खराब न होने वाला व अधिक सुस्वाद वाला टमाटर |


प्रश्न 3. आनुवंशिकीय रूपान्तरित फसल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर "ऐसे जीव (पादप, जन्तु, सूक्ष्मजीव) जिनकी उत्पादकता, गुणवत्ता या रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए उनके जोनो (Genes) में फेरबदल कर दिया गया हो आनुवंशिकीय रूपान्तरित जीव कहलाते हैं।' अधिकांशतया किसी बाह्य जीन को इन जीवों में प्रवेश कराया जाता है, इस कारण इन्हें पारजीनी जीव

(Transgenic organism) भी कहा जाता है।

फसलों में अनेक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पारजीनी पादपों का उपयोग व्यापक तौर पर किया जा रहा है। इन फसलों को GM फसलें (GM crops) या जैव-प्रौद्योगिक फसलें (Biotechnology crops) भी कहते हैं; उदाहरण- Bt कपास।


प्रश्न 4. Bt फसलें क्या हैं? इनके महत्व का वर्णन कीजिए।

अथवा Bt कपास पर टिप्पणी लिखिए।

 उत्तर – Bt फसलें यह एक प्रकार का प्रतिविष है, जो जीवाणु वैसिलस थ्यूरिन्जिएन्सिस (Bacillus thuringiensis or Bt) से निर्मित होता है। जब Bt जीव विष का जीन जीवाणु से निकाल कर पादपों में स्थानान्तरित कर देते हैं, तो ऐसी फसल Bt फसल कहलाती है। इसके द्वारा पादप/ फसल प्रजातियाँ पीड़क प्रतिरोधी बन जाती है।


प्रश्न 5. किन्हीं दो Bt फसलों के नाम लिखिए। इनके निर्माण में भाग लेने वाले मुख्य जीवाणु का भी नाम लिखिए।


उत्तर दो Bt फसलों के नाम निम्न हैं


(i) Bt बैंगन


(ii) Bt कपास


इन दोनों फसलों को बनाने के लिए वैसिलस थ्यूरिन्जिएन्सिस जीवाणु का उपयोग किया जाता है।


 प्रश्न 6. स्वास्थ्य की देखभाल में जैव-प्रौद्योगिकी की उपयोगिता पर टिप्पणी लिखिए।


अथवा जैव-प्रौद्योगिकी का मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुप्रयोग लिखिए।


अथवा जैव-प्रौद्योगिकी का स्वास्थ्य में उपयोग पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तरस्वास्थ्य और जैव-प्रौद्योगिकी जैव-प्रौद्योगिकी का मानव रोगों के उपचार में विशेष योगदान है, जो निम्नलिखित हैं


1. टीका (Vaccine) उत्पादन में।


2. स्टीरॉइड तथा इन्सुलिन हॉर्मोन के उत्पादन


3. गर्भावस्था में रोग की जानकारी होना।


4. एड्स, β- थैलेसीमिया, सिकिल सेल एनीमिया, आदि रोगों को पहचानने में भी जैव-प्रौद्योगिकी का विशेष योगदान है।


प्रश्न 7. परिपक्व क्रियात्मक इन्सुलिन हॉर्मोन, प्राक्-हॉर्मोन अवस्था से किस प्रकार भिन्न है? 

उत्तर इन्सुलिन के अणु में दो पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएं एल्फा (ς) तथा बीटा (β) श्रृंखलाएं होती है। श्रृंखला 'A' में 21 अमीनो अम्ल तथा श्रृंखला 'B' में 30 अमीनो अम्ल होते है। ये श्रृंखलाएं आपस में डाइसल्फाइड बन्धों (S-S bonds) की सहायता से जुड़ी होती है। मानव सहित स्तनधारियों में इन्सुलिन प्राक्-हॉन (Pro-hormone) के रूप में संश्लेषित होता है, जिसमें एक अतिरिक्त श्रृंखला होती है, जिसे पेप्टाइड श्रृंखला 'C' कहते हैं। परिपक्वता के दौरान "C" पेप्टाइड श्रृंखला पृथक हो जाती है। अतः परिपक्व इन्सुलिन में 33 अमीनो अम्लों युक्त 'पेप्टाइड नहीं होता है। 


प्रश्न 8. आनुवंशिक रोग में दिया गया उपचार संक्रामक रोग में दिए गए उपचार से भिन्न क्यों होता है?

उत्तर आनुवंशिक रोग में दिया गया उपचार संक्रामक रोग से भिन्न होता है, क्योंकि आनुवंशिक रोग किसी औषधि से उपचारित नहीं होता है। इसके उपचार में असंगत जीन को संगत जीन से स्थानान्तरित कर देना चाहिए, जबकि संक्रामक रोग रोगकारकों के द्वारा होते है। इसलिए इन रोगकारको को मारकर इनकी वृद्धि को

रोका जा सकता है।


प्रश्न 9. स्टेम कोशिका के बारे में आप क्या जानते हैं?


अथवा चिकित्सीय उपचार में स्टेम कोशिका की भूमिका की समीक्षा कीजिए।


अथवा स्तम्भ कोशिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।


उत्तर स्तम्भ कोशिकाएँ, वे अभिन्नित कोशिकाएँ हैं, जो विशिष्ट कोशिकाओं (Special cell) में भिन्नित हो सकती है। समसूत्री विभाजन द्वारा अधिक संख्या में स्तम्भ कोशिकाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। ये कोशिकाएँ बहुकोशिकीय जीवों में पाई जाती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। 


1. भ्रूणीय स्तम्भ कोशिकाएँ (Embryonic stem cells) इन्हें ब्लास्टोसिस्ट के आन्तरिक कोशिकीय समूह से प्राप्त किया जाता है।


 2. वयस्क स्तम्भ कोशिकाएँ (Adult stem cells) ये भ्रूणीय विकास के बाद पूरे शरीर में विभिन्न ऊतकों के भीतर पाई जाती है; उदाहरण मस्तिष्क में।


चिकित्सीय क्षेत्र में इनका उपयोग अंग व ऊतक पुनरुद्भवन (Regeneration) अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (Bone marrow transplantation), मस्तिष्क रोग उपचार (Brain disease treatment), कोशिकाओं की कमी में, हृदय व रुधिर सम्बन्धी रोगों के उपचार में होता है।


प्रश्न 10. ट्रान्सजेनिक जन्तु किसे कहते हैं? ट्रान्सजेनिक जन्तु की रचना की दो महत्त्वपूर्ण विधियों का वर्णन कीजिए। 


अथवा पारजीनी (ट्रान्सजेनिक) जन्तुओं के उत्पादन की दो मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए।


अथवा ट्रान्सजेनिक जन्तु पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 


अथवा ट्रान्सजेनिक जीवों के दो उदाहरण लिखिए।


उत्तर ऐसे जन्तु जिन्हें उनके अनुवांशिक संगठन में  अनुवांशिक अभियान्त्रिकी द्वारा परिवर्तित करके विकसित किया जाता है,अनुवांशिकतया रूपांतरित (GM) जन्तु या ट्रांस जेनिक जन्तु कहलाते है।

पारजीनी या ट्रांसजेनिक जंतुओं को निम्न तीन विधियों द्वारा प्राप्त किया जाता है 


DNA सूक्ष्म प्रत्यारोपण DNA microinjection)


रिट्रोविषाणु मध्यस्थीय जीन स्थानान्तरण (Retrovirus mediatede transfer) 


भ्रूणीय स्टेम कोशिका मध्यस्थीय जीन स्थानान्तरण (Embryonic cell mediate transfer) अधिकांश पारजीनी जंतुओं को निषेचित अंडो में सीधे DNA के सूक्ष्मप्रत्यारोपण द्वारा उत्पन्न किया जाता है।


प्रश्न 14. प्रथम पारजीनी गाय का नाम बताइए। इस गाय में कौन-से जीन का पता लगाया गया?

उत्तर – प्रथम पारजीनी गाय रोजी (Rosie) में मानव प्रोटीन से भरपूर दुग्ध (2.4 ग्राम/लीटर) प्राप्त किया गया। इस दुग्ध में मानव एल्फा लैक्टाल्बुमिन Humai alpha-lectalbumin) मिलता है, जो मानव शिशु हेतु अत्यधिक संतुलित पोषक तत्व है, जो साधारण गाय के दूध में नहीं मिलता है। 


प्रश्न 15. क्लोनिंग और जीव क्लोनिंग को समझाइए तथा उनमें अन्तर

अथवा उन क्लोनिंग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।


उत्तर जी क्लोनिंग (Gene cloning) यदि किसी जीन या DNA वा गुणसूत्र को एक ऐसी ही अनेक प्रतिलिपियाँ बनायी जाए, तो यह क्रिया जीन क्लोनिंग कहलाती है तथा प्रत्येक प्रतिलिपि को क्लोन कहा जाता है। PCR उपकरण से यहvक्रिया समय हो गयी है। जीव क्लनिंग (Animals cloning) यह सम्पूर्ण प्राणी के क्लोन बनाने से सम्बन्धित है। इस उद्देश्य के आधार पर जीव क्लोनिंग दो प्रकार की होती है-प्रजननय क्लोनिंग तथा चिकित्सकीय क्लोनिंग। प्रजननीय क्लोनिंग के अन्तर्गत केन्द्रक प्रतिरोपण द्वारा क्लोनिंग तथा भ्रूण क्लोनिंग सम्मिलित है, जबकि चिकित्सकीय क्लोनिंग मानव क्लोनिंग से सम्बन्धित है।


प्रश्न 16. GBAC क्या है और इसके उददेश्य है? 


उत्तर आशिकी अभियान्त्रिकी संस्तुति समिति (Genetic Engineering Approval | Commitee or GEAC) एक भारतीय सरकारी संगठन है, जिसके उद्देश्य किन्न है


1. आनुवंशिकी रूप से रूपान्तरित पारजीनी जीवों की वैधता को जाँचना


 2. अनुवंशिक रूपान्तरण के लिए नियामक उपायों को स्थापना करना व इस दुरुपयोग पर नियन्त्रण व नैतिक समस्याओं का समाधान करना।



            [      लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक      ]


प्रश्न 1. जीनी रूपान्तरित जीव (GMO) क्या है? मनुष्य के भोजन में उपयोग किए जाने वाले किन्हीं दो GMO पदार्थों के नाम लिखिए।

 उत्तर – जब विजातीय किसी जीन को किसी कोशिका अथवा जीव में डाला जाता है तो उसे पारजीन (Transgene) तथा ऐसे जीवों को पारजीनी (Tensgenic) जीव कहते हैं। दूसरे शब्दों में, पारजीन वह जीव है जिसका जीनोम किसी दूसरी जाति के जीन्स लेने के कारण बदल गया हो। इन पारजीव जीवों को आनुवंशिकतया रूपान्तरित जीव(GMO) भी कहते हैं। जैसे- सन 1983 में मानव इन्सुलिन की श्रृंखला A और B के अनुरूप दो DNA अनुक्रमों को तैयार करके ई. कोलाई (E. coli) के प्लाज्मिड में प्रवेश कराकर इन्सुलिन श्रृंखलाओं का उत्पादन किया गया। इन A तथा B श्रृंखलाओं को डाइसल्फाइड बन्ध (Disulphide bonds) द्वारा आपस में जोड़कर मानव इन्सुलिन (Insulin) तैयार की गयी। इसके अतिरिक्त मानव के भोजन प्रयुक्त GMO उत्पाद के उदाहरण निम्न है Bt- बैगन, फ्लैवर सेवर टमाटर, सुनहरी पान, आदि।


प्रश्न 2. Bt से आप क्या समझते हैं? Bt कपास का उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।


अथवा Bt जीव विष क्या है? यह जीव विष बैसिलस को क्यों नहीं मारता है?


अथवा क्राई प्रोटीन क्या है? उस जीव का नाम बताइए, जो इसे उत्पन्न करता है। मनुष्य ने अपने लाभ के लिए इस प्रोटीन का किस प्रकार उपयोग किया है?


अथवा बीटी फसलों पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।


उत्तर Bt-कपास (Bt-Cotton) बैसिलस थ्यूरिन्जिएन्सिस (Bacillus thuringiensis) जीवाणु की कुछ प्रजातियों द्वारा ऐसे विषाक्त प्रोटीन (जीव विष) का निर्माण किया जाता है, जो विशिष्ट वर्ग के कीटों जैसे- कोलिऑप्टेरॉन (Choliopteron-भृंग) तथा डीप्टेरॉन (Dipteron- मक्खी-मच्छर) को मारने में सहायक होती है। यह जीवाणु अपने जीवनकाल की विशिष्ट अवस्था में इस विषाक्त प्रोटीन के रवों (Crystals) का निर्माण करता है। ये विषाक्त प्रोटीन स्वयं जीवाणु को खत्म नहीं करता, क्योंकि यह प्राकृविष (Protoxin) के रूप में निर्मित होता है। इस विषाक्त जीवविष का निर्माण जिस जीन द्वारा किया जाता है,उसे Cry जीन नाम दिया गया है तथा निर्मित प्रोटीन को Cry प्रोटीन कहते हैं।


जब कोई भी कीट इस पादप को खाता है, तो निष्क्रिय (Inactive) जीव विष कोट की आहारनाल में पहुंचकर क्षारीय pH (Alkaline pH) के कारण अपनी सक्रिय (Active) अवस्था में बदल जाता है, जो इसकी घुलनशील (Soluble) अवस्था होती है। यह सक्रिय विष, कीट की आँत की उपकला कोशिकाओं के साथ जुड़कर उसमें छिद्र (Pores) का निर्माण कर देता है। इस कारण कोशिकाएँ फट जाती हैं व कीट की मृत्यु हो जाती है। Bt विष भी अनेक प्रकार के होते हैं, जिन्हें अलग-अलग जीनों द्वारा कूटबद्ध (Code) किया जाता है।


 उदाहरण- (a) cry I ac तथा cry II ab जीन द्वारा निर्मित विषाक्त प्रोटीन कपास के गोलक शलभ कृमि को नियन्त्रित करती है।

 (b) Cry I ab जीन द्वारा निर्मित विषाक्त प्रोटीन मक्का छेदक (Maize borer) को नियन्त्रित करती है।


 प्रश्न 3. आनुवंशिकीय रूपान्तरित फसलों के लाभ व हानि का तुलनात्मक विभेद कीजिए।

उत्तरआनुवंशिकीय रूपान्तरित फसलों के लाभ (Advantages of GM Crops)

आनुवंशिकीय रूपान्तरित फसलों के लाभ निम्नलिखित हैं


1. फसलों के रोग प्रतिरोधी होने से उत्पादन में वृद्धि होती है व कटाई पश्चात् होने वाले नुकसान में कमी आती है।


2. ये फसलें जैविक व अजैविक कारकों (सूखा, ताप, लवणता) आदि के लिए प्रतिरोधी होती है। 


3. फसल की पोषण गुणवत्ता व खनिज उपयोग क्षमता में वृद्धि हो जाती है।


4. रासायनिक पीड़कनाशकों पर निर्भरता कम हो जाती हैं।


आनुवंशिकीय रूपान्तरित फसलों से हानियाँ (Disadvantages of GM Cropa) आनुवंशिक रूपान्तरित फसलों से है


1. Bt-विष के कारण अन्य प्राकृतिक जीव जैसे-परागणकारियों (Pollinatore) की मृत्यु हो जाती है व खाद्य श्रृंखला में परिवर्तन हो जाता है।


2. इनके लगातार प्रयोग से कीट इन फसलों के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, फिर इन्हें खत्म करने के लिए रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता पड़ती है। 


3. ये फसलें व इनके उत्पाद अनेक लोगों में एलर्जी उत्पन्न कर देते हैं।


4. इस तकनीक द्वारा उत्पादित फसलों में सामान्यतया बीज निर्माण नहीं होता है। अतः किसानों को प्रतिवर्ष नए बीज खरीदने पड़ते हैं, जोकि महंगा प्रक्रम है। 


प्रश्न 4. एन्जाइम चिकित्सा क्या है? वह 'जीन चिकित्सा से किस प्रकार भिन्न है? 


अथवा जीन थैरेपी और एन्जाइम थैरेपी का अन्तर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।


अथवा जीन थैरेपी पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।


 उत्तर जीन थैरेपी एवं एन्जाइम थैरेपी में अन्तर निम्नलिखित है



जीन थैरेपी

एन्जाइम थैरेपी

इसके अन्तर्गत मानव शरीर में असामान्य या त्रुटिपूर्ण या विकारी (Defective) जीन को स्वस्थ जीन से प्रतिस्थापित करते हैं।

इसमें प्रतिरक्षा तन्त्र में संलग्न एन्जाइम की त्रुटि को ठीक करा जाता है।

यह विधि, आनुवंशिक बीमारियों को ठीक करने के लिए उपयोगी है।

यह प्रतिरक्षा तन्त्र की बीमारी को ठीक करने के लिए उपयोगी है।

इसमें विकसित जीन (Deledrive) gene) को जीन लक्ष्य गोदन द्वारा स्वस्थ्य बना कर आनुवंशिक रोगों से मुक्त किया जाता है।

इसमें रोगी की अस्थि मज्जा का शल्य चिकित्सा द्वारा विकास कर आनुवंशिक अभियान्त्रिक ADA युक्त विषाणु से पार संक्रमित करके रूपान्तरित कोशिकाओं को पुनः रोगी में स्थापित किया जाता है।

जीन उपचार का प्रयोग ड्रग डिलीवरी तन्त्र के रूप में किया जाता है।

एन्जाइम थेरेपी का प्रयोग ड्रग डिलीवरी तन्त्र के रूप में नहीं किया जा सकता है।

इसका उदाहरण भ्रूण उपचार है।

इसका उदाहरण SCID है, जिसमें ADA एन्जाइम की कमी होती है।


प्रश्न 5. आण्विक निदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

उत्तर – रोग के उपचार हेतु सर्वप्रथम रोग का निदान होना आवश्यक है। रोग के निदान हेतु जैव तकनीकी विधियों का अनुपयोग आण्विक निदान कहलाता है। इसके अन्तर्गत रोगाणु को पृथक कर जैव रसायनों की सहायता से उन्हें जांचा जाता है। 


इस कार्य हेतु निम्न तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।


1. पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) जब जीवाणु व विषाणु कम संख्या में हों, तब PCR द्वारा उनके न्यूक्लिक अम्ल का प्रवर्धन (Amplification) करके उनकी पहचान कर सकते हैं। संदेहप्रद एड्स रोगियों में HIV की उपस्थिति का पता लगाने हेतु PCR तकनीक का प्रयोग किया जाता है। संदेहप्रद कैंसर रोगियों के जोन में होने वाली उत्परिवर्तनों (Mutations) का पता लगाने हेतु भी किया जाता है।


2. ब्लॉटिंग तकनीक किसी विशिष्ट DNA, RNA या प्रोटीन की पहचान हेतु ब्लॉटिंग तकनीक का प्रयोग करते हैं। सदर्न ब्लॉटिंग (Southern blotting) DNA, नॉदर्न ब्लॉटिंग (Northern blotting), RNA तथा वेस्टर्न ब्लॉटिंग (Western blotting) प्रोटीन हेतु प्रयुक्त की जाती है।


इस विधि में DNA या RNA की एकल श्रृंखला (Single stranded) में एक विकिरण सक्रिय अणु (Radioactive molecule) युक्त संपरीक्षित (Probe) कोशिकाओं से प्राप्त DNA में से, अपने पूरक (DNA) से ही संकरित होता है, जिसे बाद में स्वविकिरणों चित्रण (Autoradiography) की सहायता से पहचाना जाता है। उत्परिवर्तित जीन (Mutant gene) छायाचित्र पटल (Photographic) पर अदृश्य रहते हैं, क्योंकि संपरीक्षित्र (Probe) व उत्परिवर्तित जीन आपस में एक-दूसरे के पूरक (Complementary) नहीं होते हैं।


3. विकर सहलग्न प्रतिरक्षा शोषक आमापन ( ELISA) प्रतिजन प्रतिरक्षी पारस्परिक क्रिया (Antigen-antibody interaction) के सिद्धान्त पर कार्य करता है। इसमें रोगजनको (Pathogens) द्वारा उत्पन्न संक्रमण की पहचान प्रतिजन (प्रोटीन्स, ग्लाइकोप्रोटीन्स, आदि) की उपस्थिति या रोग जनकों के विरुद्ध संश्लेषित प्रतिरक्षी की पहचान के आधार पर की जाती है। 


प्रश्न 6. पारजीनी जीवाणु क्या है? किसी एक उदाहरण द्वारा सचित्र वर्णन कीजिए। 


उत्तर ऐसे जीवाणु, जिनके DNA में बाहर से अतिरिक्त बाह्य जीन को प्रवेश कराया जाता है। वह पारजीनी जीवाणु कहलाते हैं, जैसे-पारजीनी ई. कोलाई से ह्यमुलिन (मानव इन्सुलिन) आनुवंशिक अभियान्त्रिकी द्वारा बनाया जाता है। इन्सुलिन अणु में दो छोटी पेप्टाइड की श्रृंखलाएँ A व B पाई जाती हैं।


DNA अनुक्रम (जोन) जो श्रृंखला A व B के समकक्ष होते हैं, उन्हें प्लाज्मिड की सहायता द्वारा ई. कोलाई में स्थानान्तरित कराया जाता है, जिसमें इन्सुलिन की श्रृंखलाएँ निर्मित हो जाती हैं। अब इन श्रृंखलाओं को ई. कोलाई से प्राप्त करके डाइसल्फाइड बन्ध द्वारा जोड़ कर इन्सुलिन अणु निर्मित कर लिया जाता है।


इस प्रकार आनुवंशिक अभियांत्रिकी के प्रयोग द्वारा पारजीनी जीवाणु बनाते हैं, जिसके द्वारा डायबिटीज के निदान हेतु हन्सुलिन का व्यापक उत्पादन किया जाता है।


प्रश्न 7. बायोपाइरेसी पर टिप्पणी लिखिए।


अथवा बायोपाइरेसी क्या है? इसका सम्बन्ध टैक्समती (Texmati) से किस प्रकार है?


अथवा बायोपाइरेसी से आप क्या समझते है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।


अथवा बायोपाइरेसी एवं पैटेन्ट की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। 


उत्तर बायोपाइरेसी (Biopiracy) अन्य देशों की जैविक सम्पदाओं का शोषण या उनका पेटेन्ट प्राप्त करना जैव दस्युता (Biopiracy) कहलाता है। विश्व के विकसित देशों ने अपनी जैव-विविधता के मूल्य पर उद्योगों को विकसित किया है। है। 

विकासशील तथा अधोविकसित देशों में कई प्राकृतिक सम्पदाएँ हैं, ये देश जैव-विविधता से समृद्ध है। विकसित देश अधोविकसित देशों की जैविक सम्पदाओं का दोहन करने के लिए जैव संरक्षण प्राप्त करने में लगे हुए सभी जीव जिनका उपयोग व्यावसायिक कार्यों के लिए किया जा सकता है। जैविक सम्पदाओं या जैव-सम्पदाओं के अन्तर्गत आते हैं। इस विषय पर विवाद तथा दोषारोपण चल रहे हैं उदाहरण के तौर पर-एक ऑस्ट्रेलियाई सरकारी एजेन्सी द्वारा सन् 1997 में अन्तर्राष्ट्रीय जीन बैंक से प्राप्त अरहर को संरक्षित करने के प्रयास। 


बासमती के बीज, जोकि भारत का सुगन्धित चावल है, जिसे हम कई शताब्दियों से उगा रहे है, किन्तु राइसटेक का दावा है कि यह अनोखी खोज इनके द्वारा की गई है। नीम जिसका उपयोग हम कई शताब्दियों से पीड़क नियन्त्रण औषधि के लिए, घर में दैनिक कार्यों के लिए, अनाज के रक्षण के लिए, रेशम तथा ऊनी कपड़ों के बचाव के लिए कर रहे हैं, के उपयोग का भी एकस्व है। टैक्समती से सम्बन्ध पेटेन्ट पादप से बनी दवाओं पर लगा टैक्स उस देश को जाता है, जिसने उस पादप को पेटेन्ट करा रखा है।


        [   दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 5 अंक    ]


प्रश्न 1. जीनी अभियान्त्रिकी क्या होती है? इसे पुनर्योजी DNA प्रौद्योगिकी क्यों कहते हैं? मानव हित में इसकी उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।


अथवा आनुवंशिक अभियान्त्रिकी के मानव हित में अनुप्रयोग लिखिए।


उत्तर आनुवंशिक या जीनी अभियान्त्रिकी (Genetic engineering) इस प्रक्रिया में जीन क्लोनिंग व जीन स्थानान्तरण का प्रयोग करके पुनर्संयोजन या पुनर्योग DNA (Recombinant DNA) का निर्माण किया जाता है। इस DNA को चुने हुए जीवों में डालकर नए लक्षणों से युक्त जीवों आनुवंशिक रूपान्तरित जीव (GMO)) का निर्माण किया जाता है। इस तकनीक को आनुवंशिक अभियान्त्रिकी कहा जाता है। इस तकनीक के द्वारा कई प्रकार की प्रोटीन हॉर्मोन्स, प्रतिजैविक, एन्जाइम्स, आदि तैयार किए जा रहे हैं। पुनर्संयोजन DNA का सर्वप्रथम निर्माण स्टैनले कोहन व हर्बर्ट बोयर ने किया था। 


आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आनुवंशिक अभियान्त्रिक के निम्नलिखित उपयोग होते हैं ।


1. जीन संरचना तथा अभिव्यक्ति (Gene structure and expression)आनुवंशिक अभियान्त्रिकी का एक महत्त्वपूर्ण उपयोग जीन की संरचना का विस्तृत अध्ययन करना तथा जीन अभिव्यक्ति की क्रियाविधि का उल्लेख है। यूकैरियोट जीन में DNA क्रम तथा इससे उत्पन्न प्रोटीन में अमीनो अम्लों के क्रम आपस में सदैव मेल नहीं खाते है, केवल खण्डों में ही यह सम्भव होता है। इस प्रकार एक्सॉन (Exon) तथा इन्ट्रॉन (Intron) की उत्पत्ति हुई।


2. जीन की सक्रियता तथा निष्क्रियता (Activity and inactivity of gene) इस बात की सूचना कि जीन किस कारण सक्रिय या निष्क्रिय हो सकता है, आनुवंशिक अभियान्त्रिकी के ज्ञान से मिलती है। जीनोम में रचनात्मक तथा नियमनात्मक DNA क्रम होता है।


3. नए आनुवंशिक प्रभेद (New genetic strains) प्राणियों में नए एवं अधिक विकसित लक्षणों वाले नए आनुवंशिक प्रभेद आनुवंशिक अभियान्त्रिकी द्वारा बनाए जा सकते हैं। 


4. प्रतिजैविक अवरोध (Antibiotic resistance) आनुवंशिक अभियान्त्रिकी के ज्ञान से उचित प्लाज्मिड वाहक का प्रयोग करके प्रतिजैविक अवरोधी जीन विकसित किए जा सकते हैं।


 5. आनुवंशिक रोगों की पहचान (Detection of genetic diseases) विभिन्न आनुवंशिक रोग जैसे हँसियाकार- कोशिका अरक्तता, आदि की पहचान आनुवंशिक अभियान्त्रिकी तकनीक द्वारा की जा सकती है।


6. मानव इन्सुलिन (Human insulin) एक महत्त्वपूर्ण खोज मानव इन्सुलिन तथा अन्य हॉर्मोन या प्रोटीनों के निर्माण में अभियान्त्रिकी ई. कोलाई द्वारा सम्भव हो सकती है। इन्सुलिन तथा मानव वृद्धि हॉर्मोन का उत्पादन इस तकनीक द्वारा किया जा रहा है।


हिपेटाइटिस B के विरुद्ध प्रतिरक्षी भी पुनयोजन DNA तकनीक से तैयार की जा रही है। इस तकनीक से बनायी गयी प्रतिरक्षी अधिक शुद्ध है, क्योंकि इसमें केवल उन्हीं प्रोटीनों के विरुद्ध बनते हैं, जिनकी आवश्यकता होती हैं।


7. मानव आनुवंशिक रोगों का नियन्त्रण (Control of genetic diseases) आनुवंशिक अभियान्त्रिकी का एक ध्येय ऐसे जीनों को यूकैरियोट कोशिकाओं में प्रविष्ट करना है, जिनसे मानव के आनुवंशिक रोगों का नियन्त्रण किया जा सके। कैंसर रोग ऑन्कोजोन (Oncogenes) द्वारा नियन्त्रित होता है। DNA पुनर्योगज तकनीक द्वारा यह अध्ययन किया जा रहा है कि किन कारणों तथा किस विधि से सामान्य कोशिका कैंसर कोशिका में रूपान्तरित हो जाती है। जीन का बदलना (Replacement of gene) ही आनुवंशिक रोग के नियन्त्रण में मुख्य रूप से आवश्यक है।


प्रश्न 2. जैव-तकनीकी (बायोटेक्नोलॉजी) क्या है? मानव हित में कृषि तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जैव-तकनीकी के उपयोग पर प्रकाश डालिए।


अथवा जैव-प्रौद्योगिकी की उपयोगिता लिखिए।


अथवा कृषि क्षेत्र में जैव-प्रौद्योगिकी की उपयोगिता लिखिए। अथवा मानव कल्याण में जैव-प्रौद्योगिकी के योगदान का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।


 उत्तर जैव-प्रौद्योगिकी यह विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत जैविक तन्त्रों एवं जैविक क्रियाओं का उपयोग मानव कल्याण हेतु किया जाता है। यह विज्ञान की आधुनिकतम शाखा है, जिसमें जैव-रसायन, सूक्ष्मजैविकी आण्विक जीव विज्ञान, आनुवंशिकी आण्विक जीव विज्ञान आनुवंशिकी, आदि के अध्ययन का विस्तृत उपयोग किया जाता है। जैव-प्रौद्योगिकी शब्द का सर्वप्रथम उपयोग कार्ल इरके ने किया। विभिन्न क्षेत्रों में जैव-प्रौद्योगिकी की उपयोगिता निम्नलिखित है ।


1. जैव-प्रौद्योगिकी एवं कृषि जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग से कृषि के क्षेत्र में प्राप्त की गई कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां निम्नलिखित हैं 


लेग्यूमिनस पादपों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता का विकास आनुवंशिक यन्त्री निफ जीन को केल्टीसिएला न्यूमोनिआई से पृथक कर ई. कोलाई में इसको स्थापित करके गेहूं एवं अन्य अलेग्यूमिनस पादपों में स्थानान्तरण का प्रयास कर रहे हैं।


 • पादप रोगों से सुरक्षा ऐसे पादप, जो विभज्योतक ऊतकों के संवर्धन से प्राप्त होते हैं, वह रोगों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। 


उदाहरण- गन्ने के स्टॉका


 नई जातियों का विकास नई जातियों का विकास जीवद्रव्य संलयन (जैसे-पोमैटो) तथा क्लोनिंग द्वारा एवं अन्य विधियों द्वारा किया जाता है।


 2. जैव-प्रौद्योगिकी एवं उद्योग जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा जीवाणुओं एवं अन्य सूक्ष्म जीवधारियों द्वारा विकसित एन्जाइमों का उपयोग उद्योगों में किया जाता है, जैसे-अधिक मीठी शर्करा के विकास में।


• अधिक विटामिन एवं अमीनो अम्ल युक्त पदार्थ निर्मित करने में प्लास्टिक उद्योग में 


•अपमार्जक पदार्थों से मीथेन ईंधन का विकास  •हाइड्रोजन ईंधन का विकास


3. पनीर जैव-प्रौद्योगिकी पनीर चिकनाई युक्त दूध से बनाया जाता है। शुद्ध दूध को 60°C ताप पर 30 मिनट तक तथा 15 सेकण्ड के लिए 72° ताप पर गर्म किया जाता है। इस दूध को 30°C ताप तक ठण्डा किया जाता है. तत्पश्चात् लैक्टोबैसिलस जीवाणु और सूक्ष्म मात्रा में रेनिन एन्जाइम मिलावा जाता है। लगभग 45 मिनट में दूध का केसीन ठोस हो जाता है। इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इन टुकड़ों को गर्म जल में एक घण्टे तक गर्म किया जाता है। इन टुकड़ों को सावधानीपूर्वक निचोड़कर, हल्के लवणीय घोल में डुबो दिया जाता है।


4. योगहर्ट जैव-प्रौद्योगिकी योगहर्ट दूध से बनाया जाता है। आजकल इसका उत्पादन व्यापारिक स्तर पर किया जाता है। इसके उत्पादन में सर्वप्रथम स्वच्छ दूध को गर्म करके ठण्डा किया जाता है। ठण्डी अवस्था में स्ट्रेप्टोकोकस थर्मोफिलस और लैक्टोबैसिलस बुल्गेरिस के संवर्धन को मिलाया जाता है। इसके फलस्वरूप दूध अर्द्धठोस हो जाता है। इसे मचने पर चिकना पदार्थ योगहर्ट प्राप्त होता है। 


5. एल्कोहॉल उत्पादन इस जैव-प्रौद्योगिकी की सहायता से एथिल एल्कोहॉल का उत्पादन किया जाता है। इसकी दो विधियाँ होती हैं


(i) शर्करायुक्त पदार्थों से किण्वन द्वारा इस क्रिया में कच्चा माल गन्ने का गाढ़ा रस या शीरा होता है। इस घोल में अब सूक्ष्म मात्रा में यीस्ट मिलाया जाता है और घोल को बड़ी टंकियों में भरकर 20-30°C ताप पर रखा जाता है। इस अवस्था में यीस्ट दो एन्जाइम्स इन्वर्टेज और सुक्रोस उत्पन्न करता है। ये एन्जाइम्स गन्ने के रस को ग्लूकोस और फ्रक्टोस में बदल देते हैं। यीस्ट द्वारा उत्पन्न दूसरा एन्जाइम जाइमेज, ग्लूकोस और फ्रक्टोस को एथिल एल्कोहॉल में बदल देता है।


(ii) स्टार्चयुक्त पदार्थों से इस क्रिया में कच्चा माल आलू, जौ, मक्का, चावल, आदि के रूप में होता है। सर्वप्रथम डाइस्टेज एन्जाइम अंकुरित जाँ से प्राप्त किया जाता है, जिसे माल्ट एक्स्ट्रेक्ट कहते हैं। माल्ट को उबले हुए स्टार्चयुक्त पदार्थ में मिलाया जाता है और इसे 83°C ताप पर रखा जाता है। डाइस्टेज एन्जाइम स्टार्च को माल्टोस में बदल देता है। माल्टोस को डाइस्टेज से मुक्त करने के लिए उबाला जाता है, तत्पश्चात् ठण्डा करके इसमें यीस्ट मिलाया जाता है और 25-37°C ताप पर रख देते हैं। माल्टेज एन्जाइम माल्टोस को ग्लूकोस में अपघटित कर देता है और जाइमेज एन्जाइम, ग्लूकोस को एथिल एल्कोहॉल में अपघटित कर देता है। 


6.जैव-प्रौद्योगिकी प्रतिरक्षी एवं चिकित्सा चिकित्सा के क्षेत्र में प्राप्त की गई उपलब्धियां निम्न है 

आण्विक निदान इसमें हम एक क्लोनी (Monocional) प्रतिरक्षी का उपयोग करते हैं। इसे हाइब्रिडोमा तकनीक द्वारा उत्पन्न किया जाता है। 


जॉर्ज कोहलर तथा सिजर मिल्स्टेन को मोनोक्लोनल प्रतिरक्षी (Monoclonal antibody) को तैयार करने के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। एक विशेष प्रतिजन को टीके द्वारा शरीर में प्रवेश कराने पर, उस प्रतिजन के प्रति प्रतिरक्षी उत्पन्न होते हैं, जो B-कोशिकाओं से व्युत्पन्न प्लाज्मा कोशिकाओं से बनते हैं, लेकिन प्रतिरक्षी भिन्न प्लाज्मा कोशिकाएं होने के कारण उनमें भौतिक और रासायनिक रूप से भिन्नता होती है। वैज्ञानिक अब एक B कोशिका को अलग करते हैं और उसे ऐसी अर्बुद (Tumour) कोशिका से संलयित करते हैं, जिसमें अन्तहीन विभाजन की क्षमता होती है। अब जो कोशिका बनती है, उसे हाइब्रिडोमा कोशिका कहते हैं। ये कोशिकाएँ लम्बे समय तक काफी मात्र में शुद्ध प्रतिरक्षी का स्रोत बन जाती है, जिन्हें मोनोक्लोनी प्रतिरक्षी कहते हैं। ऐसे प्रतिरक्षी एकमात्र प्रतिजन के विरुद्ध कार्य करते हैं।


 जीन चिकित्सा इस तकनीक में आनुवंशिक दोष वाली कोशिकाओं के उपचार हेतु सामान्य जीन को व्यक्ति या भ्रूण में स्थानान्तरित किया जाता है, जो निष्क्रिय जीन को क्षतिपूर्ति कर उसके कार्यों को सम्पन्न करती है।


 7. आनुवंशिक परिवर्ती जीव इन जीवों के विकास में मूल जीव के प्राकृतिक जीनोम में कृत्रिम उपायों से किसी दूसरे जीव का जीन जोड़ दिया जाता है। इसके कुछ सामान्य उदाहरण निम्नलिखित है

Bt कपास (Bf cotton), सुनहरी धान, Bt बैंगन, फ्लैवर सेवर, आदि।


प्रश्न 3. पुनर्योगज DNA (रिकॉम्बीनेन्ट DNA) क्या है? इस तकनीकी (रिकॉम्बीनेन्ट DNA तकनीकी) की मदद से इन्सुलिन का उत्पादन  हम कैसे कर सकते हैं?


अथवा पुनर्संयोजक DNA प्रौद्योगिकी क्या है? मनुष्य के लिए लाभदायक दो उपयोग बताइए।


 उत्तरमानव इन्सुलिन इन्सुलिन एक लघु प्रोटीन हॉर्मोन है। यह प्रोटीन युक्त हॉर्मोन अग्न्याशय (अन्तः स्त्रावी ग्रन्थि) को बीटा (β) कोशिकाओं द्वारा निर्मित होता है तथा रुधिर में ग्लूकोस की मात्रा को नियन्त्रित करता है। इस हॉर्मोन की अपूर्णता रुधिर में ग्लूकोंस का स्तर बढ़ा देती है, परिणामस्वरूप रुधिर से कोशिकाएँ ग्लूकोस नहीं प्राप्त करती है। यह मधुमेह रोग (Diabetes mellitus) का कारण बनता है।


सर्वप्रथम सन् 1916 में एडवर्ड शेफर (Edward Schafer) ने इन्सुलिन की खोज की थी। प्रारम्भ में मधुमेह रोगी के उपचार हेतु इन्सुलिन सूअर तथा गायों से प्राप्त की जाती थी। इस प्रक्रिया में 100 ग्राम इन्सुलिन प्राप्त करने हेतु 800-1000 किलोग्राम अग्न्याशय की आवश्यकता होती है। यह इन्सुलिन मानव इन्सुलिन से संरचना में कुछ भिन्न या इससे कुछ रोगियों में एलर्जी उत्पन्न हो जाती थी।


एफ. सेंगर (F Sanger) को इस खोज के लिए सन् 1958 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से सम्मानित किया गया था। इन्हें दूसरा पुरस्कार सन् 1980 में DNA पर बेस अनुक्रमों (Base sequence) को ज्ञात करने के सम्बन्ध में दिया गया।


इन्सुलिन का संश्लेषण सन् 1982 में मधुमेह के रोगियों के लिए मानव इन्सुलिन का सफल उत्पादन किया गया। 'एली लिली' नामक एक अमेरिकन औषधि निर्माण कम्पनी ने 5 जुलाई, 1983 को दो DNA अनुक्रमों को तैयार किया, जो मानव इन्सुलिन की श्रृंखला A एवं B के समान थे। इन्होंने आनुवंशिक अभियान्त्रिकी या पुनयोंगज DNA तकनीक का उपयोग करके इन जीन्स को ई. कोलाई जीवाणु में स्थानान्तरित करके इन्सुलिन श्रृंखलाएं प्राप्त की। इन्सुलिन की A व B श्रृंखलाओं को पृथक रूप से प्राप्त करके, उन्हें सल्फाइड द्वारा जोड़ दिया गया। 


इससे उत्पादित इन्सुलिन को मानव इन्सुलिन (Humulin) कहा।


इस विधि में सर्वप्रथम मानव इन्सुलिन की A और B श्रंखलाओं के लिए DNA न्यूक्लियोटाइड के क्रम को ज्ञात किया गया। इन DNA ज्ञात श्रंखलाओं को पृथक प्रकृति वाले ई. कोलाई जीवाणु के प्लाज्मिड के साथ जोड़ा गया। इस प्रकार जीवाणु में इन्सुलिन के निर्माण के जीन्स आ गए।


इन जीवाणुओं का उचित माध्यम व वातावरणीय दशाओं में किण्वन (Fermentation) द्वारा संवर्धन किया गया। अन्ततया किण्वन से पदार्थ को निकालकर इन्सुलिन श्रृंखला को पृथक कर लिया गया। दोनों ही प्राप्त श्रृंखलाओं को डाइसल्फाइड बन्धों द्वारा जोड़कर ह्यमुलिन (Humulin) को प्राप्त कर लिया गया। सन् 1998 में एली लिली (Eli Lilly) तथा रैनबैक्सी (Ranbaxy) ने मधुमेह औषधि को बाजार में उतारा; जैसे-हुमापेन ( Humapen), हुमालोग (Humalog) तथा प्रोटीन काइनेज-C. आदि।


औषधियों व रसायनों का संश्लेषण जैव-प्रौद्योगिकी की सहायता से विभिन्न आनुवंशिक अभियान्त्रित जीवों (Genetically Modified Organisms or GMOs) द्वारा अनेक प्रकार की औषधियों व रसायनों का निर्माण किया जा रहा है।


DNA पुनर्संयोजित तकनीकी द्वारा निर्मित औषाधियाँ


औषधि

उपयोग

सुपरऑक्साइड डिस्म्यूटेस

हृदयाघात के पश्चात् हृदय पेशियों के आगे नुकसान को रोकता है।

मानव वृद्धि हॉर्मोन

पिट्यूटरी हॉर्मोन हड्डियों में हड्डी व पेशियों

की वृद्धि को बढ़ाता है।

स्ट्रेप्टोकाइनेज- TPA

रुचिर को जमने से रोकता है।

इण्टरल्यूकिन्स

प्रतिरक्षी गड़बड़ी तथा अर्बुद के उपचार में।

प्रश्न 4. पुनर्सयोजन डी.एन.ए. तकनीक से आप क्या समझते हैं? स्वास्थ्य/चिकित्सा के क्षेत्र में इसके उपयोग का वर्णन कीजिए। 


उत्तर –पुनर्योगज DNA प्रौद्योगिकी विधियों ने स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक प्रभाव डाला है, क्योंकि इसके द्वारा उत्पन्न सुरक्षित व अत्यधिक प्रभावी चिकित्सीय औषधियों का उत्पादन अधिक मात्रा में सम्भव है।


•वर्तमान काल में लगभग 30 पुरुयोंगन औषधियां विश्वभर में मानव के प्रयोग हेतु स्वीकार हो चुकी है, जिनमें से 12 भारत में भी विपणित हो रही है।


 • DNA पुनर्योगज विधि द्वारा कई प्रकार के प्रोटीन हॉर्मोन्स (Protein hormones), प्रतिजैविको (Antibiotics), एन्जाइम्स (Enzymes), वैक्सीन (Vaccines), आदि का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है तथा अन्ततया इनका औद्योगिक स्तर पर औषधियां या अन्य रूपों में मानव हित के लिए उपयोग किया जाता है। इसके फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के असाध्य रोगो का उपचार किया जा सकता है।


स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपयोगी कुछ पुनर्योगज DNA विधियों का वर्णन निम्न प्रकार से है।


1. औषधियों व रसायनों का संश्लेषण (Synthesis of drugs and chemicals) 

2. टीका उत्पादन (Vaccine Production)

•टीकाकरण (Vaccination) की खोज एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने की थी, लेकिन रोगजनक को दुर्बल या अक्रिय करने की तकनीक को लुईस पाश्चर (Louis Pasteur) द्वारा खोजा गया। टीकों में रोगाणुजनक (रोग कारक सूक्ष्मजीव) का दुर्बल या अक्रिय रूप निलम्बित अवस्था) होता है, जो शरीर में प्रवेश के उपरान्त प्राथमिक प्रतिरक्षी प्रतिवेदन (Primary immune response) तथा B एवं T-स्मृति कोशिकाओं (Memory cells) का उत्पादन करते हैं।


• जब टीकायुक्त व्यक्ति उसी रोगाणु द्वारा संक्रमित होता है, तो उपस्थित B एवं T· स्मृति कोशिकाएँ प्रतिजन (Antigen) को शीघ्रता से पहचान लेती हैं तथा आक्रमणकारी को लसिकाणुओं (Lymphocytes) तथा प्रतिरक्षियों (Antibodies) द्वारा समाप्त कर दिया जाता है। जैव-प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा द्वितीय पीढ़ी के टीके (पुनर्योगज टीके) तथा तृतीय पीढ़ी के टीके का उत्पादन किया जाता है। नयोंगज तकनीक द्वारा हिपेटाइटिस B हर्पीज, इन्फ्लुएन्जा, काली खाँसी (Whooping 9 cough), मैनिनजाइटिस, आदि रोगों के टीकों का उत्पादन किया जा रहा है


3. जीन चिकित्सा इस तकनीक में आनुवंशिक दोष वाली कोशिकाओं के उपचार हेतु सामान्य जीन को व्यक्ति या भ्रूण में स्थानान्तरित किया जाता है, जो निष्क्रिय जीन को क्षतिपूर्ति कर उसके कार्यों को सम्पन्न करती है।


4. मोनोक्लोनल प्रतिरक्षी 


5. इण्टरफेरॉन का संश्लेषण (Synthesis of interferons) इण्टरफेरॉन प्रतिविषाणु (Antiviral) ग्लाइकोप्रोटीन (Glycoprotein) है, जो प्रतिरक्षा नियन्त्रक (Immune regulators) या लिम्फोकाइन्स की भांति कार्य करते हैं।


ये विषाणु संक्रमण के प्रति अनुक्रिया करने हेतु संक्रमित कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं अर्थात् ये विषाणु संक्रमण के प्रति अनुक्रिया करने हेतु कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं अर्थात् ये विषाणु संक्रमण से बचने हेतु शरीर की प्रथम रक्षा पंक्ति है। इनकी खोज सन् 1975 में एलेक इसाक ( Alec Issacs) व जीन लिण्डेनमान (Jean Lindenmann) ने की थी।


•भूतकाल समय तक इण्टरफेरॉन का एकमात्र स्रोत ऊतक संवर्धित मानव श्वेत रुधिर कोशिकाएँ या विषाणु संक्रमित मानव कोशिकाएँ ही थी। कोलन बैसीलाई (Colon bacilli) में जीन्स के पुँजीकरण द्वारा मानव इण्टरफेरॉन का उत्पादन सन् 1980 में दो अमेरिकी वैज्ञानिको गिलबर्ट एवं बीजमान (Gilbert and Weismann) ने प्रारम्भ किया। 


•उनके इस कार्य से पुनर्योगज DNA तकनीकी (Recombinant DNA technology) द्वारा अधिक मात्रा में इण्टरफेरॉन उत्पन्न करने की दिशा में प्रगति हुई। इण्टरफेरॉन (विशेषकर-IFN-एल्फा) का उपयोग हिपेटाइटिस B के उपचार में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।



इण्टरफेरॉन को कैंसर व कुछ विषाणुजनक रोगों (एड्स सहित) के उपचार के लिए भी जाँचा जा रहा है।


 6. मानव वृद्धि हॉर्मोन (Human Growth Hormone or hGH)

•प्रोटीन प्रवृत्तिका व पिट्यूटरी ग्रन्थद्वारा है। इस हॉर्मोन का अल्प लावण बच्चों में बौनेपन का कारक होता है, जिसका उपचार मृत व्यक्तियों से निष्कर्षित मानव वृद्धि हॉर्मोन द्वारा किया जाता है, लेकिन इस प्रकार के उपचार के दुष्प्रभाव जैसे कूजफेल्टज जैकब रोग (Creulafeldt jacob disease) का कारक बने, इसलिए यह उपचार सफल नहीं हो सका।


•मानव वृद्धि जीन को क्लोन किया गया तथा एक क्लोन DNA (DNA) जीन को जीवाणु है. कोलाई में निवेशित किया गया। एक एक अनु (Single sequence) का संयोजन किया गया जो जीन के अनुलिपिकरण का कारक ही नहीं बल्कि कोशिकाओं से स्वावित प्रोटीन का कारक भी बना। जैनटैक (Genetech) कम्पनी इस आनुवंशिक अभियान्त्रित वृद्धि हॉर्मोन का उत्पादन करती है।


 7. एल्फा-1 एण्टीट्रिप्सिन AAT

यह मानव के यकृत में निर्मित तथा रुधिर में पाई जाने वाली प्रोटीन है, जो ट्रिप्सिन तथा एल्सटेज, जैसे प्रोटिएज एन्जाइमों का संदमन करता है। AAT जीन का उत्परिवर्तन दुर्लभ ही होता है, एक एकल भार प्रतिस्थापन), जो AAT के निष्क्रियकरण का कारक बनता है। 


• इसका सबसे अधिक प्रभाव फुफ्फुस (फेफड़ों) में दिखाई देता है। जहाँ एल्सटेज, कूपिकाओं (Alveoli) के मुलायम (प्रत्यास्थ ऊतकों का पाचन करके एम्फाइसिमा रोग को जन्म देता है। इस स्थिति में AAT युक्त एरोसोल स्प्रे में अन्तःश्वास किया जाता है, जो कूपिकाओं में पहुंचकर एल्सटेज की सक्रियता का संदमन करता है।


8. प्रतिजैविकों का उत्पादन (Production of antibiotics) प्रतिजैविक सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पादित ऐसे रासायनिक पदार्थ है, जो अन्य सूक्ष्मजीवों की वृद्धि का संदमन या उनको नष्ट करते हैं। प्रतिजैविक का उत्पादन करने वाले सूक्ष्मजीव को प्रतिजैव (Antibiont) कहते हैं।


प्रश्न 5. जीन चिकित्सा क्या है? एडीनोसिन डीएमिनेज (ADA) की कमी का उदाहरण देते हुए इसका सचित्र वर्णन कीजिए। 


उत्तर – जिन आनुवंशिक रोगों का इलाज किसी जीन को रोगी मानव की कोशिकाओं अथवा ऊतकों में प्रविष्ट करवाके किया जाता है, वह जीन चिकित्सा (Gene therapy) कहलाती है। इस विधि में भ्रूण अथवा शिशुओं में जीनजनित रोगों की पहचान व निदान की विधि अपनाई जाती है। 


गम्भीर संयुक्त प्रतिरक्षा न्यूनता रोग (Severe Combined Immunodeficiency Disease or SCID) यह एक प्रतिरक्षा तन्त्र को प्रभावित करने वाला दुर्लभ रोग है। इसको बबल बेबी सिन्ड्रोम (Bubble baby syndrome) के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग X गुणसूत्र पर उपस्थित एक जीन, जो एन्जाइम एडीनोसिन डीएमिनेज (Adenosine Deaminase or ADA) के संश्लेषण हेतु उत्तरदायी होता है, में उत्परिवर्तन (Mutation) के कारण होता है। यह एन्जाइम प्रतिरक्षा तन्त्र के सफल कार्यान्वयन हेतु अत्यन्त आवश्यक होता है। इसलिए SCID से ग्रसित जन्मे शिशुओं में प्रतिरक्षा तन्त्र उपस्थित नहीं होता है, जिससे इनमें संक्रमणों से लड़ने की क्षमता नहीं होती है। जोन चिकित्सा का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1990 में एक चार वर्षीय लड़की में एन्जाइम एडीनोसिन डोएमिलेज की न्यूनता अभाव को दूर करने के लिए किया गया था।


इसके उपचार हेतु सामान्य जीन (रोगी में अनुपस्थित) के RNA की अनुप्रति को रिट्रोविषाणु (Retrovirus) या अन्य किसी भी विषाणु वाहक (Virus vector) में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। तत्पश्चात् रोगी की अस्थि मज्जा (Bone marrow) से कोशिकाओं को निकालकर उसमें विषाणु का संक्रमण कराते हैं तथा कोशिका का संवर्धन (Cell culture) करते हैं। इस स्थिति में विषाणु के RNA जीनोम पर बना DNA प्रतिलेख (DNA transcript) पोषद कोशिकाओं के गुणसूत्रीय DNA में प्रवेश कर जाता है। इन कोशिकाओं को पुनः रोगी की अस्थि मज्जा में अन्तः क्षेपित (Inject) कर दिया जाता है।


गम्भीर संयुक्त प्रतिरक्षा रोग (Severe Combined Immunodeficiency Disease or SCID) यह एक प्रतिरक्षा तन्त्र को प्रभावित करने वाला दुर्लभ रोग हैं। इसको बबल बेबी सिन्ड्रोम (Bubble baby syndrome) के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग X गुणसूत्र पर उपस्थित एक जीन, जो एन्जाइम एडीनोसिन डीएमिनेज (Adenosine Deaminase or ADA) के संश्लेषण हेतु उत्तरदायी होता है, में उत्परिवर्तन (Mutation) के कारण होता है। यह एन्जाइम प्रतिरक्षा तन्त्र के सफल कार्यान्वयन हेतु अत्यन्त आवश्यक होता है। इसलिए SCID से प्रसित जन्मे शिशुओं में प्रतिरक्षा तन्त्र उपस्थित नहीं होता है, जिससे इनमें संक्रमणों से लड़ने की क्षमता नहीं होती है। जीन चिकित्सा का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1990 में एक चार वर्षीय लड़की में एन्जाइम एडीनोसिन डीएमिनेज की न्यूनता अभाव को दूर करने के लिए किया गया था।


इसके उपचार हेतु सामान्य जीन (रोगी में अनुपस्थित) के RNA की अनुप्रति को रिट्रोविषाणु (Retrovirus) या अन्य किसी भी विषाणु वाहक (Virus vector) में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। तत्पश्चात् रोगी की अस्थि मज्जा (Bone marrow) से कोशिकाओं को निकालकर, उसमें विषाणु का संक्रमण कराते हैं तथा कोशिका का संवर्धन (Cell culture) करते हैं। इस स्थिति में विषाणु के RNA जोनोम पर बना DNA प्रतिलेख (DNA transcript) पोषद कोशिकाओं के गुणसूत्रीय DNA में प्रवेश कर जाता है। इन कोशिकाओं को पुनः रोगी की अस्थि मज्जा में अन्तःक्षेपित (Inject) कर दिया जाता है।


इस प्रकार रोगजनक विषाणुओं के आनुवंशिक पदार्थों में परिवर्तन करके कैंसर, AIDS जैसे घातक रोगों के विषाणुओं को रोगजनक होने से रोककर, इन्हीं को रोगी के उपचार में सक्षम बनाया जा सकता है।


प्रश्न 6. स्टेम कोशिका के बारे में आप क्या जानते हैं? चिकित्सकीय उपचार में उनकी भूमिका की समीक्षा कीजिए।


अथवा स्टेम कोशिकाओं पर टिप्पणी कीजिए।


उत्तरस्तम्भ कोशिकाएं (Stem cells) कित्सा क्षेत्र में तकनीक तेजी रही है, जो कोशिका जीव विज्ञान एवं आनुवंशिकी के संयोग से विकसित हुआ है। ये विशिष्ट कोशिकाए होती हैं, जिनमे सूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होने की अपार क्षमता होती है अस्थि मज्जा से प्राप्त ये कोशिकाएं आजीवन शरीर में रूधिर कोशिकाओं का निर्माण करती है।


स्तम्भ कोशिका संवर्धन – ये कोशिकाएं माध्यम में आसानी से विभाजित होती हैं और वृद्धि करती है इस प्रकार निर्मित कोशिकाओ को जिस ऊतक में स्थांतरित किया जाता है ये उसकी कोशिकाओ की भांति स्वयं को परिवर्तित कर लेती हैं भारत मे इस क्षेत्र में अनुसंधान कोशिका एवं अन्विक जीव विज्ञान केन्द्र हैदराबाद में किया जा रहा है।


स्तम्भ कोशिकाओं के प्रकार

 ये प्रायः दो प्रकार की होती है


(a) धूणीय स्तम्भ कोशिका (abryonicall) में शिका स्टोसिस्ट के आन्तरिक कोशिका समूह से (elate) की जाती है।


(b) वयस्क स्तम्भ कोशिका (Adult stem cell) ये कोशिकाएँ भ्रूणीय विकास के बाद शरीर के विशिष्ट ऊतको; जैसे-मस्तिष्क, आदि से ली जा सकती है। ये कोशिकाएं बहुशक्त (Pleuripotent) कोशिकाएं होती हैं। इन कोशिकाओं के विभाजन से बनी कोशिकाएँ वयस्क ऊतक की मरम्मत के लिए उपयोग में लाई जाती है। स्तम्भ कोशिका प्राप्त करने के निम्नलिखित स्रोत है


(a) स्तम्भ कोशिकाएँ प्रारम्भिक भ्रूण की ब्लास्टुला अवस्था से प्राप्त की जा सकती हैं। इन कोशिकाओं को भ्रूणीय स्तम्भ कोशिकाएँ कहते हैं। 

(b) मानव के 8 माह के भ्रूण का यदि गर्भपात (Abortion) कराया जाए, तो इससे स्तम्भ कोशिकाएँ प्राप्त की जा सकती है।


(c) नवजात शिशु के अपरानाल (Placenta) से भी स्तम्भ कोशिकाएँ प्राप्त की जा सकती है।।


(d) वयस्क एवं शिशु मानव की रुधिर कोशिकाओं एवं अस्थि मज्जा को कोशिकाओं से भी स्तम्भ कोशिकाएं प्राप्त की जा सकती है।


स्तम्भ कोशिकाओं के उपयोग


स्तम्भ कोशिकाओं के उपयोग निम्नलिखित है


(a) प्रयोगशाला में ही वांछित अंग तैयार करना सम्भव हो सकेगा।


(b) बीमार हृदय की जगह नया हृदय विकसित होगा, खराब गुर्दे की जगह नया गुर्दा बनेगा, मधुमेह रोगियों को सही मात्रा में इन्सुलिन देने वाले अग्न्याशय की कोशिकाएं विकसित की जा सकेगी। इतना ही नहीं, प्रयोगशाला में नई हयां बनाने का काम भी सम्भव हो सकेगा।


 (c) शरीर के जिन ऊतकों का क्षय हो जाता है, उनका इलाज सुविधाजनक हो जाएगा, जैसे-मधुमेह, हृदय रोग, अल्जाइमर, पार्किन्सन जैसी बीमारियों का इलाज भ्रूण से ऊतक बनाने की विधि द्वारा बहुत आसान हो जाएगा। 


(d) स्तम्भ कोशिका के माध्यम से मनुष्य के विकास की प्रक्रिया के प्रत्येक चरण को प्रयोगशाला में समझा जा सकता है।


(e) दवाओं व टीकों का परीक्षण स्तम्भ कोशिका से बने भ्रूण पर किया जा सकता है। 


प्रश्न 7. पारजीनी जन्तुओं को परिभाषित कीजिए। किन्ही चार क्षेत्रों में इनका उपयोग बताइए।


अथवा पारजीनी जन्तुओं को परिभाषित कीजिए। ये कैसे विकसित किए जाते है 



 उत्तर ऐसे जन्तु जिन्हें उनके आनुवंशिक संगठन में आनुवंशिक अभियान्त्रिक द्वारा हेर-फेर या परिवर्तित (Manipulation) करके विकसित किया गया है अर्थात् वे जन्तु जो विजातीय या बाह्य जीन युक्त होते है. पारजीनी या ट्रान्सजेनिक या आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित जन्तु कहलाते हैं।


पारजीनी जन्तुओं के कुछ महत्त्वपूर्ण लाभ निम्नलिखित हैं


1. सामान्य शरीर क्रिया व विकास (Normal body activity and growth) पारजीनी जन्तुओं का निर्माण विशेष रूप से किसी जीन के नियन्त्रण व उसके शरीर के विकास व सामान्य कार्यों पर पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन हेतु किया जाता है; जैसे-इन्सुलिन की तरह विकास कारक का अध्ययन।


2. रोगों का अध्ययन (Study of diseases) अनेक पारजीनी जन्तु इस प्रकार निर्मित किए जाते हैं, जिनसे रोग के विकास में जीन की भूमिका का पता लग सके तथा उनका उपचार किया जा सके। वर्तमान समय में मानव रोगों; जैसे-कैंसर, पुटीय रेशामयता (सिस्टिक फाइब्रोसिस), रुमेटाइड सन्धिशोथ व अल्जाइमर हेतु पारजीनी नमूने उपलब्ध हैं।


3. जैविक उत्पाद (Organic products) कुछ मानव रोगों के उपचार के लिए जैविक उत्पादों से बनी औषधि की आवश्यकता होती है। पारजीनी जन्तु जो उपयोगी जैविक उत्पाद का निर्माण करते हैं, उनमें DNA के भाग (जीनों) को प्रवेश कराते हैं, जो विशेष उत्पाद के निर्माण में भाग लेते हैं. उदाहरण-मानव प्रोटीन (a-1 एण्टीट्रिप्सिन) का प्रयोग एम्फाइसिमा के इलाज में होता है। ठीक इसी तरह का प्रयास फिनाइलकीटोन्यूरिया (PKU) व पुटीय रेशामयता के इलाज हेतु किया गया है।


4. टीका एवं रासायनिक सुरक्षा परीक्षण (Vaccines and chemical safety test) इसे विषाक्तता सुरक्षा परीक्षण भी कहते हैं। यह विधि है, जो टीके एवं औषधि विषाक्तता के परीक्षण हेतु प्रयोग में लाई जाती है। पारजीनी जन्तुओं में मिलने वाले कुछ जीन इसे विषाक्त पदार्थों के प्रति अतिसंवेदनशील बनाते हैं, जबकि अपारजीनी जन्तुओं में ऐसा नहीं होता है।


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